उत्तराखण्ड का बहुचर्चित ढेंचा घोटाला : तीन रावत भिड़े आपस में

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*त्रिवेन्द्र को बचाने का श्रेय लेने के लिये  रावतों में तकरार
*हरक का दावा, उनकी कृपा से बने त्रिवेन्द्र मुख्यमंत्री
*घोटाले में 14 करोड़ का घपला
*हाइकोर्ट ने दो बार खारिज की थी त्रिवेन्द्र के खिलाफ याचिकाएं
*जांच आयोग ने त्रिवेन्द्र और कृषि निदेशक को दोषी बताया था
*विजय बहुगणा ने गठित किया था जांच आयोग

Nav Jivan carried this article of Jay Singh Rawat on its 2 December 2018 issue.

 

  –जयसिंह रावत

उत्तराखण्ड का बहुचर्चित ढेंचा बीज घोटाला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। लेकिन इस बार की चर्चा का विषय दोषियों को सजा देने को लेकर नहीं बल्कि उन्हें बचाने के श्रेय को लेकर हो रही है। उत्तराखण्ड की राजनीति का स्याह पहलू भी देखिये इस इस दंगल में वे लोग कूदे हुये हैं जिन्होंने त्रिपाठी जांच आयोग द्वारा दोषी पाये गये लोगों को बचाया है और दंगल के रेफरी वे बने हुये हैं जिन पर आयोग ने गंभीर आरोप लगाते हुये भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 के तहत कानूनी कार्यवाही करने की सिफारिश की थी। लेकिन बाद में हाइकोर्ट ने इस मामले में त्रिवेन्द्र रावत के खिलाफ दो अलग-अलग याचिकाओं को खारिज कर दिया था। एक याचिकाकर्ता पर जुर्माना भी लगाया था।

त्रिवेन्द्र को बचाने का श्रेय लेने के लिये दो रावतों में तकरार

उत्तराखण्ड के कृषि विभाग में 2007 से लेकर 2012 के बीच हुये 14.03 करोड़ के ढेंचा बीज घोटाले को दबाने का प्रयास कांग्रेस और भाजपा के नेता चाहे जितना भी करें यह घोटाला इतने सालों बाद भी दबने का नाम नहीं ले रहा है। इस घोटाले को कुछ सामाजिक कार्यकर्ता हाइकोर्ट में तक ले गये। पहले इस घोटाले को सरकार द्वारा रफादफा करने को लेकर चर्चाएं होती रहीं तो अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके कार्यकाल में कृषिमंत्री रहे डा0 हरकसिंह रावत में जुबानी जंग शुरू हो गयी है। इस मामले में ताजा विवाद की शुरुआत स्वयं हरीश रावत ने पूर्व मुख्यमंत्री घोटाले में आरोपी माने गये त्रिवेन्द्र सिंह रावत की तारीफ करते हुये की है। हरीश रावत का कहना था कि ’’त्रिवेन्द्र रावत ने पिछले चार सालों तक उन उज्याड़ू बल्दों (दूसरे की फसल चरने के आदी बैलों) को काबू में रखा जबकि उन्हें कसने में मेरे अपने हाथ छिल गये।’’ हरीश रावत का इशारा साफ तौर पर कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल हरक सिंह रावत और सतपाल महाराज आदि मंत्रियों की ओर था। हरीश रावत पर पलटवार करते हुये हरक सिंह का कहना था कि त्रिवेन्द्र रावत को ढेंचा बीज घोटाले में उन्होंने बचाया था। वरना हरीश ने घोटाले की जांच फाइल मांग कर त्रिवेन्द्र पर मुकदमा चलाने की ठानी हुयी थी।

Dhaincha seeds purchased by Agriculture department Uttarakhand

हरक का दावा, उनकी कृपा से बने त्रिवेन्द्र मुख्यमंत्री

हरक यह भी कह गये कि अगर उस समय उन्होंने फाइल मुख्यमंत्री हरीश रावत को दे दी होती और त्रिवेन्द्र पर मुकदमा हो गया होता तो वह कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनते। दो रावतों के बीच जुबानी जंग पर तीसरे रावत और इस विवाद के मुख्य पात्र त्रिवेन्द्र सिंह रावत की प्रतिकृया थी कि ’’एक जानवर बार-बार ढेंचा-ढेंचा करता है।’’ उनका आशय किस जानवर से था, उसे स्पष्ट करने की जरूरत नहीं है।

विजय बहुगणा ने गठित किया था जांच आयोग

गौरतलब है कि 2007 से लेकर 2012 तक राज्य में भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुये 7 बहुचर्चित घाटालों की जांच के लिये तत्कालनी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने जांच आयोग (केन्द्रीय) नियमावली 1972 के नियम 5 (3) एवं (4) के तहत 28 मार्च 2013 को गठित एक सदस्यीय जस्टिस एस.सी. त्रिपाठी जांच आयोग का गठन किया था। आयोग ने शिकायतकर्ता रमेश चन्द्र चौहान और कृषि सेवा संघ के अध्यक्ष डी.एस. असवाल की शिकायत पर प्रदेश के बहुचर्चित ढेंचा घाटाले की जांच की थी। विजय बहुगुणा अब भाजपा में हैं। इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता जे.पी. डबराल और रघुनाथ सिंह नेगी ने नैनीताल हाइकोर्ट में अलग-अलग समय पर याचिकाऐं दायर की थीं जो कि खारिज हो गयीं थी।

जांच आयोग ने त्रिवेन्द्र और कृषि निदेशक को दोषी बताया था

आयोग ने अपनी जांच में तत्कालीन कृषि निदेशक मदन लाल के साथ ही तत्कालीन कृषिमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को घोटाले में स्पष्ट रूप से दोषी माना था। आयोग ने अपनेी जांच के निष्कर्स में लिखा है कि ढैंचा बीज वितरण में कृषिमंत्री ने अनुदान की राशि मनमाने ढंग से 50 प्रतिशत से बढ़ा कर 75 प्रतिशत कर बजट मैनुवल, सचिवालय अनुदेश नियमावली 1975 की अवहेलना कर शासकीय धन की स्वीकृति निजी व्यय की भांति दे दी जबकि वह शासकीय धन के कस्टोडियन थे। उन्होंने भारी अनियमितताओं की शिकायत पर पहले तो नैनीताल, देहरादून, उधमसिंहनगर और हरिद्वार के 4 मुख्य कृषि अधिकारियों के खिलाफ निलंबन आदेश पारित कर दिये और फिर 28 दिसम्बर 2010 को बिना समुचित कारण के स्वयं ही निलंबन निरस्त कर विभागीय कार्यवाही के आदेश जारी कर दिये जो कि उनको संदेह के घेरे में लाता है।इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता जे.पी. डबराल और रघुनाथ सिंह नेगी ने नैनीताल हाइकोर्ट में अलग-अलग समय पर याचिकाऐं दायर की थीं जो कि खारिज हो गयीं थी।

Article of Jay Singh Rawat published by Nav jivan e paper

आयोग ने लगाये थे त्रिवेन्द्र रावत पर  आरोप

अपने निष्कर्स में आयोग ने कहा था कि सचिव अपने विभाग का अध्यक्ष होता है और महत्वपूर्ण कार्यवाही के लिये वह मंत्री एवं मुख्य सचिव से दिशा निर्देश लेता है। इसी नाते तत्कालीन कृषि सचिव ने इस मामले की जांच सतर्कता विभाग से कराने की अनुशंसा की थी जिसे कृषि मंत्री के रूप में त्रिवेन्द्र रावत ने अपने 9 अप्रैल 2011 के आदेश से अस्वीकृत कर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के राजकीय दायित्व का निर्वहन नहीं किया। इसलिये वह अपने अधिकारों का दुरुपयोग और अनियमितता के दोषी पाये गये। इसी प्रकार मंत्री ने नयी मांगों के प्रस्ताव की प्रकृया सुनिश्चित किये बिना कृषि निदेशक के गलत प्रस्ताव को अनुमोदित कर सचिवालय अनुदेश का उल्लंघन किया।

जांच आयोग की रिपोर्ट के अंश

आयोग ने अपने निष्कर्स में स्पष्ट कहा है कि ‘‘श्री त्रिवन्द्र रावत के चुक या कृत्य के कारण कृषि निदेशक डा0 लाल अनियमितताएं कर पाये तथा एक अपराधिक षढ़यंत्र रच कर उसका लाभ उठा पाये। श्री रावत अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों के निर्वहन में असफल पाये गये। उनके कृत्य और चूक से मै0 निधी सीड्स कारपारेशन को अनुचित लाभ पहुंचा जो लोकहित के विपरीत था। इससे श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ‘‘प्रीवेशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धरा 13 (एक) (डी) (तीन) की परिधि में आते हैं तथा सरकार उक्त तथ्यों का परीक्षण कर कार्यवाही करे।’’

घोटाले में 14 करोड़ का घपला

इस घाटाले की जांच पहले भी की जा चुकी थी जिसमें 4 जिलों में मुख्य कृषि अधिकारियों समेत 143 कर्मचारियों को दोषी पाया गया था, लेकिन निदेशक ने मामला दवा दिया था। घोटाले में आरोप था कि बिना मांग का आंकलन किये 4 मैदानी जिलों के लिये 13,184 कुंतल ढैंचा बीज का क्रय किया गया। इस बीज की दर क्रय समिति द्वारा 3,989 रुपये प्रति कुंतल तय की गयी थी जिसका भुगतान लगभग 5,25,38,240 रुपये बनता था, लेकिन मिली भगत से कुल 14,03,33,302 रुपये का ड्राफ्ट देहरादून जिले के विभागीय खाते में शासन से मंगवाया गया, जबकि भुगतान देहरादून के अलावा नैनीताल, उधमसिंहनगर और हरिद्वार जिलों की ओर से भी होना था। यह बीज अप्रैल अंत तक बो दिया जाता है लेकिन इसकी आपूर्ति मई 28 मई 2011को दिखाई गयी। बीज की आपूर्ति कम और भुगतान ज्यादा दिखाया गया। यही नहीं वाणिज्य कर विभाग से जब बीज ढोने वाले ट्रकों की संख्या का मिलान किया गया तो ट्रक कम मिलने के साथ ही एक ही दिन में एक ही ट्रक से रुड़की और नैनीताल में आपूर्ति दिखायी गयी।

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