मुक्तिबोध की 59वीं पुण्यतिथि पर*सादर नमन !
-अनंत आकाश
आज कवि मुक्तिबोध की 59 वीं पुण्य तिथि है ,11 सितम्बर 1964 को मात्र 47 वर्ष की अल्पायु में दिल्ली के एम्स में उनका निधन हो गया था । उनका जन्म श्योपुर मुरैना ग्वालियर में 13/नवम्बर 1917 को हुआ । उन्होने स्नाकोत्तर इन्दौर होल्कर महाविद्यालय से किया । वे मूलरूप से महाराष्ट्री थे , वे आधुनिक हिन्दी साहित्य के संभावना के एकमात्र ऐसे कवि थे जिनके जीवनकाल में उनका कविता संग्रह नहीं निकला । उनका पहला कविता संग्रह ” चाँद का मुंह टेडा है ” साहित्यकार श्रीकांत वर्मा और अशोक बाजपेयी के प्रयास से प्रकाशित हो पाया ।

अपने निधन के बाद मुक्तिबोध सहसा कविता परिदृष्य पर छा गए । नेमीचंद जैन के सम्पादन में 1980 में मुक्तिबोध रचनावली निकलने के बाद उनपर पुस्तक लिखने की बाढ़ सी आ गई ।
इस महान कवि को उनकी पुण्य तिथि पर सादर नमन । प्रस्तुत है कविता ।
*सहर्ष स्वीकारा है*
_* गजानन माधव मुक्तिबोध *_
*ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी है*
*सहर्ष स्वीकारा है;*
*इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है*
*वह तुम्हें प्यारा है।*
*गरबीली ग़रीबी यह, ये गंभीर* *अनुभव सब*
*यह विचार-वैभव सब*
*दृढ़्ता यह, भीतर की सरिता यह* *अभिनव सब*
*मौलिक है, मौलिक है*
*इसलिए के पल-पल में*
*जो *कुछ* *भी जाग्रत है* *अपलक* *है–**
*संवेदन तुम्हारा है !!*
*जाने क्या रिश्ता है,जाने क्या* *नाता है*
*जितना भी उँड़ेलता हूँ,भर भर* *फिर आता है*
*दिल में क्या झरना है?*
*मीठे पानी का सोता है*
*भीतर वह, ऊपर तुम*
*मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर* *रात-भर*
*मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता* *वह चेहरा है!*
*सचमुच मुझे दण्ड दो कि भूलूँ मैं* *भूलूँ मैं*
*तुम्हें भूल जाने की*
*दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या*
*शरीर पर,चेहरे पर, अंतर में पा लूँ* *मैं*
*झेलूँ मै, उसी में नहा लूँ मैं*
*इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित* *आच्छादित*
*रहने का रमणीय यह उजेला अब*
*सहा *नहीं* *जाता है।**
*नहीं सहा जाता है।*
*ममता के बादल की मँडराती* *कोमलता–*
*भीतर पिराती है*
*कमज़ोर और अक्षम अब हो गयी* *है आत्मा यह*
_छटपटाती छाती को भवितव्यता_ *डराती है*
*बहलाती सहलाती आत्मीयता* *बरदाश्त नही होती* *है !!!*
*सचमुच मुझे दण्ड दो कि हो जाऊँ*
*पाताली अँधेरे की गुहाओं में* *विवरों में*
*धुएँ के बाद्लों में*
*बिलकुल मैं लापता!!*
*लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही* *सहारा है!!*
*इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है*
या *मेरा जो होता-सा लगता है,* _होता सा संभव है_
_सभी वह तुम्हारे ही कारण के_ _कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव_ है
*_अब तक तो ज़िन्दगी में जो* *कुछ_ था,* *जो कुछ है*
*सहर्ष स्वीकारा है*
*इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है*
*वह तुम्हें प्यारा है ।*
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अनन्त आकाश
9410365899
