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क्या एआई छेड़ सकता है जैविक हथियारों की नई होड़?

Today’s chatbots aren’t likely to help lone actors invent a deadly pathogen, experts say. But newer models, trained in biology, may need stronger safeguards.

आज के चैटबॉट से खतरा सीमित, लेकिन जीव विज्ञान सीख रहे नए एआई मॉडल ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता

 

कुछ वर्ष पहले तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई से सबसे बड़ा डर यह था कि वह नौकरियां छीन सकती है, गलत सूचनाएं फैला सकती है या साइबर अपराधियों की ताकत बढ़ा सकती है। अब वैज्ञानिकों के सामने कहीं अधिक गंभीर सवाल खड़ा हो रहा है—क्या भविष्य में एआई किसी वायरस या दूसरे रोगजनक को इतना बदलने या नया बनाने में मदद कर सकता है कि वह जैविक हथियार बन जाए?

फिलहाल इसका सीधा जवाब है—आज उपलब्ध सामान्य चैटबॉट अपने बूते किसी व्यक्ति को नया घातक वायरस बनाने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन जीव विज्ञान के लिए तैयार हो रहे नई पीढ़ी के विशेष एआई मॉडल भविष्य की तस्वीर बदल सकते हैं। यही संभावना जैव-सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा रही है।

हाल के महीनों में कई घटनाओं ने इस बहस को तेज किया है। जैव-सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि चैटबॉट से रोगजनकों के बारे में संवेदनशील वैज्ञानिक जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा सकती है। वैज्ञानिकों और एआई विशेषज्ञों ने डीएनए निर्माण से जुड़ी जांच व्यवस्था मजबूत करने की मांग भी की है।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने एआई की मदद से ऐसे वायरस तैयार किए जो प्रकृति में पहले मौजूद नहीं थे। ये प्रयोग मनुष्य के लिए घातक वायरस पर नहीं, बल्कि बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले हानिरहित वायरसों पर किए गए थे। फिर भी इस उपलब्धि ने एक बड़ा सवाल पैदा कर दिया—यदि एआई नया वायरस बना सकता है तो उसकी सीमा आखिर कहां है?

अभी डर कितना वास्तविक है?

इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय सावधानी भरी है, लेकिन घबराहट वाली नहीं।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के सिंथेटिक बायोलॉजिस्ट ड्रू एंडी का मानना है कि वर्तमान चैटबॉट जैविक हथियारों के मौजूदा खतरे को बहुत अधिक नहीं बढ़ाते। असली चिंता भविष्य की उन एआई प्रणालियों को लेकर है जिन्हें सामान्य भाषा और पुस्तकों के बजाय डीएनए, जीन और कोशिकाओं के वास्तविक वैज्ञानिक आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया जा रहा है।

सामान्य चैटबॉट पहले से मौजूद वैज्ञानिक ज्ञान को तेजी से खोज, जोड़ और समझा सकते हैं। लेकिन जीव विज्ञान के विशेष एआई मॉडल उससे आगे जाकर जैविक संरचनाओं के ऐसे पैटर्न पहचान सकते हैं जिन्हें मनुष्य ने पहले नहीं देखा।

यहीं से संभावना भी शुरू होती है और खतरा भी।

जैविक हथियार एआई से बहुत पुराने हैं

एआई ने जैविक हथियारों का खतरा पैदा नहीं किया है। बीमारी को हथियार बनाने की कोशिश सदियों पुरानी है।

1346 में काला सागर के किनारे कैफा शहर की घेराबंदी के दौरान प्लेग से मरे लोगों के शव शहर के भीतर फेंके जाने का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन एजेंटों ने पशुओं को संक्रमित करने के लिए बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया।

बीसवीं सदी में विज्ञान आगे बढ़ा तो जैविक हथियार भी अधिक संगठित हो गए। बड़ी शक्तियों ने एंथ्रेक्स सहित अनेक रोगजनकों और विषैले जैविक पदार्थों पर सैन्य कार्यक्रम चलाए।

अंतरराष्ट्रीय समझौतों ने जैविक युद्ध पर रोक लगाई, लेकिन खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अमेरिका और सोवियत संघ जैसे देशों ने कभी बड़े जैविक हथियार कार्यक्रम चलाए। जैविक हथियार सम्मेलन लागू होने के बाद अमेरिका ने अपना घोषित भंडार नष्ट कर दिया, जबकि सोवियत संघ पर बाद में भी गुप्त कार्यक्रम जारी रखने के आरोप लगे।

इसलिए समस्या एआई के जन्म से बहुत पुरानी है। फर्क यह है कि एआई अब जैव प्रौद्योगिकी की पहले से बढ़ चुकी ताकत को और तेज कर सकता है।

डीएनए अब प्रयोगशाला से ‘ऑर्डर’ भी किया जा सकता है

आधुनिक जीव विज्ञान में सबसे बड़ा बदलाव डीएनए संश्लेषण तकनीक में आया है। वैज्ञानिक किसी जीव का आनुवंशिक क्रम कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं और विशेष कंपनियों से उस क्रम के आधार पर डीएनए के टुकड़े तैयार करवा सकते हैं।

इसकी ताकत 2016 के एक प्रयोग से समझी जा सकती है। कनाडा के वैज्ञानिकों ने हॉर्सपॉक्स नामक वायरस को उसके आनुवंशिक अनुक्रम के आधार पर दोबारा तैयार किया। इसके लिए डीएनए के टुकड़े बनवाए गए और बाद में उन्हें जोड़कर वायरस तैयार किया गया।

तब यह कठिन और महंगा काम था। आज डीएनए संश्लेषण पहले से तेज और सस्ता हो चुका है।

यहीं एआई एक नया तत्व जोड़ता है। पहले किसी व्यक्ति को हजारों वैज्ञानिक शोधपत्र पढ़ने और उनमें उपयोगी जानकारी खोजने में महीनों लग सकते थे। एआई यही काम बहुत तेजी से कर सकता है।

सामान्य चैटबॉट और ‘जीव विज्ञान सीखने वाले’ एआई में फर्क

आज के बड़े भाषा मॉडल विशाल मात्रा में लिखित सामग्री पढ़कर प्रशिक्षित किए जाते हैं। वे वैज्ञानिक शोधपत्रों में मौजूद जानकारी खोज सकते हैं और अलग-अलग अध्ययनों के बीच संबंध जोड़ सकते हैं।

लेकिन नई पीढ़ी के कुछ मॉडल सीधे डीएनए और जैविक आंकड़ों से सीख रहे हैं।

ऐसा ही एक मॉडल ‘इवो2’ है, जिसे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और आर्क इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने विकसित किया। इसे लाखों प्रजातियों के डीएनए अनुक्रमों पर प्रशिक्षित किया गया। इसने आनुवंशिक पैटर्न सीखकर नए प्रकार के जैविक डिजाइन तैयार करने की क्षमता दिखाई।

वैज्ञानिकों ने बाद में इसे माइक्रोविरिड नामक वायरस समूह के जीनोम पर प्रशिक्षित किया। ये वायरस मनुष्यों को संक्रमित नहीं करते, बल्कि ई. कोलाई बैक्टीरिया को निशाना बनाते हैं।

एआई ने लाखों संभावित नए जीनोम सुझाए। इनमें से 16 वास्तव में सक्रिय वायरस के रूप में काम कर सके।

यही उपलब्धि वैज्ञानिक दृष्टि से रोमांचक है और जैव-सुरक्षा के लिहाज से चेतावनी भी।

क्या एआई नया घातक वायरस बना सकता है?

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी।

इवो2 को जानबूझकर मनुष्य या उससे संबंधित जीवों को संक्रमित करने वाले वायरसों के आंकड़ों पर प्रशिक्षित नहीं किया गया। छोटे और सरल वायरस का नया जीनोम बनाना तथा चेचक जैसे विशाल और जटिल वायरस में सफल बदलाव करना दो बिल्कुल अलग चुनौतियां हैं।

इसलिए यह कल्पना करना गलत होगा कि कोई व्यक्ति लैपटॉप पर एआई खोलकर आसानी से महामारी पैदा करने वाला वायरस बना सकता है।

लेकिन विशेषज्ञ भविष्य की क्षमता को लेकर चिंतित हैं। पर्याप्त जैविक आंकड़ों और अधिक शक्तिशाली मॉडल के साथ एआई ऐसे आनुवंशिक बदलावों की भविष्यवाणी करने में बेहतर हो सकता है जो किसी रोगजनक के व्यवहार को बदल दें।

सबसे बड़ा खतरा अकेला व्यक्ति नहीं, सरकारें भी

जैव-सुरक्षा विशेषज्ञों की एक और चिंता अधिक गंभीर है।

अक्सर एआई के दुरुपयोग की चर्चा किसी अकेले ‘बायोहैकर’ के संदर्भ में होती है। लेकिन अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, प्रशिक्षित वैज्ञानिकों, धन और सरकारी संसाधनों से लैस किसी राज्य के हाथ में यही तकनीक कहीं अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

यदि देशों को संदेह होने लगे कि उनके प्रतिद्वंद्वी एआई की मदद से जैविक हथियार विकसित कर रहे हैं, तो वे स्वयं भी उसी दिशा में अनुसंधान बढ़ा सकते हैं। तब खतरा किसी एक वायरस का नहीं, बल्कि नई जैविक हथियार होड़ का होगा।

इतिहास बताता है कि हथियारों की होड़ अक्सर इसी अविश्वास से जन्म लेती है—एक देश तैयारी करता है क्योंकि उसे लगता है कि दूसरा देश तैयारी कर रहा है।

समाधान एआई रोकना नहीं, जैव-सुरक्षा मजबूत करना है

इस खतरे का अर्थ यह नहीं कि जैविक अनुसंधान या एआई को रोक दिया जाए। यही तकनीक नई दवाएं, टीके, बेहतर उपचार और उपयोगी जैविक पदार्थ विकसित करने में असाधारण मदद कर सकती है।

चुनौती है—लाभकारी विज्ञान को आगे बढ़ाते हुए उसके दुरुपयोग के रास्ते बंद करना।

इसके लिए डीएनए बनाने वाली कंपनियों द्वारा संदिग्ध आनुवंशिक अनुक्रमों की जांच, एआई मॉडल में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और संवेदनशील जैविक अनुसंधान की निगरानी महत्वपूर्ण हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय जैविक हथियार समझौतों को नई तकनीक के अनुरूप मजबूत करने की जरूरत भी बढ़ रही है।

लेकिन ड्रू एंडी इससे भी आगे की बात करते हैं। उनके अनुसार केवल यह रोकना पर्याप्त नहीं कि कोई जैविक हथियार न बनाए। दुनिया को ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी जो किसी भी नई महामारी का तेजी से पता लगा सके—चाहे वह प्रकृति से आई हो या मनुष्य ने बनाई हो।

अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों में हवा में मौजूद खतरनाक रोगजनकों को पहचानने वाले सेंसर जैसी तकनीक भविष्य में ऐसी सुरक्षा का हिस्सा बन सकती है।

असली सवाल एआई नहीं, हमारी तैयारी है

एआई और जीव विज्ञान का मेल मानव इतिहास की सबसे उपयोगी वैज्ञानिक साझेदारियों में से एक बन सकता है। इससे नई दवाओं और टीकों की खोज तेज हो सकती है, दुर्लभ बीमारियों को समझने में मदद मिल सकती है और नए जैविक समाधान सामने आ सकते हैं।

लेकिन वही शक्ति गलत हाथों में जोखिम भी पैदा करती है।

आज कोई सामान्य चैटबॉट अकेले जैविक हथियार बनाने की मशीन नहीं है। खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उतना ही गलत होगा जितना भविष्य की संभावनाओं को नजरअंदाज करना।

असल चुनौती यह है कि एआई की जैविक क्षमताएं जिस गति से बढ़ रही हैं, क्या दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था भी उसी गति से आगे बढ़ रही है?

क्योंकि भविष्य में सवाल शायद यह नहीं होगा कि एआई जीव विज्ञान में क्या कर सकता है। अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह होगा—हमने उसे क्या करने दिया और उसके गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कितनी पहले तैयारी की।

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