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प्रजनन अधिकार : कानून से आगे महिलाओं की स्वायत्तता का सवाल

The article highlights the persistent gap between India’s progressive abortion laws and their implementation. Despite the Supreme Court’s 2022 ruling that marital status cannot deny unmarried women equal access to medical termination of pregnancy under Articles 14 and 21, government forms still exclude them, forcing women to seek court intervention. The 1971 MTP Act (amended 2021) provides regulated safe abortion, yet rural, poor, and remote women face severe barriers of distance, cost, and stigma. Unsafe abortions remain a major public-health crisis. True reproductive autonomy requires not only judicial clarity but reformed administrative processes, accessible healthcare, privacy protection, and social change so that women need not repeatedly approach courts for rights already recognised by law.

— जयसिंह रावत —

महिलाओं के अधिकारों को लेकर भारत में कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच कितनी गहरी खाई है, इसका ताजा उदाहरण बंबई उच्च न्यायालय के एक निर्णय से सामने आया है। न्यायालय ने गर्भ के चिकित्सकीय समापन से संबंधित सरकारी प्रपत्र में अविवाहित महिलाओं को भी शामिल करने का निर्देश दिया है। देखने में यह सामान्य प्रशासनिक सुधार लग सकता है, लेकिन इससे एक गंभीर संवैधानिक सवाल उठता है। जब सर्वोच्च न्यायालय सितंबर 2022 में ही स्पष्ट कर चुका था कि गर्भपात के अधिकार के मामले में विवाहित और अविवाहित महिलाओं के बीच केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, तब चार वर्ष बाद भी सरकारी प्रक्रियाओं में ऐसी विसंगति क्यों बनी रही? संबंधित महिला को गर्भपात की अनुमति देते हुए निर्णय को नजीर न मानने की टिप्पणी भी विचारणीय है। यदि प्रजनन स्वायत्तता संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है, तो समान परिस्थितियों में दूसरी महिलाओं को बार-बार न्यायालय की शरण क्यों लेनी पड़े?

यह प्रश्न केवल गर्भपात की अनुमति का नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा, निजता और अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता का है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता तथा अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इन अधिकारों का वास्तविक महत्व तभी है, जब महिला को अपने स्वास्थ्य और मातृत्व के संबंध में कानूनसम्मत निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो। 29 सितंबर 2022 को न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने गर्भ के चिकित्सकीय समापन अधिनियम की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया था कि अविवाहित महिलाओं को केवल वैवाहिक स्थिति के कारण निर्धारित कानूनी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता को संवैधानिक संरक्षण देने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि था।

भारत में गर्भपात संबंधी कानून की शुरुआत 1971 के गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम से हुई। इसका प्रमुख उद्देश्य असुरक्षित गर्भपात से होने वाली मातृ मृत्यु और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं को कम करना था। वर्ष 2021 के संशोधन ने इस व्यवस्था का विस्तार किया। सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भ के चिकित्सकीय समापन के लिए एक पंजीकृत चिकित्सक की राय पर्याप्त है, जबकि 20 से 24 सप्ताह के बीच निर्धारित श्रेणियों में दो चिकित्सकों की राय आवश्यक होती है। गंभीर भ्रूण असामान्यताओं के विशेष मामलों में चिकित्सा बोर्ड की व्यवस्था है। हालांकि यह कानून गर्भपात की असीमित स्वतंत्रता नहीं देता, बल्कि निर्धारित चिकित्सकीय और वैधानिक परिस्थितियों में सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराता है।

कानून में अधिकार मिलना और उसका व्यवहार में उपलब्ध होना अलग-अलग बातें हैं। महानगरों की शिक्षित तथा आर्थिक रूप से सक्षम महिलाओं को विशेषज्ञ चिकित्सकों, अस्पतालों और कानूनी सहायता तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच मिल सकती है। इसके विपरीत ग्रामीण, निर्धन, प्रवासी और सामाजिक रूप से वंचित महिलाओं के सामने अनेक बाधाएं हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में यह समस्या और गंभीर है। दूरस्थ गांवों से विशेषज्ञ अस्पताल तक पहुंचने में लंबी यात्रा, आर्थिक कठिनाइयों और चिकित्सकों की कमी का सामना करना पड़ता है। कई बार समय पर उपचार न मिलने से गर्भावस्था ऐसी स्थिति में पहुंच जाती है, जहां कानूनी प्रक्रिया अधिक जटिल हो जाती है। इस प्रकार भौगोलिक और आर्थिक असमानता भी महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को प्रभावित करती है।

असुरक्षित गर्भपात इस समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 7.3 करोड़ प्रेरित गर्भपात होते हैं, जिनमें करीब 45 प्रतिशत असुरक्षित परिस्थितियों में किए जाते हैं। अनचाहे गर्भधारण के लगभग 61 प्रतिशत मामलों का अंत प्रेरित गर्भपात में होता है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि गर्भपात केवल व्यक्तिगत पसंद अथवा नैतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती है। सुरक्षित चिकित्सा सुविधाओं, सही जानकारी और गोपनीय परामर्श के अभाव में महिलाएं जोखिमपूर्ण विकल्प अपनाने को विवश हो सकती हैं। प्रतिबंधात्मक सामाजिक वातावरण इस संकट को और बढ़ाता है।

इस पूरे विमर्श में समाज की दोहरी नैतिकता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। अनचाहे गर्भधारण की जिम्मेदारी प्रायः महिला पर डाल दी जाती है, जबकि पुरुष की समान भागीदारी और जिम्मेदारी पर अपेक्षित चर्चा नहीं होती। अविवाहित महिला का गर्भवती होना सामाजिक आलोचना का विषय बन जाता है, लेकिन पुरुष की जवाबदेही अक्सर पृष्ठभूमि में चली जाती है। विवाह के भीतर भी मातृत्व और परिवार नियोजन संबंधी निर्णय हमेशा महिला की स्वतंत्र इच्छा से नहीं होते। आर्थिक निर्भरता, घरेलू हिंसा, पारिवारिक दबाव और सामाजिक प्रतिष्ठा का भय उसकी निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी परिस्थितियों में केवल कानूनी समानता वास्तविक स्वतंत्रता की गारंटी नहीं बन सकती।

महिला के मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थितियों को भी पर्याप्त महत्व देना आवश्यक है। अनचाहा गर्भ आर्थिक असुरक्षा, संबंध-विच्छेद, घरेलू हिंसा अथवा सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए निर्णय केवल विवाह की स्थिति या रूढ़ सामाजिक मान्यताओं के आधार पर नहीं होना चाहिए। महिला की इच्छा, स्वास्थ्य, चिकित्सकीय जोखिम और वैधानिक प्रावधानों का संवेदनशील मूल्यांकन जरूरी है। गर्भावस्था की अवधि बढ़ने के साथ भ्रूण विकास और चिकित्सकीय सुरक्षा के प्रश्न अधिक जटिल होते हैं। कानून में विभिन्न अवस्थाओं के लिए अलग व्यवस्थाएं इसी कारण बनाई गई हैं। इनका उद्देश्य महिलाओं की स्वायत्तता को अनावश्यक रूप से बाधित करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा और कानूनसम्मत निर्णय सुनिश्चित करना होना चाहिए।

इस समस्या के समाधान के लिए सरकारी व्यवस्था में व्यापक सुधार जरूरी हैं। अस्पतालों के प्रपत्र, चिकित्सकीय दिशानिर्देश और प्रशासनिक प्रक्रियाएं सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या के अनुरूप होनी चाहिए। सरकारी अस्पतालों में प्रशिक्षित चिकित्सकों, सुरक्षित गर्भपात सेवाओं, गोपनीय परामर्श और समयबद्ध उपचार की उपलब्धता बढ़ानी होगी। विशेष रूप से पर्वतीय तथा दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है। किशोरों को आयु-अनुकूल प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा, महिलाओं को कानूनी अधिकारों की जानकारी और पुरुषों को परिवार नियोजन की जिम्मेदारी के प्रति जागरूक करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब एक अलग चुनौती है। गर्भावस्था के प्रत्येक सप्ताह के साथ चिकित्सकीय परिस्थितियां और कानूनी विकल्प बदल सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई, स्पष्ट चिकित्सकीय राय और संवेदनशील न्यायिक दृष्टिकोण आवश्यक हैं। महिला की पहचान और निजता की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए, ताकि सामाजिक बदनामी का भय उसे चिकित्सा अथवा न्यायिक सहायता लेने से न रोके।

भारत ने महिला शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानूनी अधिकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन वास्तविक समानता की परीक्षा उन निर्णयों में होती है, जो महिला के शरीर, स्वास्थ्य और भविष्य को सीधे प्रभावित करते हैं। मातृत्व का सम्मान जितना आवश्यक है, उतना ही मातृत्व स्वीकार करने या न करने के कानूनसम्मत निर्णय का सम्मान भी जरूरी है। मूल प्रश्न यह नहीं कि अदालतें कितनी महिलाओं को गर्भपात की अनुमति देती हैं, बल्कि यह है कि स्थापित वैधानिक अधिकारों के उपयोग के लिए महिलाओं को बार-बार अदालत क्यों जाना पड़ता है। समानता केवल संविधान और न्यायिक निर्णयों में नहीं, अस्पतालों की कार्यप्रणाली, सरकारी प्रक्रियाओं और सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। महिला की प्रजनन स्वायत्तता कोई रियायत नहीं, बल्कि उसकी गरिमा, स्वतंत्रता और समान नागरिकता का अभिन्न अंग है।

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ABOUT AUTHOR: Jay Singh Rawat is a senior journalist and author based in Dehradun, Uttarakhand, with nearly five decades of experience in full-time and freelance journalism. He has written extensively on social, political, environmental and developmental issues, with a special focus on the Himalayan region. He is the author of eight books, two of which have been published by the National Book Trust of India.

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