अमेरिका के चुनाव नतीजे : विश्व राजनीति का बदलता परिदृश्य ?
— अनन्त आकाश —
विश्व राजनीति में इन दिनों उभरते घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। क्या राष्ट्रवाद, आक्रामक नेतृत्व और राजनीतिक ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता में पहुंचे नेताओं का प्रभाव कमजोर पड़ने लगा है? ब्राज़ील में वामपंथ की मजबूती, क्यूबा पर अमेरिकी प्रतिबंधों के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र में विरोध, इज़राइल में बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक चुनौतियां, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के विरुद्ध असंतोष और भारत में नरेंद्र मोदी सरकार पर विपक्ष का दबाव इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं। हालांकि इन घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनके बीच लोकतांत्रिक जवाबदेही और सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध प्रतिक्रिया का एक साझा सूत्र दिखाई देता है।
ब्राज़ील : दक्षिणपंथ के सामने वामपंथ की चुनौती
ब्राज़ील की राजनीति में लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा और बोल्सोनारो परिवार के बीच संघर्ष केवल दो नेताओं की प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि दो राजनीतिक विचारधाराओं का टकराव है। लूला सामाजिक कल्याण, श्रमिक अधिकारों और आर्थिक असमानता घटाने की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि बोल्सोनारो परिवार राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़ा है।
वर्ष 2022 में जायर बोल्सोनारो की पराजय ने स्पष्ट किया था कि आक्रामक राष्ट्रवाद चुनावी सफलता की स्थायी गारंटी नहीं है। ब्राज़ील में राजनीतिक ध्रुवीकरण अब भी गहरा है। लूला के सामने संसद में विरोध, आर्थिक चुनौतियां और सामाजिक विभाजन जैसी समस्याएं मौजूद हैं। इसलिए किसी चुनावी सफलता को दक्षिणपंथ के स्थायी पतन का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
यूरोप के बुल्गारिया सहित विभिन्न देशों में वामपंथी और उदारवादी शक्तियों की सक्रियता भी यह संकेत देती है कि राजनीतिक विकल्पों की तलाश जारी है। हालांकि प्रत्येक देश के परिणामों को उसके अपने राजनीतिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।
क्यूबा : अमेरिकी दबाव की सीमाएं
क्यूबा पर दशकों से लागू अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विवाद का विषय रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में इन प्रतिबंधों को समाप्त करने के पक्ष में बार-बार प्रस्ताव पारित होना अमेरिकी विदेश नीति के प्रति व्यापक असहमति को दर्शाता है।
इन प्रस्तावों का कानूनी रूप से बाध्यकारी न होना उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता समाप्त नहीं करता। अनेक देश मानते हैं कि आर्थिक प्रतिबंधों का सबसे अधिक नुकसान सामान्य नागरिकों को उठाना पड़ता है। दूसरी ओर अमेरिका क्यूबा में मानवाधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न उठाता रहा है।
यह विवाद बताता है कि सैन्य और आर्थिक शक्ति के बावजूद अमेरिका प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर वैश्विक सहमति हासिल नहीं कर सकता। लेकिन महासभा में किसी प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों की संख्या में परिवर्तन को भी ध्यान में रखना होगा। अंतरराष्ट्रीय असहमति और अमेरिकी प्रभाव के पूर्ण क्षरण में महत्वपूर्ण अंतर है।
इज़राइल : नेतन्याहू के सामने राजनीतिक चुनौती
इज़राइल में बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीति लंबे समय से सुरक्षा, राष्ट्रवाद और कठोर सैन्य नीति पर आधारित रही है। गाजा युद्ध, फिलिस्तीनी प्रश्न तथा घरेलू राजनीतिक विभाजन ने उनके नेतृत्व को गंभीर चुनौतियों के सामने खड़ा किया है।
इज़राइल के अरब और फिलिस्तीनी मूल के नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है। उनकी बढ़ती राजनीतिक सक्रियता समान नागरिक अधिकारों, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक समावेशन की मांग को मजबूत कर सकती है।
इज़राइली राजनीति की जटिलता यह है कि किसी एक दल का सबसे बड़ा दल बनना सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। गठबंधन निर्माण और संसद में बहुमत निर्णायक होते हैं। इसलिए नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति का मूल्यांकन केवल चुनावी लोकप्रियता से नहीं, बल्कि संभावित गठबंधनों और संसदीय समीकरणों से भी करना होगा।
इस संघर्ष का व्यापक संदेश यह है कि सुरक्षा संबंधी चिंताओं के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक समानता की अनदेखी दीर्घकाल में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकती है।
अमेरिका : ट्रम्प को मतदाताओं का झटका
तीन नवंबर के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीतिक स्थिति बदल दी है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। यह परिणाम ट्रम्प की नीतियों के प्रति बढ़ते जन-असंतोष का महत्वपूर्ण संकेत है।
ईरान युद्ध, महंगाई, ईंधन की बढ़ती कीमतों, आव्रजन नीति और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों ने रिपब्लिकन पार्टी की मुश्किलें बढ़ाईं। चुनाव परिणाम बताते हैं कि लोकप्रिय नेतृत्व भी आर्थिक परेशानियों और जनता की अपेक्षाओं की अनदेखी नहीं कर सकता।
कांग्रेस के दोनों सदनों में विपक्ष का बहुमत ट्रम्प के विधायी कार्यक्रम को बाधित कर सकता है। संसदीय जांच और प्रशासनिक निगरानी भी बढ़ सकती है। हालांकि राष्ट्रपति की वीटो शक्ति और कार्यकारी अधिकार बने रहेंगे। इसलिए चुनावी पराजय को ट्रम्प के राजनीतिक अंत के बजाय उनके अधिकारों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण की वापसी के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
भारत : विपक्ष की एकजुटता और लोकतांत्रिक सवाल
भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के सामने भी राजनीतिक चुनौतियां हैं। विपक्षी इंडिया गठबंधन चुनावी पारदर्शिता, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष की आपत्तियां गंभीर राजनीतिक बहस का विषय हैं। हालांकि मतदाताओं के नाम हटाए जाने संबंधी आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक जांच आवश्यक है। चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता तथा पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों की रक्षा लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।
भारत की परिस्थितियां अमेरिका या ब्राज़ील से भिन्न हैं। यहां मोदी सरकार का भविष्य भारतीय मतदाताओं, आर्थिक प्रदर्शन, सामाजिक समीकरणों और विपक्ष की संगठनात्मक क्षमता पर निर्भर करेगा। केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बदलावों के आधार पर भारत में सत्ता परिवर्तन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
क्या बदल जाएगा ट्रम्प-मोदी समीकरण?
ट्रम्प और मोदी के व्यक्तिगत संबंधों को अक्सर दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल नेताओं की व्यक्तिगत मित्रता पर आधारित नहीं होते। व्यापार, सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, चीन की बढ़ती शक्ति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सामरिक हित भारत-अमेरिका संबंधों के अधिक स्थायी आधार हैं।
अमेरिकी कांग्रेस में बदले राजनीतिक समीकरण ट्रम्प की विदेश और व्यापार नीतियों पर नियंत्रण बढ़ा सकते हैं। इसका प्रभाव भारत से जुड़े व्यापारिक समझौतों और कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर भी पड़ सकता है। फिर भी दोनों देशों के दीर्घकालिक हित किसी एक नेता की राजनीतिक सफलता या असफलता से कहीं व्यापक हैं। वास्तविक प्रश्न ट्रम्प-मोदी मित्रता के अंत का नहीं, बल्कि व्यक्तिकेंद्रित कूटनीति की सीमाओं का है।
मजबूत नेता की राजनीति का भविष्य
ब्राज़ील में लूला की जीत, इज़राइल में बदले संसदीय समीकरण और अमेरिका में रिपब्लिकन पराजय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देते हैं। लोकतंत्र में कोई नेता अजेय नहीं होता। आर्थिक कठिनाइयां, सामाजिक असमानता, युद्ध और राजनीतिक ध्रुवीकरण अंततः मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करते हैं।
लेकिन इन घटनाओं को विश्वव्यापी दक्षिणपंथ के निश्चित पतन की घोषणा मानना भी उचित नहीं होगा। विभिन्न देशों में दक्षिणपंथी शक्तियों का सामाजिक और चुनावी आधार अब भी मजबूत है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति किसी नेता के उदय या पतन में नहीं, बल्कि जनता की उस क्षमता में निहित है, जिसके माध्यम से वह सत्ता को जवाबदेह बनाती है। दुनिया के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि राष्ट्रीय हित, लोकतांत्रिक संस्थाएं और नागरिक अधिकार किसी भी शक्तिशाली नेता की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर होने चाहिये। (लेख में प्रकट विचार और तर्क लेखक के निजी हैं- एडमिन)

