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मेरी लेखकीय यात्रा : पत्रकारिता से पुस्तकों तक

My writing journey has grown naturally out of a life devoted to journalism since 1978. Working with newspapers and news agencies gave me the experience, curiosity and discipline that later shaped my books. Interestingly, many were conceived and written during periods of unemployment between journalistic assignments, turning uncertainty into creative opportunity. Encouragement from Mahendra Kunwar, Kirti Nawani and others helped transform research into published works, including books with the National Book Trust, India. I may not have accumulated great material wealth, but I cherish a different inheritance—my books, which I hope will remain useful to researchers, journalists and future generations.

–जयसिंह रावत –

मेरी लेखकीय यात्रा मेरी पत्रकारिता की यात्रा से अलग नहीं है, बल्कि उसी का विस्तार है। मैंने 1978 में पेशेवर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और उसके बाद विभिन्न समाचार पत्रों, समाचार एजेंसियों तथा अन्य समाचार माध्यमों में काम करते हुए जीवन का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता को समर्पित किया। इस लंबी यात्रा में नौकरियां बदलीं, संस्थान बदले और कई बार दो नौकरियों के बीच बेरोजगारी तथा पेशेवर अनिश्चितता के दौर भी आए। दिलचस्प संयोग यह रहा कि मेरी अधिकांश पुस्तकों की कल्पना और उनके लेखन की शुरुआत ऐसे ही अंतरालों में हुई।

जब अखबार की नियमित नौकरी मेरे पास नहीं होती थी, तब भी पत्रकार मेरे भीतर सक्रिय रहता था। समाचारों की रोजमर्रा की आपाधापी से मिले उस विराम ने मुझे उन विषयों पर गंभीरता से सोचने, पढ़ने और शोध करने का समय दिया, जिन्हें दैनिक पत्रकारिता में पर्याप्त विस्तार देना संभव नहीं था। इस तरह बेरोजगारी के वे दौर, जो सामान्यतः जीवन के कठिन और चिंताजनक समय माने जाते हैं, मेरे लिए सृजन के अवसर भी बनते गए। शायद इसीलिए मेरी कई पुस्तकें जीवन के सबसे अनिश्चित दिनों में सोची और लिखी गईं।

 

मेरी पहली पुस्तक ग्रामीण पत्रकारिता पर थी। इसके पीछे हार्क  के भाई महेंद्र कुंवर की प्रेरणा थी। उन्होंने मुझे ग्रामीण समाज और पत्रकारिता के उस पक्ष को पुस्तक के रूप में सामने लाने के लिए प्रेरित किया, जो मुख्यधारा की पत्रकारिता में अपेक्षित स्थान नहीं पा रहा था। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने उत्तराखंड की जनजातियों पर शोध किया। बाद में इस शोध को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने में विंसर पब्लिशिंग कंपनी के कीर्ति नवानी की प्रेरणा और सहयोग महत्वपूर्ण रहा।

कीर्ति नवानी जी का प्रोत्साहन मेरी लेखकीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ बना। उनकी प्रेरणा से एक के बाद एक पुस्तक लिखने का सिलसिला आगे बढ़ता गया। उन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास भी मजबूत किया कि उत्तराखंड के इतिहास, समाज, संस्कृति, जनजातियों और जनजीवन से जुड़ी सामग्री को केवल समाचारों में दर्ज करना पर्याप्त नहीं है; उसे संदर्भ ग्रंथों के रूप में भी भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जाना चाहिए।

इसी क्रम में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से भी मेरी पुस्तकें प्रकाशित हुईं। मेरे लिए यह केवल लेखक के रूप में उपलब्धि नहीं थी। अधिक संतोष इस बात का था कि उत्तराखंड से जुड़े जिन विषयों पर मैंने वर्षों तक एक पत्रकार की दृष्टि से देखा, समझा और सामग्री जुटाई, वे पुस्तक के रूप में राष्ट्रीय स्तर के पाठकों तक पहुंचे।

इस वर्ष देहरादून में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पुस्तक मेले में मुझे अपनी इस यात्रा को एक अलग दृष्टि से देखने का अवसर मिला। एनबीटी के स्टॉल पर मेरी कई पुस्तकें प्रदर्शित थीं और उनका उपलब्ध भंडार शीघ्र समाप्त हो गया। विभिन्न प्रकाशकों की ओर से मेले में मेरी आठ पुस्तकें रखी गई थीं। उत्तराखंड के लेखकों में डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की पुस्तकें सर्वाधिक थीं और उनके बाद मेरी पुस्तकों की संख्या थी। कुछ लोग अपनी पुस्तकें स्वयं प्रकाशित कराकर मेले में लाए थे, जबकि मेरी पुस्तकें उनके प्रकाशकों द्वारा प्रदर्शित की गई थीं।

उस मेले में अपनी पुस्तकों को एक साथ देखकर मुझे उन दिनों की याद आना स्वाभाविक था, जब इनमें से कई पुस्तकों के बीज पड़े थे। वे मेरे जीवन के बहुत सुविधाजनक दिन नहीं थे। कई बार नौकरी नहीं थी, भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी, लेकिन मेरे पास समय था, पत्रकारिता से अर्जित अनुभव था और लिखने की बेचैनी थी। आज लगता है कि जीवन के उन्हीं खाली दिखाई देने वाले अंतरालों में मेरी सबसे स्थायी पूंजी तैयार हो रही थी।

मैंने जीवन में बहुत धन-दौलत नहीं कमाई और न ही शोहरत की दौड़ को कभी अपनी मंजिल बनाया। लगभग आधी सदी की पत्रकारिता ने मुझे समाज और इतिहास को बहुत करीब से देखने का अवसर दिया। पत्रकारिता ने मुझे तथ्य तलाशना सिखाया, सवाल करना सिखाया और अपने समय को दर्ज करने की जिम्मेदारी का अहसास कराया। पुस्तकों ने उसी अनुभव को समाचार की क्षणभंगुरता से निकालकर कुछ अधिक स्थायी बनाने का अवसर दिया।

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि मेरी वास्तविक कमाई शायद यही पुस्तकें हैं। जीवन ने भले ही बहुत बड़ी भौतिक संपदा न दी हो, लेकिन पुस्तकों की एक विरासत अवश्य दी है।

लेखक की उम्र सीमित होती है, पुस्तक की नहीं। लेखक के चले जाने के बाद भी उसके द्वारा दर्ज इतिहास, तथ्य, अनुभव और स्मृतियां आने वाली पीढ़ियों से संवाद कर सकती हैं। मेरी भी यही छोटी-सी आकांक्षा है कि मेरी पुस्तकें केवल मेरे नाम से जुड़ी वस्तुएं बनकर न रह जाएं। वे भविष्य के विद्यार्थियों, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और उत्तराखंड को जानने-समझने वाली पीढ़ियों के काम आएं।

यदि आने वाले समय में कोई शोधार्थी मेरी किसी पुस्तक में अपने सवाल का कोई तथ्य खोज पाए, कोई पत्रकार उससे संदर्भ ले सके या कोई युवा अपने प्रदेश के इतिहास और समाज को थोड़ा बेहतर समझ सके, तो मुझे लगेगा कि मेरा लिखना सार्थक हुआ।

अंततः मेरी लेखकीय यात्रा की कहानी शायद इतनी ही है—जब हाथ में अखबार की नौकरी थी, तब मैंने अपने समय को समाचारों में दर्ज किया; और जब नौकरी के बीच खालीपन आया, तो उसी समय को पुस्तकों में दर्ज करने की कोशिश की। आज वे पुस्तकें ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी और आने वाली पीढ़ियों के लिए मेरी छोटी-सी विरासत हैं। इस कठिन संघर्ष भरी यात्रा में मेरे परिवार को सबसे बड़ा योगदान रहा. मेरे परिवार को मेरे पत्रकारिता के शौक और जूनून ने बहुत कष्ट दिए.  में थोड़ा बहुत मैं कुछ कर पाया तो उसमे मेरे भाई शिव सिंह रावत का अविष्मरणीय योगदान कभी नहीं भूल सकता ।  अन्यथा मैं गांव में अनपढ़ ही रहता . मेरा हौसला बढ़ाने वालों की कमी नहीं, मैं उन सबका तहे दिल से आभारी हूँ. 

 

 ( लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी है. -एडमिन )

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