कथनी और करनी का विरोधाभास

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अजीत द्विवेदी

सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले किसी भी नेता की बातों का असर तभी होता है, जब उसकी कथनी और करनी में अंतर न हो। अगर कथनी और करनी में अंतर है तो बातें चाहे कितनी भी बड़ी और आदर्शवादी हों, उनका कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि दुनिया आपका आचरण देखती है, उपदेश नहीं सुनती। महात्मा गांधी इस सिद्धांत को शब्दश: मानते थे। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया, बल्कि अपने आचरण से रास्ता दिखाया। अफसोस की बात है कि गांधी को याद करते हुए देश के प्रधानमंत्री ने लाल किले से कई बातें कहीं, जिनके बिल्कुल उलट काम उनकी पार्टी कर रही है। उनकी कही बातों में और पार्टी के आचरण में अंतर भर नहीं है, बल्कि विरोधाभास है। नेताओं की कथनी और करनी में थोड़ा-बहुत अंतर हो तब भी उसे स्वीकार किया जा सकता है लेकिन अगर विरोधाभास हो तो उसे क्या कहा जाएगा!

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में भ्रष्टाचार और परिवारवाद को देश के विकास और लोकतंत्र दोनों के लिए बहुत खतरनाक माना। इतना खतरनाक माना कि उन्होंने देश के लोगों से भ्रष्टाचार के साथ साथ भ्रष्टाचारियों से नफरत करने की अपील कर डाली। उन्होंने इस बुराई को मिटाने के लिए देश के लोगों से सहयोग की अपील की। इस अपील के तीसरे दिन 17 अगस्त को भाजपा ने बीएस येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड का सदस्य बना दिया। येदियुरप्पा के ऊपर भ्रष्टाचार के अनेक मामले चल रहे हैं। अवैध खनन के आरोपों की वजह से उनको 2011 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उस समय अवैध खनन का कथित घोटाला तीन अरब डॉलर का था यानी आज के हिसाब से करीब 24 हजार करोड़ रुपए का। विधायकों, सांसदों के मामले सुनने के लिए बनी अदालत ने पिछले दिनों येदियुरप्पा के ऊपर जमीन घोटाले का मामला चलाने की अनुमति दी थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाई है। यह मामला 2006-07 का है, जब येदियुरप्पा गठबंधन की सरकार में उप मुख्यमंत्री थे। आरोप हैं कि उन्होंने आईटी पार्क के लिए आवंटित बेंगलुरू की 434 एकड़ जमीन डिनोटिफाई करके उसका भू उपयोग बदल दिया था। यह भी हजारों करोड़ रुपए का मामला है।

इसके अलावा विधायकों की खरीद-फरोख्त और पैसे के लेन-देन के आरोप लगे हैं। सरकार की 24 एकड़ जमीन निजी कंपनियों को देने के आरोप लगे हैं। बेंगलुरू के अपार्टमेंट घोटाले में आरोप लगे थे, जिसकी जांच के आदेश हाई कोर्ट ने दिए थे। भ्रष्टाचार के ऐसे अनेक आरोपों से घिरे येदियुरप्पा अब भाजपा में फैसला करने वाली सर्वोच्च ईकाई के सदस्य हैं। कहां तो भ्रष्टाचारियों से नफरत करने की बात थी और कहां भ्रष्टाचार के आरोपी साथ बैठे होंगे! इतना ही नहीं येदियुरप्पा परिवारवादी राजनीति के भी पोषक हैं। उनके के एक बेटे बीवाई राघवेंद्र लोकसभा के सांसद हैं और दूसरे बेटे बीवाई विजयेंद्र के लिए उन्होंने अपनी विधानसभा सीट छोडऩे का ऐलान किया है। यानी जाते जाते वे अपने दोनों बेटों को भाजपा और कर्नाटक की राजनीति में स्थापित करके जाएंगे। लेकिन इसे परिवारवाद नहीं माना जाएगा और इससे किसी योग्य व्यक्ति का अवसर नहीं मारा जाएगा क्योंकि यह काम भाजपा के बड़े नेता कर रहे हैं। यह भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर कथनी-करनी का अंतर नहीं है, बल्कि विरोधाभास है!

इसी तरह प्रधानमंत्री ने लाल किले से अपने भाषण में नारी के अपमान का मुद्दा उठाया और देश के लोगों से अपना व्यवहार बदलने की अपील की। साथ ही उन्होंने कहा कि स्त्रियां भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं और उनमें निवेश करें तो देश को बहुत फायदा होगा। इसके तीन दिन बाद संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन हुआ तो 11 सदस्यों के बोर्ड में सिर्फ एक महिला को जगह मिली। यानी महज नौ फीसदी प्रतिनिधित्व! स्त्रियां पूंजी हैं तो क्या भाजपा के पास इस पूंजी की कमी है या भाजपा को इसमें निवेश नहीं करना है? देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व सिर्फ नौ फीसदी! इसी तरह नारी के अपमान पर प्रधानमंत्री के भावुक होने के दिन ही गुजरात में भाजपा की सरकार ने गर्भवती बिलकिस बानो से बलात्कार करने और उनकी तीन साल की बच्ची सहित परिवार के कई लोगों की हत्या कर देने के दोषियों को जेल से रिहा कर दिया। बलात्कारी और हत्यारे जेल से रिहा हुए तो उनका सार्वजनिक अभिनंदन हुआ, उन्हें माला पहनाई गई और मिठाइयां बांटी गईं। सोचें, यह प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के गृह राज्य में हुआ। नारी के अपमान की इससे बड़ी कोई घटना हो सकती है? यहां भी कथनी और करनी में थोड़ा बहुत अंतर नहीं है, बल्कि विरोधाभास है।

प्रधानमंत्री ने लाल किले से युवाओं की बात कही। उन्होंने 20-25 साल की उम्र के युवाओं को अगले 25 साल यानी अमृत काल के 25 साल का संकल्प करने को कहा। लेकिन भाजपा के संसदीय बोर्ड का गठन हुआ तो सिर्फ बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों को जगह मिली। उसमें सबसे कम उम्र के सदस्य बीएल संतोष हैं, जिनकी उम्र 53 साल है। फिर अमित शाह हैं, जिनकी उम्र 57 साल है। उसके बाद सर्बानंद सोनोवाल और सुधा यादव हैं, जिनकी उम्र 59 साल है। बाकी सारे सदस्य 60 साल से ऊपर के हैं। चार सदस्य- नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, बीएस येदियुरप्पा और सत्यनारायण जटिया 70 साल से ऊपर के हैं। इससे पहले आखिरी बार जब संसदीय बोर्ड का गठन हुआ था तब कोई भी सदस्य 70 साल का नहीं था।

सो, चाहे भ्रष्टाचार हो, परिवारवाद हो, युवा हो या महिला हो या और भी कोई विषय हो, भाजपा की कथनी और करनी में विरोधाभास होता है। खुद प्रधानमंत्री कहते कुछ हैं और उनकी पार्टी करती कुछ है। हर मामले में मेरा-तेरा का भाव है। मेरे नेता पर भ्रष्टाचार है तो वह भ्रष्टाचारी नहीं है। मेरा नेता अपने परिवार के सदस्यों को आगे बढ़ा रहा है तो वह परिवारवादी नहीं है। इस तरह के चुनिंदा नजरिए से किसी भी सरकार या पार्टी का संकल्प कमजोर होता है या उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। लोग जब तक किसी चमत्कार की वजह से साथ में बंधे हैं तब तक बंधे हैं लेकिन इतिहास ऐसे नेताओं से नहीं बनता है। चुनाव जीतना एक बात है और बड़ा नेता होना दूसरी बात है।

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