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मधुमेह के इलाज में नई क्रांति : अब केवल रक्त में शर्करा घटाना नहीं, हृदय और गुर्दों को बचाना भी लक्ष्य

Diabetes is a condition where blood sugar levels are too high because the body cannot use insulin properly. The two main forms are Type 1 (where the immune system attacks insulin-making cells) and Type 2 (where the body resists insulin).To stay healthy, patients must manage their blood sugar through a balanced diet, regular exercise, and medications. Treatments range from traditional insulin to newer drugs that also protect the heart and help with weight loss. Today, modern technology like continuous sugar monitors and automatic insulin pumps makes daily tracking much easier. By combining these medical advancements, proper patient education, and social support to fight stigma, people with diabetes can live long, healthy, and fulfilling lives.

जापान के जुंटेंडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की समीक्षा में मधुमेह के उपचार की नई दवाओं, आधुनिक तकनीक, खानपान और व्यायाम की भूमिका पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष; भारतीय मरीजों के लिए भी उपयोगी हैं ये जानकारियां

 

— -ज्योति रावत –

मधुमेह यानी डायबिटीज को लंबे समय तक ऐसी बीमारी माना जाता रहा, जिसमें मरीज को जीवनभर रक्त में शर्करा की मात्रा नियंत्रित रखनी पड़ती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान में हो रहे नए अनुसंधानों ने इसके उपचार की सोच को काफी बदल दिया है। अब चिकित्सकों का लक्ष्य केवल रक्त में शर्करा की मात्रा कम करना नहीं, बल्कि मरीज को हृदय रोग, गुर्दों की खराबी, दृष्टिहीनता, तंत्रिका संबंधी विकार और अन्य गंभीर जटिलताओं से बचाना भी है। नई पीढ़ी की कुछ दवाएं न केवल रक्त में शर्करा नियंत्रित करती हैं, बल्कि उपयुक्त मरीजों में हृदय और गुर्दों की सुरक्षा तथा शरीर का अतिरिक्त वजन घटाने में भी मददगार साबित हो रही हैं।

जापान के प्रतिष्ठित जुंटेंडो विश्वविद्यालय से जुड़े मधुमेह संबंधी एक वैज्ञानिक समीक्षा लेख, The Up-to-date Treatment for Diabetes and Prevention of its Complications (मधुमेह का आधुनिक उपचार और उसकी जटिलताओं की रोकथाम), में इस दिशा में हुई प्रगति का विस्तृत विवरण दिया गया है। इस शोध-समीक्षा में इंसुलिन की खोज से लेकर आधुनिक दवाओं, निरंतर शर्करा निगरानी उपकरणों और कृत्रिम अग्न्याशय जैसी तकनीकों तक की चर्चा की गई है।

यह अध्ययन भारत के लिए भी विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मधुमेह यहां एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। बीमारी की पहचान में देरी, अनियमित उपचार, शारीरिक निष्क्रियता और खानपान की बदलती आदतें इसकी गंभीरता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर, नई चिकित्सा पद्धतियां यह उम्मीद जगा रही हैं कि मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति भी उचित उपचार और देखभाल के सहारे लंबा, सक्रिय और सामान्य जीवन जी सकता है।

आखिर मधुमेह होता क्यों है?

हम जो भोजन करते हैं, उसका एक हिस्सा पाचन के बाद ग्लूकोज में बदल जाता है। यही ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। लेकिन इसे शरीर में सही ढंग से इस्तेमाल करने के लिए इंसुलिन नामक हार्मोन की आवश्यकता होती है। इंसुलिन का निर्माण पेट के पीछे स्थित अग्न्याशय की विशेष बीटा कोशिकाओं में होता है।

जब शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उपलब्ध इंसुलिन प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाता, तो रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने लगती है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने को मधुमेह कहा जाता है।

वैज्ञानिक समीक्षा में मधुमेह के दो प्रमुख प्रकारों का वर्णन किया गया है। पहले प्रकार का मधुमेह एक स्वप्रतिरक्षी बीमारी है, जिसमें शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देती है। ऐसे मरीजों को जीवनभर बाहरी इंसुलिन की आवश्यकता होती है।

दूसरे प्रकार का मधुमेह अधिक सामान्य है। इसमें शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं देतीं। इसे इंसुलिन प्रतिरोध कहा जाता है। शुरुआत में अग्न्याशय अधिक इंसुलिन बनाकर इसकी भरपाई करने का प्रयास करता है, लेकिन समय के साथ उसकी क्षमता घट सकती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार आनुवंशिक प्रवृत्ति, भोजन संबंधी आदतें और शारीरिक गतिविधियों की कमी दूसरे प्रकार के मधुमेह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि मधुमेह केवल अधिक मीठा खाने या मोटापे के कारण होने वाली बीमारी नहीं है। इसके पीछे अनेक जैविक और आनुवंशिक कारण भी हो सकते हैं।

रक्त में शर्करा कितनी होनी चाहिए?

शोध-समीक्षा में बताया गया है कि सामान्य परिस्थितियों में खाली पेट रक्त में ग्लूकोज की मात्रा लगभग 70 से 100 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर के आसपास रहती है। भोजन के दो घंटे बाद सामान्यतः यह 140 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम रहती है।

लेकिन मधुमेह की पहचान के लिए निर्धारित चिकित्सकीय मानदंड और पहले से मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति के उपचार लक्ष्य अलग-अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, खाली पेट शर्करा का स्तर 126 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर या उससे अधिक होना मधुमेह का संकेत हो सकता है, जिसकी पुष्टि चिकित्सकीय मानकों के अनुसार की जाती है।

इस बीमारी की निगरानी में एचबीए1सी जांच विशेष महत्व रखती है। यह पिछले लगभग दो से तीन महीनों के दौरान रक्त में शर्करा के औसत स्तर का संकेत देती है।

समीक्षा के अनुसार अनेक वयस्क मधुमेह रोगियों के लिए एचबीए1सी को 7 प्रतिशत से नीचे रखना एक सामान्य उपचार लक्ष्य है। हालांकि बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों और बार-बार शर्करा अत्यधिक घटने की समस्या वाले मरीजों के लिए लक्ष्य अलग हो सकता है।

इसलिए केवल एक जांच रिपोर्ट देखकर स्वयं दवा बढ़ाना या घटाना उचित नहीं है।

इंसुलिन की खोज ने बदल दिया चिकित्सा इतिहास

समीक्षा में मधुमेह के उपचार का इतिहास भी दिलचस्प ढंग से प्रस्तुत किया गया है। वर्ष 1921 में कनाडा के वैज्ञानिक फ्रेडरिक बैंटिंग और चार्ल्स बेस्ट के शोध ने इंसुलिन उपचार का रास्ता खोला। इससे पहले विशेष रूप से पहले प्रकार के मधुमेह से पीड़ित अनेक मरीज बहुत कम आयु में मृत्यु का शिकार हो जाते थे।

इंसुलिन के उपलब्ध होने से उनकी जीवन प्रत्याशा में उल्लेखनीय सुधार हुआ। शुरुआत में पशुओं से प्राप्त इंसुलिन का उपयोग किया जाता था। बाद में जैव प्रौद्योगिकी की सहायता से मानव इंसुलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ।

आज चिकित्सा विज्ञान उस दौर से काफी आगे बढ़ चुका है। इंसुलिन के विभिन्न प्रकार उपलब्ध हैं और आधुनिक उपकरणों की सहायता से इसकी मात्रा को मरीज की आवश्यकता के अनुसार अधिक सटीक ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।

लेकिन शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि मधुमेह का सफल उपचार केवल दवाओं पर निर्भर नहीं है। उचित आहार, नियमित व्यायाम, रोग की जानकारी और मरीज की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

भोजन में संतुलन जरूरी, भूखे रहना समाधान नहीं

मधुमेह के बारे में एक आम धारणा है कि रोगी को चावल, रोटी और अन्य कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ पूरी तरह छोड़ देने चाहिए। लेकिन वैज्ञानिक समीक्षा में भोजन की मात्रा, पोषण संतुलन और व्यक्ति की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को अधिक महत्व दिया गया है।

शोधकर्ताओं के अनुसार भोजन में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का उचित संतुलन होना चाहिए। साथ ही पर्याप्त रेशेदार खाद्य पदार्थ और नमक की नियंत्रित मात्रा भी आवश्यक है।

भारतीय परिस्थितियों में इसका अर्थ है कि मधुमेह का मरीज केवल मीठा छोड़कर निश्चिंत नहीं हो सकता। उसे भोजन की कुल मात्रा, खाने का समय और शारीरिक गतिविधियों पर भी ध्यान देना होगा।

सामान्य भारतीय भोजन में गेहूं की रोटी, चावल, दाल, हरी सब्जियां, दही और मौसमी फल शामिल किए जा सकते हैं। लेकिन इनकी मात्रा व्यक्ति की उम्र, वजन, शारीरिक गतिविधियों और रक्त शर्करा के स्तर के अनुसार निर्धारित होनी चाहिए। साबुत अनाज, दालें और रेशेदार सब्जियां भोजन की गुणवत्ता सुधारने में सहायक हैं।

अध्ययन में 50 वर्षीय एक कार्यालय कर्मचारी का उदाहरण दिया गया है, जिसकी लंबाई 170 सेंटीमीटर और वजन 70 किलोग्राम है। शोधकर्ताओं ने उसके लिए लगभग 64 किलोग्राम लक्ष्य वजन और गतिविधियों के अनुसार प्रतिदिन लगभग 2,000 कैलोरी ऊर्जा का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

यह सभी मरीजों के लिए निर्धारित आहार नहीं है, बल्कि यह समझाने का प्रयास है कि भोजन की योजना व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार बननी चाहिए।

केवल टहलना नहीं, मांसपेशियों का व्यायाम भी जरूरी

जुंटेंडो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने व्यायाम के महत्व पर विशेष जोर दिया है। उनके अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि से शरीर की इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है और रक्त में शर्करा नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।

अध्ययन में दो प्रकार के व्यायाम उपयोगी बताए गए हैं। पहला है तेज चलना, साइकिल चलाना, तैरना या अन्य गतिविधियां, जिनसे हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। दूसरा है मांसपेशियों को मजबूत करने वाला व्यायाम।

विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया कि दूसरे प्रकार के मधुमेह से पीड़ित जिन मरीजों ने नियंत्रित भोजन के साथ व्यायाम भी किया, उनमें केवल भोजन नियंत्रण करने वाले समूह की तुलना में इंसुलिन की प्रभावशीलता बेहतर हुई। उनकी मांसपेशियों में जमा वसा भी कम हुई।

समीक्षा में व्यावहारिक शुरुआत के रूप में सप्ताह में कम से कम तीन बार 15 से 30 मिनट व्यायाम करने की बात कही गई है। हालांकि सामान्य स्वास्थ्य दिशानिर्देशों में अधिकांश वयस्कों को सप्ताह में लगभग 150 मिनट मध्यम तीव्रता की शारीरिक गतिविधि और नियमित मांसपेशी-सुदृढ़ीकरण व्यायाम की सलाह दी जाती है।

भारतीय जीवनशैली में सुबह-शाम टहलना, सीढ़ियां चढ़ना, योग और उम्र के अनुकूल हल्का शक्ति व्यायाम उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन हृदय रोग, पैरों में तंत्रिका संबंधी समस्या या अन्य जटिलताओं वाले मरीजों को व्यायाम की योजना चिकित्सकीय सलाह से बनानी चाहिए।

नई दवाएं जो हृदय और गुर्दों की भी रक्षा कर सकती हैं

इस वैज्ञानिक समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मधुमेह की नई दवाओं से संबंधित है।

परंपरागत रूप से मधुमेह के उपचार में मेटफॉर्मिन जैसी दवाओं का व्यापक इस्तेमाल होता रहा है। यह दवा मुख्यतः यकृत में ग्लूकोज बनने की प्रक्रिया को कम करती है और इंसुलिन की प्रभावशीलता सुधारती है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दो नई श्रेणियों की दवाओं ने उपचार की संभावनाओं का विस्तार किया है।

पहली श्रेणी एसजीएलटी-2 अवरोधक दवाओं की है। इनमें एम्पाग्लिफ्लोजिन जैसी दवाएं शामिल हैं। ये गुर्दों में ग्लूकोज के पुनः अवशोषण को कम करती हैं, जिससे अतिरिक्त शर्करा मूत्र के रास्ते बाहर निकलती है।

समीक्षा में चर्चित एम्पा-रेग जैसे बड़े चिकित्सकीय परीक्षणों ने यह स्थापित करने में योगदान दिया कि इस श्रेणी की कुछ दवाएं उपयुक्त मरीजों में हृदय संबंधी जोखिम कम करने में भी उपयोगी हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि इस श्रेणी की कुछ दवाएं हृदय विफलता और गुर्दों की बीमारी वाले चुनिंदा मरीजों के लिए भी लाभकारी हो सकती हैं, भले ही उन्हें मधुमेह न हो।

दूसरी महत्वपूर्ण श्रेणी जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाओं की है। ये आंतों से निकलने वाले एक प्राकृतिक हार्मोन के प्रभाव की नकल करती हैं। इनके कारण भोजन के बाद आवश्यकतानुसार इंसुलिन का स्राव बढ़ता है, भूख कम हो सकती है और वजन घटाने में सहायता मिलती है।

इस श्रेणी की कुछ दवाएं इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं, जबकि कुछ के मुंह से ली जाने वाली गोलियों के विकल्प भी उपलब्ध हैं।

शोध-समीक्षा में ऐसी नई दवाओं का भी उल्लेख है जो जीएलपी-1 और जीआईपी नामक दो हार्मोन प्रणालियों पर एक साथ प्रभाव डालती हैं। इन्हें दोहरे प्रभाव वाली दवाएं कहा जाता है। इसके अतिरिक्त तीन हार्मोन प्रणालियों पर काम करने वाली दवाओं के विकास का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि इन दवाओं को मधुमेह का स्थायी इलाज समझना गलत होगा। सभी दवाएं प्रत्येक मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। इनके दुष्प्रभाव, लागत और अन्य बीमारियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

समीक्षा में एक महत्वपूर्ण चिंता यह भी व्यक्त की गई है कि वजन घटाने के लिए इन दवाओं के अनावश्यक इस्तेमाल से मधुमेह के वास्तविक मरीजों के लिए इनकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

अब मोबाइल फोन से भी रक्त शर्करा की निगरानी

आधुनिक तकनीक ने मधुमेह के उपचार को पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बनाया है।

पहले मरीजों को रक्त शर्करा जांचने के लिए बार-बार उंगली में सुई चुभोकर रक्त की बूंद निकालनी पड़ती थी। अब निरंतर ग्लूकोज निगरानी प्रणाली यानी सीजीएम के माध्यम से दिन और रात के दौरान शर्करा के स्तर में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।

इस तकनीक में त्वचा के नीचे एक छोटा सेंसर लगाया जाता है। यह कोशिकाओं के आसपास मौजूद द्रव में ग्लूकोज की मात्रा मापकर रक्त शर्करा के स्तर का अनुमान देता है। इसके आंकड़े मोबाइल फोन या अन्य उपकरण पर देखे जा सकते हैं।

इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि मरीज और चिकित्सक यह समझ सकते हैं कि भोजन, व्यायाम, नींद और दवाओं का शर्करा के स्तर पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

कुछ उपकरण शर्करा बहुत अधिक बढ़ने या खतरनाक स्तर तक घटने पर चेतावनी भी देते हैं।

इसके साथ इंसुलिन पंप की तकनीक भी विकसित हुई है। यह एक छोटा उपकरण है जो शरीर में निर्धारित मात्रा में इंसुलिन पहुंचाता रहता है।

नई प्रणालियों में ग्लूकोज सेंसर और इंसुलिन पंप को आपस में जोड़ा जा सकता है। इन्हें कभी-कभी कृत्रिम अग्न्याशय कहा जाता है। ये उपकरण शर्करा के स्तर के अनुसार इंसुलिन की मात्रा स्वचालित रूप से समायोजित करने में सहायता करते हैं, हालांकि कई प्रणालियों में मरीज की भागीदारी और निगरानी अभी भी आवश्यक रहती है।

भारत में इन तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन इनकी लागत और उपलब्धता बड़ी चुनौतियां हैं। विशेष रूप से इंसुलिन पर निर्भर मरीजों और बार-बार शर्करा घटने की समस्या वाले व्यक्तियों के लिए ये उपयोगी हो सकती हैं।

मधुमेह रोगियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह भी एक समस्या

इस वैज्ञानिक समीक्षा का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि शोधकर्ताओं ने केवल दवाओं और तकनीक पर ही नहीं, बल्कि मधुमेह के मरीजों के प्रति समाज के व्यवहार पर भी ध्यान दिया है।

अनेक लोगों की धारणा होती है कि मधुमेह केवल अधिक खाने, मिठाई खाने या आलस्य के कारण होता है। ऐसी धारणाएं बीमारी के वास्तविक जैविक कारणों की अनदेखी करती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार सामाजिक पूर्वाग्रह मरीज के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं। इससे वह अपनी बीमारी छिपाने, उपचार में लापरवाही करने या चिकित्सकीय सहायता लेने से बचने लग सकता है।

जापान में मधुमेह से संबंधित संगठनों ने वर्ष 2023 में बीमारी के नाम और उससे जुड़ी सामाजिक धारणाओं पर पुनर्विचार करने का प्रस्ताव भी रखा था।

समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि मधुमेह के उपचार का अंतिम उद्देश्य मरीज को केवल जांच रिपोर्ट में बेहतर आंकड़े देना नहीं, बल्कि उसे स्वस्थ व्यक्ति के समान सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जीने में सहायता करना होना चाहिए।

भारतीय मरीजों के लिए इस शोध के क्या मायने हैं?

जापानी शोधकर्ताओं की इस समीक्षा से भारतीय पाठकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं।

सबसे पहले, मधुमेह को केवल रक्त में शर्करा बढ़ने की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। यह ऐसी दीर्घकालिक बीमारी है जिसका असर हृदय, गुर्दों, आंखों, नसों और रक्तवाहिनियों पर पड़ सकता है। इसलिए समय-समय पर केवल शर्करा की जांच ही नहीं, बल्कि रक्तचाप, गुर्दों की कार्यक्षमता, आंखों और पैरों की जांच भी महत्वपूर्ण है।

दूसरा, मधुमेह की दवा का चुनाव केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कौन-सी दवा रक्त शर्करा सबसे अधिक घटाती है। मरीज को हृदय रोग, गुर्दों की बीमारी या मोटापे जैसी समस्याएं भी हैं या नहीं, यह निर्णय में महत्वपूर्ण हो सकता है।

तीसरा, भारतीय भोजन को पूरी तरह बदलना जरूरी नहीं है। आवश्यक है कि उसकी मात्रा, गुणवत्ता और पोषण संतुलन को व्यक्ति की जरूरतों के अनुसार व्यवस्थित किया जाए। अनावश्यक उपवास या अत्यधिक प्रतिबंधात्मक भोजन से नुकसान भी हो सकता है।

चौथा, नियमित व्यायाम दवाओं का विकल्प नहीं, बल्कि उपचार का महत्वपूर्ण सहयोगी है। विशेष रूप से दूसरे प्रकार के मधुमेह में शारीरिक गतिविधियां इंसुलिन की प्रभावशीलता सुधारने में मदद करती हैं।

पांचवां, आधुनिक तकनीक मरीज को अपनी बीमारी बेहतर ढंग से समझने और नियंत्रित करने में सहायता कर सकती है। लेकिन हर मरीज को महंगे उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती। उपचार का चुनाव चिकित्सकीय आवश्यकता और आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मधुमेह के मरीजों को यह समझना चाहिए कि बीमारी का निदान जीवन की सामान्य गतिविधियों के अंत का संकेत नहीं है। नियमित उपचार, संतुलित भोजन, व्यायाम और चिकित्सकीय निगरानी से अधिकांश लोग लंबे समय तक सक्रिय जीवन जी सकते हैं।

जुंटेंडो विश्वविद्यालय की यह समीक्षा मधुमेह के उपचार में हुए व्यापक बदलावों को सामने लाती है। हालांकि यह स्वयं किसी एक नई दवा का परीक्षण नहीं, बल्कि पहले से उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों और चिकित्सकीय उपलब्धियों की समीक्षा है। इसलिए इसके निष्कर्षों को मधुमेह का नया चमत्कारी इलाज नहीं, बल्कि प्रमाण-आधारित उपचार की दिशा में हुई प्रगति के रूप में समझना चाहिए।

मधुमेह चिकित्सा का भविष्य केवल शर्करा घटाने में नहीं, बल्कि बीमारी की जटिलताओं को रोकने, मरीज की जीवन प्रत्याशा बढ़ाने और उसके जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में निहित है।

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स्रोत: The Up-to-date Treatment for Diabetes and Prevention of its Complications, जुंटेंडो विश्वविद्यालय से संबंधित वैज्ञानिक समीक्षा लेख। प्रस्तुत सामग्री उपलब्ध शोध-पाठ पर आधारित है। भारतीय संदर्भ और सामान्य चिकित्सकीय स्पष्टीकरण अलग से जोड़े गए हैं।

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