सार्वजनिक रूप से नाक मत साफ करो, रुमाल साथ रखो” Don’t blow your nose in public

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
दरअसल यह टिप्पणी तो डोनाल्ड ट्रंप पर भी पूरी तरह फिट बैठती है, जिन्हें सार्वजनिक शिष्टाचार निभाने की शायद ही कोई परवाह हो। इस संदर्भ में मुझे अपने पिता जी की एक शिक्षाप्रद सीख बार-बार याद आती है।
मेरे पिता जी स्नान करते समय पहले अपने कपड़े स्वयं धोते थे। एक दिन की बात है, वे कपड़े धो रहे थे। मैंने उनसे कहा, “पिताजी, मेरा यह रुमाल भी धो दीजिए।” उस समय मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। बातचीत के दौरान मैंने उनसे यूँ ही पूछ लिया, “आपको मालूम है, यह रुमाल कितने का होगा?”
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “मुझे क्या मालूम, मैंने तो इसे खरीदा नहीं है।”
मैंने गर्व से कहा, “मेरा रुमाल बारह आने का है।”
उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, “और मेरा रुमाल केवल चवन्नी का है।”
फिर गंभीर होकर बोले, “जब तुम स्वयं कमाने लगोगे, तब इससे भी अच्छा और महँगा रुमाल खरीद सकोगे। लेकिन फिलहाल एक बात गाँठ बाँध लो— Don’t blow your nose in public, keep a handkerchief; but first deserve, then desire. अर्थात् पहले स्वयं को योग्य बनाओ, फिर इच्छाएँ पालो। योग्यता होगी तो इच्छाओं की पूर्ति अपने आप हो जाएगी।”
सच तो यह है कि नौवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि रुमाल रखने का असली उद्देश्य क्या होता है। मैं अक्सर अपनी कमीज़ या कोट की बाँह पर ही नाक पोंछ लिया करता था। यही कारण था कि मेरी कोट की बाँह पर मैल और कड़ा कलफ़ जमा रहता था। जब मेरी माँ कपड़े धोती थीं, तो उन्हें इस आदत की वजह से अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी।
आज जब सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार और मर्यादा का ह्रास दिखाई देता है, तब पिता जी की वह छोटी-सी सीख और भी अधिक प्रासंगिक लगती है। रुमाल केवल नाक पोंछने का साधन नहीं, बल्कि सभ्यता, आत्मअनुशासन और संस्कार का प्रतीक भी है। और उससे भी बड़ी सीख यह है कि जीवन में पहले स्वयं को योग्य बनाना चाहिए, फिर सुविधाओं और विलासिताओं की आकांक्षा करनी चाहिए।
