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गंगा की स्वच्छता को नई दिशा दे रही आधुनिक तकनीकें

Wastewater is generated daily through domestic and urban activities. As towns and cities expand, the volume of sewage requiring collection, conveyance and treatment also increases. Effective treatment therefore requires different technological approaches depending on the nature of sewage, local conditions and available infrastructure. In urban areas, sewage flows through underground networks to centralised treatment plants. However, areas without complete sewer networks require solutions for wastewater collected through septic tanks and other on-site systems. Treatment requirements also vary with sewage characteristics, available land, discharge standards and opportunities for treated-water reuse. Addressing these differences needs a combination of conventional treatment systems and innovative technologies suited to specific situations. 

नमामि गंगे के तहत सीवेज उपचार में नए प्रयोग, पहाड़ों से मैदानों तक स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान

 

  • A PIB Feature-

गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने की चुनौती केवल उसके घाटों की सफाई या नदी में तैरते कचरे को हटाने तक सीमित नहीं है। असली चुनौती उन करोड़ों लीटर गंदे पानी को नदी में पहुंचने से रोकने की है, जो प्रतिदिन शहरों, कस्बों, घरों और अन्य प्रतिष्ठानों से निकलता है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में गंगा की स्वच्छता के लिए जरूरी है कि गंदे पानी का नदी में गिरने से पहले प्रभावी उपचार किया जाए। वर्ष 2014 में शुरू किए गए नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अब इसी दिशा में आधुनिक तकनीकों, प्राकृतिक उपचार प्रणालियों और ऊर्जा संरक्षण के नए प्रयोग किए जा रहे हैं।

अपशिष्ट जल के उपचार में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हर स्थान की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग होती हैं। बड़े महानगरों में भूमिगत सीवर नेटवर्क के माध्यम से गंदा पानी उपचार संयंत्रों तक पहुंचाया जा सकता है, लेकिन हिमालयी कस्बों, संकरी घाटियों और दूरस्थ बस्तियों में ऐसी व्यवस्था विकसित करना आसान नहीं है। कहीं जमीन की कमी है तो कहीं अत्यधिक ठंड, दुर्गम भूगोल और बिजली की उपलब्धता चुनौती बन जाते हैं। इसलिए एक ही तकनीक सभी स्थानों पर कारगर नहीं हो सकती।

Sludge Treatment at Muni Ki Reti

नमामि गंगे कार्यक्रम की विशेषता यही है कि इसमें स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अलग-अलग तकनीकों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया गया है। सरकारी विवरण के अनुसार कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 31,327 करोड़ रुपये की लागत वाली 199 सीवरेज परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें 116 पूरी हो चुकी हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से प्रतिदिन 5,270 मिलियन लीटर अपशिष्ट जल के उपचार की नई क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है। उपलब्ध विवरण के अनुसार 2,237 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता विकसित की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त पुराने संयंत्रों की 925 मिलियन लीटर क्षमता के पुनर्वास का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें 873 मिलियन लीटर का कार्य पूरा हो चुका है। हालांकि इन आंकड़ों की वर्तमान स्थिति का आकलन संबंधित सरकारी अद्यतन रिपोर्ट से किया जाना आवश्यक है।

Electrocoagulation Technology Applied in Uttarakhand
Electrocoagulation Technology Applied in Uttarakhand

हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप नई तकनीकें

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में सीवेज उपचार की चुनौतियां मैदानी शहरों से अलग हैं। पहाड़ी ढलानों पर बड़े संयंत्रों के लिए समतल भूमि मिलना कठिन होता है। इसी समस्या के समाधान के लिए ऋषिकेश के मुनि की रेती क्षेत्र में चार मंजिला सीवेज उपचार संयंत्र बनाया गया है। नमामि गंगे के अंतर्गत नगरपालिका क्षेत्र के लिए विकसित इस संयंत्र को देश में अपनी तरह का पहला प्रयोग बताया गया है। इसकी क्षमता प्रतिदिन 75 लाख लीटर गंदे पानी के उपचार की है, जबकि यह केवल 900 वर्ग मीटर भूमि पर स्थापित है। सामान्यतः इतने बड़े संयंत्र के लिए कहीं अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। यहां संयंत्र को क्षैतिज विस्तार देने के बजाय ऊंचाई में विकसित किया गया है।

पहाड़ी क्षेत्रों में कम तापमान भी जैविक उपचार प्रक्रियाओं की कार्यक्षमता प्रभावित कर सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए उत्तराखंड में इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन तकनीक अपनाई गई है। इसमें विद्युत प्रवाह और धातु इलेक्ट्रोड की सहायता से पानी में मौजूद प्रदूषक तत्वों को अलग किया जाता है। बदरीनाथ और चमोली क्षेत्र सहित विभिन्न स्थानों पर ऐसे 17 संयंत्र स्थापित किए जाने का उल्लेख है। इनमें छोटे संयंत्रों से लेकर पोखरी बेंड में प्रतिदिन 12.5 लाख लीटर क्षमता वाला संयंत्र शामिल है।

उत्तराखंड के देवप्रयाग में मिट्टी आधारित जैव प्रौद्योगिकी का भी उपयोग किया गया है। यहां प्रतिदिन 12 लाख लीटर क्षमता वाला संयंत्र स्थापित है। इस तकनीक में विशेष मिट्टी, सूक्ष्मजीवों और पौधों की सहायता से पानी में मौजूद प्रदूषकों को कम किया जाता है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर आधारित यह पद्धति उपयुक्त परिस्थितियों में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा खपत वाला विकल्प उपलब्ध करा सकती है।

Multi-Storey Sewage Treatment Plant at Muni Ki Reti

जब पौधे और सूक्ष्मजीव साफ करते हैं गंदा पानी

सीवेज उपचार में एक दिलचस्प प्रयोग फूड चेन रिएक्टर तकनीक का है। इसमें सूक्ष्मजीवों के साथ पौधों की जड़ों और विशेष कृत्रिम माध्यमों का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य पानी में मौजूद कार्बनिक प्रदूषकों तथा पोषक तत्वों को कम करना है। इस तकनीक की विशेषता अपेक्षाकृत कम स्थान और ऊर्जा की आवश्यकता है। पश्चिम बंगाल के भाटपारा में दो तथा प्रयागराज में तीन संयंत्र इस तकनीक पर आधारित हैं। बिहार के भागलपुर में भी ऐसा संयंत्र विकसित किया जा रहा है।

प्रकृति आधारित उपचार का एक अन्य उदाहरण उत्तर प्रदेश का बिठूर है। लगभग 20 हजार आबादी वाले इस क्षेत्र में बड़े उपचार संयंत्र के लिए पर्याप्त भूमि और संसाधनों की कमी थी। यहां छह कृत्रिम आर्द्रभूमियां विकसित की गई हैं। इनकी सहायता से प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर गंदे पानी का उपचार किया जा रहा है। इन आर्द्रभूमियों में पौधे, मिट्टी, सूक्ष्मजीव और जल प्रवाह की प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रदूषकों को कम करने में सहायता करती हैं।

इसी प्रकार जापान में विकसित जोकासो तकनीक छोटे और विकेंद्रीकृत सीवेज उपचार के लिए उपयोगी विकल्प के रूप में सामने आई है। इसके संयंत्र सीमित स्थान में, आवश्यकता पड़ने पर भूमिगत भी स्थापित किए जा सकते हैं। उत्तराखंड में ऐसे छह संयंत्रों का उल्लेख है। छोटे पहाड़ी कस्बों और बिखरी हुई आबादी वाले क्षेत्रों में इस तरह की व्यवस्थाएं उपयोगी हो सकती हैं।

Constructed Wetland Treatment

गंदे पानी से ऊर्जा उत्पादन की संभावना

सीवेज उपचार संयंत्रों की एक बड़ी चुनौती बिजली की खपत है। लगातार चलने वाली मोटरों, पंपों और अन्य उपकरणों के कारण इनका संचालन महंगा पड़ता है। लेकिन नई तकनीकों ने अपशिष्ट जल के उपचार के साथ ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं भी खोली हैं।

वाराणसी के दीनापुर में प्रतिदिन 14 करोड़ लीटर क्षमता वाले संयंत्र में सीवेज से निकलने वाले कीचड़ से बायोगैस बनाई जाती है। सरकारी विवरण के अनुसार इससे संयंत्र की कुल बिजली आवश्यकता का लगभग 52 से 72 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा रहा है। यहां प्रतिमाह लगभग ढाई लाख यूनिट बिजली उत्पादन का उल्लेख है। प्रयागराज के नैनी स्थित आठ करोड़ लीटर क्षमता वाले संयंत्र में भी बायोगैस से बिजली की लगभग आधी आवश्यकता पूरी करने की व्यवस्था है।

नैनी संयंत्र में एक हजार किलोवाट क्षमता का सौर ऊर्जा संयंत्र भी स्थापित किया गया है, जिससे प्रतिदिन लगभग 3,850 यूनिट बिजली उत्पादन बताया गया है। मेरठ में प्रस्तावित 22 करोड़ लीटर क्षमता वाले संयंत्र को पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित करने की योजना है।

Soil Biotechnology-based STP at Devprayag
Soil Biotechnology-based STP at Devprayag

एक अन्य तकनीक नेरेडा में सूक्ष्मजीवों के विशेष दानों की सहायता से जैविक उपचार किया जाता है। सरकारी विवरण में पारंपरिक उपचार प्रणालियों की तुलना में इससे बिजली की उल्लेखनीय बचत का दावा किया गया है। पटना के पहाड़ी क्षेत्र में छह करोड़ लीटर प्रतिदिन क्षमता वाला संयंत्र इसका उदाहरण है।

ऋषिकेश में सीवेज से निकलने वाले कीचड़ को सुखाकर जलाने और उसकी राख का निर्माण सामग्री में उपयोग करने की संभावनाओं पर भी प्रयोग किया जा रहा है। हालांकि ऐसे उपयोग में पर्यावरणीय मानकों और राख में मौजूद हानिकारक तत्वों की जांच आवश्यक है।

NEREDA Reactor

संयंत्र बनाना ही नहीं, उन्हें चलाना भी जरूरी

गंगा की स्वच्छता के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए गए उपचार संयंत्र लंबे समय तक कितनी कुशलता से काम करते हैं। केवल संयंत्र स्थापित हो जाने से नदी प्रदूषणमुक्त नहीं हो सकती। उसके नियमित संचालन, रखरखाव, बिजली आपूर्ति और उपचारित पानी की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी भी जरूरी है।

इसी उद्देश्य से नमामि गंगे कार्यक्रम में हाइब्रिड एन्युटी मॉडल अपनाया गया है। इसके अंतर्गत निर्माण करने वाली कंपनियों को संयंत्रों के संचालन और प्रदर्शन के आधार पर निर्धारित अवधि तक भुगतान किया जाता है। सरकारी विवरण के अनुसार इस व्यवस्था के अंतर्गत 1,955 मिलियन लीटर प्रतिदिन क्षमता वाली 31 परियोजनाएं ली गई हैं। वाराणसी और कानपुर में पुरानी भूमिगत सीवर लाइनों को व्यापक खुदाई के बिना अंदर से दुरुस्त करने की तकनीक भी अपनाई गई है।

Faecal Sludge and Septage Management

इन प्रयासों से स्पष्ट है कि गंगा की स्वच्छता के लिए अब केवल बड़े बांधनुमा ढांचे या विशाल उपचार संयंत्र ही समाधान नहीं माने जा रहे हैं। छोटे विकेंद्रीकृत संयंत्र, प्राकृतिक उपचार प्रणालियां, ऊर्जा उत्पादन और पुरानी व्यवस्थाओं का आधुनिकीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन इन तकनीकी प्रयोगों की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल स्थापित क्षमता या परियोजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि कितना गंदा पानी वास्तव में उपचारित हो रहा है, उसकी गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं और नदियों में प्रदूषण कितना घटा है। गंगा की निर्मलता का अंतिम प्रमाण परियोजनाओं के आंकड़े नहीं, बल्कि नदी के पानी की वास्तविक गुणवत्ता होगी।

Onsite Solar Power at an STP

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