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एक बार फिर गरमाया ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य पद का विवाद

– प्रकाश कपरूवाण –

उत्तर भारत की ज्योतिष्पीठ-ज्योर्तिमठ जहॉ आद्य जगदगुरू शंकराचार्य ने तप व साधना कर न केवल ज्ञान रूपी ज्याति के साक्षात दर्शन किए ब्लकि इसी पुण्य धरा से देश के चार कोनों मे चार पीठों की स्थापना कर शिष्यों को शंकराचार्य के रूप मे नियुक्त किया। लेकिन चार पीठों मे एक बदरीकाश्रम की ज्योतिष्पीठ मे शंकराचार्य गददी को लेकर पॉच दशक से अधिक समय से विवाद की स्थिति बनी हुई है। ज्योतिर्मठ मे जो प्राचीन मठ है वहॉ वर्तमान मे स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती महाराज वतौर ज्योतिष्पीठाधीश्वर विराजमान हैं लेकिन उन्हें  अदालत ने शंकराचार्य नहीं माना है। अदालत में उनके खिलाफ तर्क दिया गया था कि  वह एक वेतनभोगी कर्मचारी रह चुके हैं, इसलिए शंकराचार्य नहीं बन सकते।

इस पीठ पर वर्ष1973-74 से पूर्व एक ही शंकरचार्य होत थे, वर्ष 1941 से 1953 तक स्वामीे ब्रहमानन्द सरस्वती जी महाराज ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य रहे, उनके ब्रहमलीन होने पर वर्ष 1953 से 1973 तक स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य रहे। उसके बाद प्रचाीन मठ पर स्वामी शान्ता नन्द सरस्वती महाराज विराजमान हुए,और उन्होने वसीयत को आधार मानते हुए इस पद को ग्रहण किया।

 

दरसअल तभी से इस पीठ पर विवाद की स्थिति शुरू हुई,और वर्ष 1973 मे ही काशी विद्वत परिषद एंव अखिल भारतवर्षीय धर्म संध ने स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज का ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप मे मान्यता देते हुए अभिषिक्त कर दिया। काशी विद्वत परिषद एंव अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ का स्पष्ट मत था कि महामठाम्नाय-मठानुशासन के अनुसार किसी पीठ पर आचार्य वसीयत के आधार पर नियुक्त नही किया जा सकता, और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज को ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन किया गया। तब से ही शंकराचार्य की गददी का विवाद भी न्यायालयों मे पंहुच गया। उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर कुछ निर्णय भी हुए और एक पक्ष द्वारा प्रचाीन मठ पर कब्जे का असफल प्रयास भी किया गया।

इस बीच स्वामी शातानन्द महाराज के उत्तराधिकारी स्वामी विष्णुदेवानन्द जी महाराज और उनके बाद स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती महाराज प्राचीन मठ व गददी पर विराजमान है। इधर वर्ष 1982 मे स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज ज्योतिष्पीठ के साथ ही द्वारका पीठ के भी शंकराचार्य बन गए। तब वर्ष 1992-93 मे ज्योतिष्पीठ मे तीसरे शंकराचार्य के रूप मे स्वामी माधवाश्रम जी महाराज का पदापर्ण हो गया, उन्है भी वकायदा काशी विद्वत परिषद एंव अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ ने मान्यता देते हुए शंकराचार्य के पद पर अभिषिक्त किया था।

ब्रहमलीन ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज का स्पष्ट तर्क था कि आद्य गुरू शंकराचार्य द्वारा चारों पीठों के संचालन के लिए बनाए गए महामठानुशासन के अनुसार एक ब्यक्ति दो पीठों का आचार्य नही हो सकता, और हिन्दूराष्ट्र नेपाल के अलावा विदेश गया ब्यक्ति शंकराचार्य पद पर आसीन नही हो सकता। क्योंकि स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज द्वारका के भी शंकराचार्य बन गए थे, और स्वामी माधवाश्रम जी के अभिषिक्त होने से पूर्व काशी विद्वत परिषद एंव धर्मसंघ द्वारा उनसे महामठानुशासन का सम्मान करते हुए दोनो मे से एक पीठ छोडने का आग्रह किया जाता रहा। जब ऐसा नही हुआ तो काशी विद्वत परिषद एंव अखिल भारतवर्षीय धर्मसंध ने स्वामी माधवाश्रम जी महाराज को ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप मे अभिषिक्त कर दिया, जो अब ब्रहमलीन हो गए है और उन्होने महामठानुशासन का सम्मान करते हुए अपने किसी शिष्य को ना तो वसीयत दी और ना ही उत्तराधिकारी बनाया। ब्रह्मलीन  स्वामी माधवाश्रम जी महाराज के अनुयायियों के अनुसार 1973 से न्यायालय मे चल रहे विवाद को ध्यान मे रखते हुए व न्यायालय का सम्मान करते हुए अभी स्वामी माधवाश्रम महाराज के उत्तराधिकारी का पट्टाभिषेक कार्यक्रम स्थगित रखा गया है। लेकिन उड़भट्ट विद्वान होते हुए भी साधू समाज के बड़े वर्ग ने माधवाश्रम महाराज को शंकराचार्य नहीं माना।

अब स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के ब्रहमलीन होने के बाद उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप मे पदासीन हो गए। यही से एक बार फिर विवाद की स्थिति तैयार हो गई,लेकिन इस बार न प्राचीन मठ मे विराजमान  वासुदेवानन्द सरस्वती और ना ही ब्रहमलीन स्वामी माधवाश्रम जी महाराज के अनुयायियों के द्वारा कोई विवाद किया गया ब्लकि स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज के ही एक अन्य शिष्य स्वामी गोविन्दानन्द सरस्वती ने ही इस विवाद की शुरूवात की। उन्होने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय मे पैरवी की, और वकौल स्वामी गोविन्दानन्द सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के पटटाभिषेक पर रोक लगाई है, और कोर्ट के निर्णय तक वे स्वयं को शंकराचार्य नही कह सकते। इसे लेकर स्वामी गोविन्दनंन्द सरस्वती महाराज ने नृसिंह मंन्दिर व बदरीनाथ एंव केदारनाथ धाम मे भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का विरोध किया और उसी समय से स्वामी गोविन्दानंन्द महाराज भी चर्चा मे आ गए। स्वामी गोविन्दानन्द महाराज द्वारा बीती 18 नवंबर को श्री बदरीनाथ धाम के कपाट बंन्द होने के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का जर्बदस्त विरोध करते हुए उन्है फर्जी शंकराचार्य तक कह डाला, मामले को किसी तरह पुलिस व प्रशासन ने शान्त कराया।

जोशीमठ आपदा के दौरान आपदा निवारण के निमित्त स्वामी गोविन्दानन्द सरस्वती महाराज ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथो भगवान नृसिंह के मंदिर मे पूजा अर्चना, यज्ञ व गाय दान भी करवाया। और तब से वे जब-जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज ज्योर्तिमठ, बदरीनाथ या केदारानाथ पंहुचते है, गोविन्दानन्द जी भी इन स्थानों पर पंहुचकर विरोध शुरू कर देते है। यहॉ यह भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज व स्वामी गोविन्दानन्द जी महाराज एक की गुरू के शिष्य-गुरू भाई है तो आखिर किस बात को लेकर इतना गंभीर विवाद है? यदि स्वामी गोविन्दानंन्द जी सुप्रीप कोर्ट मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बनने से रोकने की पैरवी कर रहे है तो हिमालय के धामों मे आकर अभद्रता क्यों कर रहे  हैं?  यदि कोई कोर्ट की अवहेलना कर रहा है तो कोर्ट से ही कार्यवाही करवाएं,या गुरू भाईयों की कोई आपसी खीचतान है तो वे अपने मठों मे इसका निपटारा करें, पहाड की शान्त वादियों को अशांत कर वे न केवल दंण्डी सन्यासियों की पंरपरा बल्कि सनातन धर्म को भी चोट पंहुचाने का काम कर रहे है। 18नवंबर को श्री बदरीनाथ धाम मे जो कुछ हुआ इससे हजारों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था को अवश्य ठेस पंहुची है।

आज से ढाई हजार से अधिक वर्ष पूर्व दक्षिण भारत से चलकर हिमालय की इन शांत वादियों मे पंहुचकर आद्य जगदगुरू शंकराचार्य ने तपस्या कर देश को एक सूत्र मे बांधने के लिए चार पीठों की स्थापना की ताकि सनातन धर्म की रक्षा व प्रचार-प्रसार का कार्य अनवरत चलता रहे, लेकिन उत्तर भारत के हिमालयी सर्वश्रेष्ठ पीठ ज्योतिर्मठ बदरीकाश्रम मे शंकराचार्य का विवाद व दण्डी सन्यासिंयों की आपसी लडाई देख आद्य गुरू शंकराचार्य की आत्माभी सिहर उठती होगी।

शंकराचार्य स्वरूपानंद बाल्यकाल से स्वाधीनता सेनानी रहे हैं,  इसलिए उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ माना जाता रहा है। आर एस एस तथा भाजपा के प्रति उनका आलोचनात्मक रवैय्या जग जाहिर रहा है जबकि उनके प्रतिद्वंदी बासुदेवा नंद आर एस एस  और बीजेपी के सदैव करीबी रहे हैं । इसलिए राजनीतिक कारणों  से भी शंकराचार्य पद  का विवाद हमेशा सुलगा रहा। शंकराचार्य के बीजेपी विरोधी रुख के कारण  भारत सरकार ने राम मंदिर निर्माण के लिए जो ट्रस्ट बनाया उसमे शंकराचार्य के तौर पर स्वरूपानंद महाराज के बजाय बसुदेवानंद महाराज को रखा गया। जबकि उन पर अदालत ने शंकराचार्य पद  के चिन्हों को धारण करने का भी प्रतिबन्ध था।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य और नये शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी गाहे बगाहे सरकार की आलोचना करते रहे हैँ । हाल ही  में उन्होंने बद्रीनाथ के मास्टर प्लान पर सवाल उठाये थे । जोशीमठ आपदा पर भी मुखर रहे हैं । इसलिए उनके समर्थकों का कहना है कि  नया  विवाद के पीछे कोई और नहीं बल्कि आर  एस एस  और सत्ताधारी दल है।

जरूरत है देश के मूर्धन्य विद्वानों, सनातन प्रेमियों, संतो को एक मंच पर आकर ज्योतिष्पीठ के विवाद के पटोक्षेप करने की ताकि ज्योतिष्पीठ- बदरीकाश्रम की गरिमा बनी रहे। धार्मिक परम्पराओं के अनुसार आदि गुरु द्वारा स्थापित चार  सर्वोच्च पीठो के चार ही  शंकराचार्य होने चाहिए मगर आज कम से कम 70 साधु स्वयं को शंकराचार्य बन कर घूम रहे हैँ।

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