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डॉ. राममनोहर लोहिया : वैचारिक असहमति और संसदीय गरिमा का एक दौर

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
विलियम शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक मैकबेथ में एक पात्र मैल्कम का संवाद है—
“This tyrant, whose sole name blisters our tongues, was once thought honest.”
अर्थात्, जिस अत्याचारी का नाम लेने मात्र से आज हमारी जुबान पर छाले पड़ जाते हैं, उसे कभी ईमानदार समझा जाता था।
शेक्सपियर के इस संवाद ने मुझे डॉ. राममनोहर लोहिया से जुड़ा एक पुराना प्रसंग याद दिला दिया। कल, 12 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि थी। इसी अवसर पर वह घटना स्मरण हो आई, जिसकी उस समय के अखबारों में काफी चर्चा हुई थी।
बात 1963 की है। डॉ. राममनोहर लोहिया उपचुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे थे। जिस दिन वह सदन में प्रवेश कर रहे थे, उन्हें देखकर पंडित जवाहरलाल नेहरू के घनिष्ठ मित्र और वरिष्ठ सांसद महावीर त्यागी ने नेहरू जी की ओर इशारा करते हुए एक शेर सुनाया—

“उनको आता देखकर चेहरे पे बल पड़े,
छाती उनकी छलनी हुई, छाले उबल पड़े।”
यह सुनते ही पूरा सदन ठहाकों से गूंज उठा। सभी जानते थे कि डॉ. लोहिया पंडित नेहरू के प्रखर आलोचक थे। लेकिन उनकी आलोचना व्यक्तिगत कटुता या निम्नस्तरीय आरोपों पर आधारित नहीं होती थी। वह गहन अध्ययन, वैचारिक असहमति और बौद्धिक तर्कों से परिपूर्ण होती थी। राजनीतिक विरोध के बावजूद उस दौर में संसदीय संवाद और परस्पर सम्मान की एक विशिष्ट परंपरा थी।
डॉ. लोहिया नेहरू जी को ‘वशिष्ठ ब्राह्मण’ भी कहा करते थे। वह केवल राजनेता नहीं, बल्कि गंभीर चिंतक, अर्थशास्त्री, समाजवादी विचारक और भाषाविद भी थे। राजनीति से लेकर इतिहास, समाज, संस्कृति और साहित्य तक उनकी गहरी रुचि थी।
उस समय की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहते थे। इनमें धर्मयुग और हैदराबाद से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका कल्पना प्रमुख थीं। उनके विचारों में मौलिकता थी और अभिव्यक्ति में अद्भुत स्पष्टता।

मैंने भी उनकी कुछ पुस्तकें पढ़ी थीं, जिनमें जाति प्रथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रबल समर्थक थे, लेकिन अंग्रेजी पर भी उनका असाधारण अधिकार था। अंग्रेजी में लिखी उनकी पुस्तकों में India, China and Northern Frontiers तथा Wheel of History मुझे विशेष रूप से याद हैं। ये दोनों पुस्तकें मैंने उत्तरकाशी में सूचना विभाग के पुस्तकालय में पढ़ी थीं।
उस दौर की प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका दिनमान में संसद के भीतर डॉ. लोहिया के भाषणों और बहसों की रिपोर्ट नियमित रूप से प्रकाशित होती थी। उनके भाषणों में तथ्यों की प्रचुरता, तर्कों की धार और सत्ता से असहमत होने का साहस दिखाई देता था।
अपने अध्ययनकाल के दौरान मुझे उन्हें प्रत्यक्ष सुनने का अवसर भी मिला। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के एक आयोजन में मैंने पहली बार डॉ. लोहिया को देखा और उनका भाषण सुना था। बाद में एक अवसर पर दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित कॉफी हाउस में भी उन्हें कॉफी पीते हुए देखा। वे दृश्य आज भी स्मृतियों में सुरक्षित हैं।

भारतीय पौराणिक साहित्य की उनकी व्याख्याएं भी अत्यंत मौलिक और विचारोत्तेजक होती थीं। रामायण और महाभारत के पात्रों को वह केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संदर्भों में भी देखते थे। महाभारत की द्रौपदी पर उनका प्रसिद्ध लेख कृष्ण-कृष्णा विशेष रूप से पढ़ने योग्य है। उसमें उनके चिंतन की गहराई और स्त्री के व्यक्तित्व के प्रति उनकी संवेदनशील दृष्टि दिखाई देती है।
डॉ. लोहिया आजीवन अविवाहित रहे। उन्होंने अपना जीवन राजनीति, समाजवादी आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन के विचारों को समर्पित कर दिया।
उनके जीवन के अंतिम दिनों की स्मृतियां भी मन में उभर आती हैं। जब वह दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती थे, तब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी उन्हें देखने गई थीं। वह काफी देर तक उनके पास बैठी रहीं। उन दिनों एक प्रसंग की चर्चा हुई थी कि अचेतन अवस्था में डॉ. लोहिया कुछ बड़बड़ा रहे थे। उनके मुख से बार-बार यह प्रश्न निकल रहा था—’रजिया को किसने मारा होगा?’

डॉ. राममनोहर लोहिया ने 12 अक्टूबर 1967 को अंतिम सांस ली। उनकी पुण्यतिथि पर उन स्मृतियों को याद करते हुए भारतीय राजनीति का वह दौर भी आंखों के सामने आ जाता है, जब वैचारिक मतभेद तीखे होते थे, लेकिन राजनीतिक विमर्श में अध्ययन, तर्क, साहित्य और बौद्धिकता का महत्वपूर्ण स्थान था। डॉ. लोहिया उस परंपरा के ऐसे प्रतिनिधि थे, जिन्होंने सत्ता के सामने असहमति को लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता माना।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज और राजनीति की सोच में बुनियादी परिवर्तन चाहते थे।

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