जलवायु परिवर्तन की लगातार भयावह होती खबरों के बीच कोरल रीफ्स के लिए उम्मीद की किरण
नई शोध में दुनिया भर के उन क्षेत्रों की पहचान की गई है जहां ठंडी धाराएं और अन्य अनुकूल परिस्थितियां ग्लोबल वार्मिंग के सबसे बुरे प्रभावों से कोरल की रक्षा करने में मदद कर रही हैं।
-कैथरीन हाउरेल्ड-
(नैरोबी, केन्या से रिपोर्टिंग)
जलवायु परिवर्तन की लगातार भयावह होती खबरों के बीच दुनिया के कोरल रीफ्स (प्रवाल भित्तियों) के लिए एक राहतभरी सूचना सामने आई है। वैज्ञानिकों ने ऐसे समुद्री क्षेत्रों की पहचान की है, जहां प्रकृति स्वयं कोरल को ग्लोबल वार्मिंग के सबसे गंभीर प्रभावों से बचाने में मदद कर रही है। ठंडी समुद्री धाराएं, कम तीव्र सूर्य प्रकाश और अपेक्षाकृत सुरक्षित भौगोलिक स्थिति इन क्षेत्रों को कोरल के लिए प्राकृतिक शरणस्थल बना रही हैं।
वर्षों से वैज्ञानिक चेतावनी देते रहे हैं कि बढ़ता समुद्री तापमान दुनिया की प्रवाल भित्तियों को तेजी से नष्ट कर रहा है। लेकिन अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से किए गए एक नए अध्ययन ने आशा की एक नई किरण दिखाई है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि इन प्राकृतिक शरणस्थलों का समय रहते संरक्षण किया जाए तो वे भविष्य में समुद्री जैव विविधता को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन को हाल ही में केन्या के मोम्बासा में आयोजित ‘अवर ओशन कॉन्फ्रेंस’ में प्रस्तुत किया गया। अध्ययन अभी वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशन के लिए समीक्षा प्रक्रिया से गुजर रहा है।
शोधकर्ताओं ने 42 ऐसे पर्यावरणीय कारकों की पहचान की जो कोरल के जीवित रहने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं। इसके बाद उन्होंने पिछले 65 वर्षों में दुनिया भर से एकत्र किए गए लगभग 38,000 कोरल अवलोकनों का विश्लेषण किया। एआई आधारित मॉडल ने 72 देशों में 5,800 वर्ग मील से अधिक समुद्री क्षेत्र को ऐसे संभावित “रिफ्यूजिया” यानी सुरक्षित शरणस्थलों के रूप में चिह्नित किया, जहां कोरल अपेक्षाकृत अधिक समय तक टिके रह सकते हैं।
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले 2018 की चर्चित “50 रीफ्स स्टडी” में जितने सुरक्षित क्षेत्र चिन्हित किए गए थे, नए अध्ययन में उनकी संख्या लगभग तीन गुना अधिक पाई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे संरक्षण की प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिलेगी और सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।
कोरल रीफ्स को अक्सर समुद्र के वर्षावन कहा जाता है। पृथ्वी की लगभग एक-चौथाई समुद्री प्रजातियां अपने जीवन के किसी न किसी चरण में इन पर निर्भर रहती हैं। करोड़ों लोगों के भोजन का आधार बनने वाली मछलियां भी इन्हीं पारिस्थितिक तंत्रों से जुड़ी हैं। इतना ही नहीं, प्रवाल भित्तियां तटीय क्षेत्रों को समुद्री तूफानों और कटाव से बचाने में प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती हैं।
लेकिन बढ़ते तापमान ने इन अमूल्य पारिस्थितिक तंत्रों को गंभीर संकट में डाल दिया है। जब समुद्र का पानी अत्यधिक गर्म हो जाता है, तो कोरल अपने भीतर रहने वाले सूक्ष्म शैवालों को बाहर निकाल देते हैं। इस प्रक्रिया को ‘कोरल ब्लीचिंग’ या प्रवाल विरंजन कहा जाता है। इससे कोरल सफेद पड़ जाते हैं और यदि गर्मी लंबे समय तक बनी रहे तो उनकी मृत्यु हो जाती है।
जैव विविधता पर वैश्विक वैज्ञानिक पैनल आईपीबीईएस के अध्यक्ष डेविड ओबुरा के अनुसार, “तापमान में हर अतिरिक्त दसवां डिग्री कोरल रीफ्स को उनकी सहनशीलता की सीमा तक पहुंचा देता है।”
वैज्ञानिकों की चिंता बेबुनियाद नहीं है। ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रणाली, ग्रेट बैरियर रीफ, आने वाली एक पीढ़ी के भीतर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। इसी तरह हाल के अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि इस शताब्दी के अंत तक अटलांटिक महासागर के अधिकांश कोरल बढ़ना बंद कर सकते हैं और धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो सकते हैं।
नए अध्ययन में पहचाने गए सुरक्षित क्षेत्र दुनिया भर में समान रूप से नहीं फैले हैं। इनमें से आधे से अधिक बहामास, क्यूबा, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में स्थित हैं। इसके अलावा वानुअतु, अमेरिकन सामोआ, क्रिसमस द्वीप और चागोस द्वीपसमूह जैसे छोटे द्वीपीय क्षेत्रों के आसपास भी महत्वपूर्ण शरणस्थल मिले हैं।
हालांकि इन क्षेत्रों की पहचान अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। कई सुरक्षित माने जाने वाले रीफ्स अत्यधिक मत्स्य दोहन, प्लास्टिक प्रदूषण और तटीय विकास गतिविधियों के दबाव में हैं। इनमें से अनेक संरक्षित क्षेत्र केवल कागजों तक सीमित हैं, क्योंकि उनके प्रभावी प्रबंधन और निगरानी के लिए पर्याप्त धन और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
यही कारण है कि यह शोध संरक्षण की दुनिया में एक महत्वपूर्ण बहस को फिर से सामने लाता है। सीमित संसाधनों का कितना हिस्सा इन प्राकृतिक शरणस्थलों को बचाने में लगाया जाए, कितना क्षतिग्रस्त रीफ्स की पुनर्बहाली में और कितना जलवायु परिवर्तन के मूल कारणों—यानी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और प्रदूषण—को कम करने में?
वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल कुछ सुरक्षित क्षेत्रों को बचा लेने से समस्या का समाधान नहीं होगा। दुनिया को जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करनी होगी और समुद्री प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण करना होगा। अन्यथा ये शरणस्थल भी भविष्य में बढ़ते तापमान के सामने असुरक्षित हो सकते हैं।
फिर भी, निराशा के इस दौर में यह अध्ययन एक सकारात्मक संदेश देता है। यह बताता है कि प्रकृति ने अभी अपने सभी विकल्प नहीं खोए हैं। यदि वैज्ञानिक समझ, आधुनिक तकनीक और प्रभावी संरक्षण नीतियां साथ आएं, तो दुनिया की कुछ सबसे बहुमूल्य समुद्री धरोहरों को बचाया जा सकता है।
संक्षेप में, कोरल रीफ्स के लिए यह खोज कोई चमत्कारी समाधान नहीं है, लेकिन यह उम्मीद का ऐसा नक्शा जरूर है, जो बताता है कि बदलती जलवायु के बीच भी जीवन के लिए कुछ सुरक्षित ठिकाने अभी बाकी हैं।
