रणजीत सिंह वर्मा और उत्तराखंड आंदोलन का दस्तावेजी इतिहास: संघर्ष, त्याग और विस्मृतियों की पुनर्रचना
◆ *नित्यानंद स्वामी को एमएलसी बनाने में रणजीत सिंह वर्मा का वह अहम योगदान, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज है*

–शीशपाल गुसाईं-
उत्तराखंड राज्य का प्रादुर्भाव केवल एक प्रशासनिक अथवा राजनीतिक पुनर्गठन की घटना भर नहीं थी, अपितु यह मध्य हिमालयी क्षेत्र के दीर्घकालिक लोक-संघर्ष, असंख्य जनों के आत्मोत्सर्ग, दमन की विभीषिका, माताओं-बहनों की साहसिक भागीदारी और उन अनगिनत अनाम प्रहरियों की जीवंत गाथा है जिन्होंने एक स्वतंत्र भौगोलिक और सांस्कृतिक अस्मिता के सपने को अपने जीवन का सर्वस्व समर्पित कर दिया था। इसी बहुआयामी और ऐतिहासिक संघर्ष के एक केंद्रीय एवं प्रखर हस्ताक्षर रहे मसूरी के पूर्व विधायक तथा राज्य आंदोलन के अग्रणी सेनानी रणजीत सिंह वर्मा के संपूर्ण जीवन-वृत्त, वैचारिक संघर्ष और जन-सरोकारों को समेटे हुए चार सौ छियालीस पृष्ठों के इस वृहद ग्रंथ का लोकार्पण देहरादून की साहित्यिक और वैचारिक भूमि पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बौद्धिक अनुष्ठान के रूप में संपन्न हुआ है। वरिष्ठ लेखक गंभीर सिंह पालनी के गहन शोध, रणजीत सिंह वर्मा के सुपुत्र अजय वर्मा तथा उनके परिजनों के सक्रिय और समर्पित सहयोग से मूर्त रूप प्राप्त यह कृति किसी व्यक्ति विशेष की पारंपरिक जीवनी तक सीमित नहीं है, वरन यह उत्तराखंड आंदोलन के एक विराट कालखंड का प्रामाणिक पुरालेखीय दस्तावेज है। इस ऐतिहासिक ग्रंथ को तैयार करने में लगे तीन वर्षों के लंबे अंतराल में पुराने अभिलेखों की खोज, तत्कालीन समाचार पत्रों की पीली पड़ चुकी कटिंगों के संकलन, आंदोलन के विविध पड़ावों से जुड़े संस्मरणों के पुनर्स्मरण और प्रत्यक्षदर्शियों की स्मृतियों को एक सूत्र में पिरोने का जो श्रमसाध्य कार्य किया गया है, वह इस कृति को अकादमिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट बनाता है।
इस पुस्तक का सबसे बड़ा और चिरस्थायी महत्व इसकी दस्तावेजी सत्यवादिता और प्रामाणिक संरचना में निहित है। इसमें केवल घटनाओं का सतही विवरण प्रस्तुत नहीं किया गया है, अपितु उस दौर के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित आलेखों, रिपोर्ताजों और साक्ष्यों को सहेजकर इतिहास-लेखन की उस विधा को जीवंत किया गया है जहां पत्रकारिता और इतिहास एक-दूसरे के पर्याय बन जाते हैं। देहरादून और मसूरी की गलियों से लेकर मुजफ्फरनगर की लहूलुहान सीमाओं तक फैले आंदोलन के ज्वलंत घटनाक्रमों को उस समय की मुद्रित सामग्री के माध्यम से पुनर्स्थापित किया गया है। यह पद्धति पाठक को केवल यह बोध नहीं कराती कि अमुक घटना घटी थी, बल्कि यह दृश्य भी प्रस्तुत करती है कि समकालीन जन-मानस और प्रेस ने उस दौर के संकटों को किस वैचारिक और तार्किक धरातल पर अनुभव एवं संप्रेषित किया था। मुजफ्फरनगर कांड की विभीषिका, मसूरी गोलीकांड के मर्मस्पर्शी प्रसंग और देहरादून के आंदोलनकारियों की सांगठनिक व जुझारू भूमिका जैसे गंभीर प्रसंगों को जिस तटस्थता और संवेदनशीलता के साथ पन्नों पर उतारा गया है, वह भविष्य के शोधार्थियों, इतिहासकारों और समाज-वैज्ञानिकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ सामग्री के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।
मुजफ्फरनगर कांड की वह खौफनाक और कालजयी स्मृति उत्तराखंड के सामूहिक अंतस को आज भी झकझोड़ देती है, और इस ग्रंथ ने उस त्रासदी के अनेक अनछुए पहलुओं को प्रामाणिक रूप से उजागर किया है। पुस्तक में इस बात का सूक्ष्म विवरण मिलता है कि किस प्रकार रणजीत सिंह वर्मा ने देहरादून से लगभग एक सौ दस वाहनों के विशाल काफिले का नेतृत्व करते हुए आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर की ओर कूच कराया था, जिसके लिए कई बसों की व्यवस्था उन्होंने अपने व्यक्तिगत संसाधनों और अदम्य सांगठनिक क्षमता के बल पर सुनिश्चित की थी। यह केवल किसी जन-प्रतिनिधि का नेतृत्व कौशल नहीं था, वरन आंदोलन के प्रति उनकी निष्ठा और जोखिम उठाने की अदम्य जिजीविषा का जीवंत प्रमाण था। मुजफ्फरनगर की धरती पर जब दमन और अराजकता का अंधकार गहराया और आंदोलनकारियों के लिए सुरक्षित स्थान ढूंढना भी दुर्लभ हो गया, तब लोग जान बचाने के लिए बसों के नीचे और घनी झाड़ियों में शरण लेने को विवश थे। ऐसी अकल्पनीय और भयावह परिस्थितियों में रणजीत सिंह वर्मा की भौतिक उपस्थिति ने वहां संघर्षरत सेनानियों के विचलित मनोबल को संबल प्रदान किया। कार्यक्रम के दौरान ऋषिकेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राजपाल खरोला द्वारा अपने पिता के साथ उस संकटपूर्ण यात्रा के संस्मरणों को साझा करना इस दस्तावेज के मानवीय और आत्मीय पक्ष को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है, जो केवल राजनीतिक इतिहास न होकर मानवीय संवेदनाओं का भी महाकाव्य बन जाता है।
सामूहिक आंदोलनों के इतिहास में अक्सर केवल उन अग्रिम पंक्ति के चेहरों की चर्चा होती है जो जनसभाओं और सड़कों पर मुखर रहते हैं, किंतु उन आंदोलनों की अदृश्य रीढ़ वे परिवार होते हैं जो चौखट के भीतर से इस महायज्ञ में अपनी आहुति देते हैं। रणजीत सिंह वर्मा का पारिवारिक परिवेश इस सामाजिक और नैतिक सहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण रहा है। वर्ष 1994 के उन दिनों में जब देहरादून का राजेंद्र नगर क्षेत्र कर्फ्यू, तनाव और अनिश्चितता की गिरफ्त में था, तब उनके घर के दरवाजे संकट में घिरे अज्ञात आंदोलनकारियों के लिए भोजन और आश्रय के रूप में खुले थे। जब पुलिस के दबाव और थकावट से चूर आंदोलनकारी उनके आवास पर पहुंचते थे, तो उनकी आत्मीय आवभगत और भोजन की व्यवस्था कर परिवार ने जिस नागरिक और मानवीय कर्तव्य का निर्वाह किया, वह जन-आंदोलनों की उस व्यापक संस्कृति को रेखांकित करता है जो केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि घर-घर से मिलने वाले नैतिक संबल से जीवित रहती है। मंच पर उपस्थित सिंचाई विभाग के पूर्व अधीक्षण अभियंता नरेंद्र सिंह चौहान जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा साझा किए गए संस्मरण इस बात के साक्षी हैं कि वर्मा परिवार ने किस प्रकार विपरीत परिस्थितियों में भी आंदोलनकारियों के साथ चट्टान की तरह खड़े रहकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का परिचय दिया था।
राजनीतिक परिदृश्य में सक्रियता और सत्ता-लालसा के बीच का महीन अंतर अक्सर धुंधला पड़ जाता है, किंतु रणजीत सिंह वर्मा का व्यक्तित्व इस विडंबना से पूरी तरह अछूता रहा, जैसा कि कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने उनके व्यक्तित्व के सबसे उज्ज्वल पक्ष को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया। सामान्यतः राजनीति के अखाड़े में उतरने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी व्यक्तिगत पद या महत्वाकांक्षा की सीढ़ी चढ़ना चाहता है, परंतु वर्मा जी इसके एक विरले अपवाद थे। उन्होंने राज्य गठन के पूर्व ही यह घोषणा कर दी थी कि पृथक राज्य के निर्माण के उपरांत वे किसी भी पद के लिए चुनाव नहीं लड़ेंगे, और इस संकल्प का उन्होंने राज्य गठन के बाद के अपने शेष लगभग उन्नीस वर्षों के दीर्घ जीवन में अत्यंत निष्ठा के साथ पालन किया। सत्ता की दौड़ और पद-लोभ से पूर्णतः विरत रहकर उन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत उपलब्धियों का माध्यम बनाने के बजाय समाजसेवा और लोक-कल्याण का एक पवित्र साधन माना। उनका राजनीतिक प्रभाव केवल मसूरी तक सीमित नहीं था, बल्कि उत्तर प्रदेश के दौर में नित्यानंद स्वामी को टिहरी ले जाकर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से एमएलसी के रूप में उनके राजनीतिक उत्थान की पृष्ठभूमि तैयार करना यह सिद्ध करता है कि वे परदे के पीछे रहकर योग्य नेतृत्व गढ़ने की कला में पारंगत थे।
व्यक्तिगत संबंधों की ऊष्मा और सामाजिक उत्तरदायित्व का ऐसा ही समन्वय हंस फाउंडेशन की प्रमुख माता मंगला के वक्तव्यों में भी स्पष्ट रूप से झलकता है, जिनका टिहरी के चंबा क्षेत्र से मौलिक और आत्मीय जुड़ाव रहा है। उन्होंने रणजीत सिंह वर्मा को समाज का सच्चा आईना बताते हुए यह रेखांकित किया कि ऐसे व्यक्तित्व भावी पीढ़ी के लिए इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि यह राज्य कितनी कुर्बानियों और संघर्षों की भट्टी में तपकर आकार ले पाया है। उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंधों की यह आत्मीयता केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित न रहकर एक व्यापक लोक-कल्याणकारी दृष्टि से जुड़ी थी, जहां निजी अनुग्रहों से ऊपर उठकर उन्होंने संपूर्ण क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दी। इसी प्रकार, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा उनके सरल, निस्वार्थ और संघर्षशील स्वभाव का स्मरण करना तथा वर्ष 2008 में डॉ. महेश कुड़ियाल द्वारा किए गए उनके सफल शल्य-चिकित्सा के प्रसंग को याद करना यह प्रमाणित करता है कि रणजीत सिंह वर्मा का प्रभाव केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ उनके अंतरंग और आत्मीय संबंधों का परिणाम था।
तथापि, यह ऐतिहासिक दस्तावेज केवल अतीत की गौरवगाथाओं के रोमंथन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वर्तमान से तीखे और प्रासंगिक सवाल भी पूछता है, जैसा कि राज्य आंदोलनकारी संगठन के प्रदेश प्रवक्ता प्रदीप कुकरेती ने इस तथ्य को उजागर कर किया कि राज्य निर्माण का वर्तमान ढांचा आज भी उन आदर्शों और मूल आकांक्षाओं के पूर्णतः अनुरूप नहीं ढल पाया है जिनके लिए उत्तराखंड के दीवानों ने अपनी जवानी और सुख का होम किया था। यह प्रश्न इतिहास को वर्तमान की कसौटी पर परखने का एक अनिवार्य उपक्रम है। रणजीत सिंह वर्मा का सरोकार केवल मसूरी की राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि डोईवाला क्षेत्र में लंबे समय तक गन्ना समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी सक्रियता और हिमालयन संस्थान एवं अस्पताल की स्थापना के लिए स्थानीय कृषकों और ग्रामीणों को समझाकर भूमि की उपलब्धता का मार्ग प्रशस्त करना उनके बहुआयामी विकास-दृष्टि का परिचायक है। आज जब वह चिकित्सा संस्थान हजारों संतापग्रस्त रोगियों के लिए जीवनदायिनी बना हुआ है, तो इसके मूल में वर्मा जी की वह सामाजिक स्वीकार्यता और विश्वसनीयता कार्य कर रही थी जिसके बिना इतने बड़े लोक-संस्थान का धरातल पर उतरना असंभव था।
यह ग्रंथ अंततः किसी एक व्यक्ति की जीवन-कथा न बनकर उस पूरी पीढ़ी का दस्तावेज बन जाता है जिसने अभावों, यंत्रणाओं और दमन के बीच एक नई प्रशासनिक और सांस्कृतिक इकाई को जन्म दिया। आज की युवा पीढ़ी के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि उत्तराखंड की भौगोलिक सीमाएं हमें किसी थाती में नहीं मिली हैं, बल्कि इसके लिए बकायदा बौद्धिक और शारीरिक रक्तपात की एक लंबी श्रृंखला से गुजरना पड़ा है। लोगों ने अपनी आजीविकाएं छोड़ीं, जेलों की कालकोठरियां भुगतीं, पुलिस की लाठियां खाईं और परिवारों ने अपने अंतिम संसाधनों को इस आंदोलन की वेदी पर समर्पित किया। रणजीत सिंह वर्मा उसी जुझारू पीढ़ी के एक ऐसे प्रखर प्रतीक थे जिन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि सार्वजनिक जीवन में रहकर भी किस प्रकार पूर्णतः निस्वार्थ, अपरिग्रही और लोक-समर्पित रहा जा सकता है। यह चार सौ छियालीस पृष्ठों की कृति केवल एक दिवंगत सेनानी को दी गई श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि यह उन समस्त ज्ञात और अज्ञात आंदोलनकारियों के ललाट पर सजा वह विजय-तिलक है, जिसने देवभूमि के भूगोल में एक नई न्यायपूर्ण राजनीति और नागरिक चेतना का बीजगणित रचा था, और यही इस ग्रंथ की महत्ता का सबसे अकाट्य और शाश्वत प्रमाण है।

