लड़ाकू विमानों की देरी से वायुसेना की ताकत पर असर, हर साल चाहिए दो नए स्क्वाड्रन
नई दिल्ली, 4 अक्टूबर। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों की लगातार घटती संख्या के बीच वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने चेताया है कि तेजस समेत नए लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में असामान्य देरी अब वायुसेना की युद्धक क्षमता को प्रभावित कर रही है। उन्होंने कहा कि मौजूदा कमी को रोकने और वायुसेना को स्वीकृत 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की क्षमता तक पहुंचाने के लिए अगले कुछ वर्षों तक हर साल 36 से 40 नए लड़ाकू विमान शामिल करने होंगे। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने 94वें वायुसेना दिवस से पहले शनिवार को आयोजित वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में यह बात कही।
वायुसेना प्रमुख ने कहा कि भारत को प्रतिवर्ष लगभग दो लड़ाकू स्क्वाड्रन जोड़ने की जरूरत है। इसके लिए सालाना 36 से 40 विमान तैयार कर वायुसेना को सौंपने होंगे। उनका कहना था कि पहले मौजूदा स्क्वाड्रन संख्या को और नीचे जाने से रोकना होगा और फिर इसे 42 स्क्वाड्रन के स्वीकृत लक्ष्य की ओर बढ़ाना होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वास्तविक सामरिक जरूरत इससे भी अधिक हो सकती है।
क्या होता है लड़ाकू स्क्वाड्रन?
वायुसेना की लड़ाकू शक्ति को केवल कुल विमानों की संख्या से नहीं, बल्कि मुख्य रूप से स्क्वाड्रनों के आधार पर आंका जाता है। स्क्वाड्रन लड़ाकू वायुसेना की बुनियादी परिचालन इकाई है। भारतीय संदर्भ में एक लड़ाकू स्क्वाड्रन में सामान्यतः करीब 18 से 20 लड़ाकू विमान माने जा सकते हैं। एयर चीफ मार्शल सिंह का अपना गणित भी यही बताता है—दो स्क्वाड्रन के लिए उन्होंने 36 से 40 विमान सालाना मांगे हैं।
स्क्वाड्रन केवल विमानों का समूह नहीं होता। उसके साथ प्रशिक्षित पायलट, तकनीकी अधिकारी, इंजीनियर, हथियार विशेषज्ञ, ग्राउंड क्रू, रखरखाव व्यवस्था और अन्य परिचालन संसाधन जुड़े होते हैं। प्रत्येक स्क्वाड्रन का अपना कमांड ढांचा होता है और वह किसी निर्धारित एयरबेस से संचालित होता है। जरूरत पड़ने पर उसके विमानों और कर्मियों को दूसरे अग्रिम एयरबेस पर तैनात किया जा सकता है।
इसलिए 42 स्क्वाड्रन का अर्थ केवल 42 समूह नहीं, बल्कि मोटे तौर पर 750 से 840 तक लड़ाकू विमानों की संरचना हो सकती है। वास्तविक उपलब्ध युद्धक विमानों की संख्या इससे अलग रहती है, क्योंकि कुछ विमान प्रशिक्षण, रखरखाव, मरम्मत या उन्नयन में रहते हैं। इसी कारण स्क्वाड्रन संख्या में कमी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
42 की मंजूरी, लेकिन करीब 30 ही बचे
भारतीय वायुसेना के लिए सरकार ने लंबे समय से 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की स्वीकृत क्षमता निर्धारित कर रखी है। पीटीआई की रिपोर्ट में वायुसेना प्रमुख के हवाले से मौजूदा संख्या करीब 30 बताई गई है, जबकि पीटीआई पर आधारित एक अन्य रिपोर्ट इसे 29 बताती है। अंतर संभवतः स्क्वाड्रनों की परिचालन/औपचारिक गणना के तरीके या हाल की सेवानिवृत्ति से जुड़ा है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वायुसेना अपनी स्वीकृत क्षमता से लगभग एक दर्जन स्क्वाड्रन नीचे है।
पुराने मिग-21 विमानों की विदाई ने इस दबाव को और बढ़ाया है। दूसरी ओर नए विमानों की आपूर्ति उस गति से नहीं हुई, जिस गति से पुराने बेड़े को हटाना पड़ा। इसीलिए एयर चीफ का सालाना 36-40 विमान का आंकड़ा केवल बेड़े के विस्तार का लक्ष्य नहीं है; इसका पहला उद्देश्य घटती स्क्वाड्रन संख्या को रोकना है।
तेजस की देरी बनी सबसे बड़ी चिंता
फरवरी 2021 में रक्षा मंत्रालय ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ करीब 48 हजार करोड़ रुपये में 83 तेजस मार्क-1ए विमानों का अनुबंध किया था। पहला विमान मार्च 2024 में मिलना था, लेकिन पीटीआई की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अभी तक वायुसेना को इस अनुबंध का एक भी विमान औपचारिक रूप से नहीं मिला है। सितंबर 2025 में 97 और तेजस मार्क-1ए के लिए लगभग 62,370 करोड़ रुपये का दूसरा अनुबंध किया गया। इस तरह वायुसेना ने कुल 180 मार्क-1ए विमानों का रास्ता तैयार किया है।
आपूर्ति में देरी के कारणों में अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस से एफ-404 इंजनों की आपूर्ति में बाधा और कुछ तकनीकी प्रमाणन संबंधी देरी भी शामिल रही है। वायुसेना और एचएएल अब वर्ष के अंत तक मार्क-1ए को शामिल करने की उम्मीद कर रहे
तेजस, राफेल और सुखोई से भरने की योजना
वायुसेना प्रमुख ने भविष्य की जरूरत पूरी करने का संभावित गणित भी सामने रखा। एचएएल यदि सालाना करीब 20 तेजस मार्क-1ए बनाता है और प्रस्तावित बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान कार्यक्रम से लगभग 12 विमान सालाना मिलने लगते हैं, तो संख्या करीब 32 हो जाएगी। इसके अतिरिक्त 12 सुखोई-30एमकेआई का अनुबंध भी है। इन सभी आपूर्तियों के समय पर आने पर सालाना लगभग 35 से 40 विमानों की आवश्यक गति हासिल की जा सकती है।
वायुसेना तेजस मार्क-1ए के बाद तेजस मार्क-2 और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) पर भी निर्भर कर रही है। हालांकि एयर चीफ ने संकेत दिया कि यदि एएमसीए में ज्यादा विलंब हुआ तो किसी अन्य लड़ाकू विमान विकल्प पर भी विचार करना पड़ सकता है। रूस ने भारत को सुखोई-57 की पेशकश की है, लेकिन इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है।
पाकिस्तान-चीन की पांचवीं पीढ़ी की तैयारी भी चिंता
इस कमी को क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य और गंभीर बनाता है। एयर चीफ मार्शल सिंह ने पाकिस्तान और चीन के बीच पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर बढ़ते सहयोग को चिंता का विषय बताया। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के पास भी आवश्यक क्षमताएं हैं और किसी युद्ध का परिणाम केवल किसी एक विमान या हथियार प्रणाली से तय नहीं होता।
इस तरह वायुसेना प्रमुख की चेतावनी का असली अर्थ केवल तेजस की विलंबित डिलीवरी नहीं है। 42 स्वीकृत स्क्वाड्रनों के मुकाबले करीब 30 स्क्वाड्रन रह जाना और पुराने विमानों की लगातार सेवानिवृत्ति भारत के सामने उत्पादन की बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है। हर साल 36-40 विमान मिलने पर भी पहले गिरावट रोकनी होगी और उसके बाद ही 42 स्क्वाड्रन की स्वीकृत शक्ति की ओर बढ़ना संभव होगा। यही कारण है कि तेजस मार्क-1ए, प्रस्तावित राफेल खरीद, तेजस मार्क-2 और एएमसीए की समयबद्ध उपलब्धता अब केवल आधुनिकीकरण का सवाल नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना की भविष्य की युद्धक क्षमता का केंद्रीय मुद्दा बन गई है।
