सशक्त युवा, सशक्त राष्ट्र: 2047 तक विकसित भारत के लिए भारत का दृष्टिकोण
सरकार ने शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता, खेल, स्वास्थ्य और नागरिक भागीदारी जैसे क्षेत्रों में युवाओं पर केंद्रित कई पहल शुरू कीं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और युवाओं के नेतृत्व वाले विकास के विज़न के आधार पर, सरकार ने शिक्षा तक पहुँच बढ़ाई, उच्च शिक्षा को मजबूत किया और कौशल विकास व रोजगार के अवसर बढ़ाए। भारत के स्टार्टअप तंत्र में भी इजाफा हुआ, जिसमें 2.3 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप शामिल हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, समावेशी कार्यक्रमों और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से, देश के युवा ‘अमृत पीढ़ी‘ के रूप में उभरे हैं और ‘विकसित भारत @ 2047′ के विज़न में योगदान दे रहे हैं।
– A PIB FEATURE-
अपनी लगभग 65 प्रतिशत आबादी के 35 वर्ष से कम उम्र के होने के कारण, भारत अपने इतिहास के एक अहम मोड़ पर है। सरकार इस जनसांख्यिकीय लाभांश की अपार क्षमता को पहचानती है। पिछले 12 वर्षों में, देश ने युवाओं के साथ सरकार के जुड़ाव के तरीके में एक बुनियादी बदलाव देखा है। यह दौर भारत के युवाओं को राष्ट्रीय विकास की ताकत में बदलने के लिए किए गए व्यवस्थित और परिवर्तनकारी प्रयासों को दर्शाता है। यह बदलाव शिक्षा, कौशल विकास, खेल और उद्यमिता सहित हर क्षेत्र में दिखाई देता है। युवाओं को अब केवल निष्क्रिय लाभार्थी नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें “अमृत पीढ़ी” के रूप में पहचाना जाता है। वे ‘विकसित भारत @ 2047′ के मुख्य निर्माता और सह-रचनाकार के रूप में उभरे हैं।
युवाओं के नेतृत्व वाले विकास पर ध्यान
पिछले दशक में युवाओं के विकास के प्रति भारत के नज़रिए में काफ़ी बदलाव आया है, जो युवा और गतिशील आबादी की बदलती आकांक्षाओं और ज़रूरतों को दर्शाता है।
राष्ट्रीय युवा नीति (एनवाईपी) 2014 ने देश में युवाओं के विकास के लिए बुनियादी ढांचा तैयार किया। इसमें 15-29 साल के लोगों को युवा माना गया और शिक्षा, रोज़गार, कौशल विकास, स्वास्थ्य, खेल, सामाजिक भागीदारी और सशक्तिकरण जैसे अहम क्षेत्रों की पहचान की गई। इसका मुख्य ज़ोर पहुँच, समावेश और संस्थागत मज़बूती पर था।
इसी बुनियाद को आगे बढ़ाते हुए, सरकार ने हाल के वर्षों में युवाओं के नेतृत्व वाले विकास का विज़न पेश किया है। इसमें युवाओं को सिर्फ़ सरकारी कार्यक्रमों का लाभार्थी के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय साझेदार के तौर पर देखा गया है।
हाल ही में प्रस्तावित राष्ट्रीय युवा नीति 2025 का ढांचा भविष्य के लिए ज़रूरी कौशल, उद्यमिता, नेतृत्व, नागरिक भागीदारी, डिजिटल भागीदारी और टिकाऊ विकास जैसी उभरती प्राथमिकताओं पर और ज़ोर देता है।
शिक्षा: हर युवा भारतीय के लिए गुणवत्ता, पहुँच और सशक्तिकरण
हाल के वर्षों में शिक्षा के प्रति भारत का नज़रिया काफ़ी बदला है। अब ध्यान सिर्फ़ ‘पहुँच बढ़ाने’ से हटकर ‘गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने’ पर केंद्रित हो गया है। शिक्षा अब शहरों तक ही सीमित न रहकर दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुँच रही है, ताकि सभी को समान अवसर मिल सकें। भारत के युवाओं के लिए सर्वांगीण और भविष्य के लिए तैयार करने वाली शिक्षा सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी 2020) इस बदलाव का मुख्य आधार है। यह देश भर के हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई पहली व्यापक शिक्षा नीति है। यह नीति सीखने वाले को व्यवस्था के केंद्र में रखती है और अनुभव-आधारित तथा बहु-विषयक शिक्षा को बढ़ावा देती है। एनईपी ‘अमृत पीढ़ी’ को सशक्त बनाने और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में अहम भूमिका निभा रही है।
स्कूलों को मज़बूत बनाना: बुनियादी ढाँचा, समावेश और छात्रों को बनाए रखना
पिछले दशक में, सरकार ने युवा सशक्तिकरण और उच्च शिक्षा की नींव के तौर पर स्कूली शिक्षा को मज़बूत किया है। एनईपी 2020 के अनुरूप, स्कूली शिक्षा को प्री-प्राइमरी से लेकर सीनियर सेकेंडरी स्तर तक एक एकीकृत और निरंतर प्रक्रिया के रूप में नए सिरे से तैयार किया गया है।
वर्ष 2025-26 तक, 1.49 लाख से ज़्यादा स्कूलों को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) और डिजिटल पहलों के दायरे में लाया गया है, साथ ही, 1.76 लाख से अधिक स्मार्ट क्लासरूम और 1.79 लाख आईसीटी प्रयोगशालाओं को मंज़ूरी दी गई है।
अलग-अलग सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि वाले युवाओं को शामिल करने और उन्हें पढ़ाई से जोड़े रखने पर खास ज़ोर दिया गया है। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) और नेताजी सुभाष चंद्र बोस आवासीय विद्यालयों (एनएससीबीएवी) जैसी आवासीय स्कूली सुविधाओं ने लड़कियों और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों वाले छात्रों, खासकर दूर-दराज़ और चुनौतीपूर्ण इलाकों में रहने वालों के लिए शिक्षा तक पहुँच को बेहतर बनाया है। इन कोशिशों के साथ-साथ, पीएम-जनमन और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए) जैसी पहलों के तहत हॉस्टल सुविधाओं ने आदिवासी समुदायों के लिए शिक्षा के मौकों को बढ़ाया है।
इन उपायों से सभी स्कूली स्तरों पर दाखिले में सुधार हुआ है और स्कूल छोड़ने वालों की दर में कमी आई है, जिससे ज़्यादा भारतीय युवा माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पा रहे हैं।
भविष्य के लिए तैयार उच्च शिक्षा: मज़बूती, तकनीक और नवाचार
नई शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा तक पहुँचने और उसे देने के तरीके में बुनियादी बदलाव किए हैं। भारतीय युवा अब एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था के ज़रिए सशक्त हो रहे हैं, जो ज़्यादा सशक्त, डिजिटल रूप से सक्षम और नवाचार पर आधारित है।
सीखने में सुधार:
एनईपी 2020 ने ऐसे संरचनात्मक सुधार किए हैं, जो युवाओं को उनकी शैक्षणिक यात्रा पर ज़्यादा नियंत्रण प्रदान करते हैं।
- नेशनल क्रेडिट फ्रेमवर्क (एनसीआरएफ), जिसे 170 विश्वविद्यालयों ने अपनाया है, छात्रों को अकादमिक, कौशल आधारित और अनुभव-आधारित शिक्षा के ज़रिए क्रेडिट जमा करने की सुविधा देता है।
- एकेडमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट्स (एबीसी)ने 2,469 संस्थानों को अपने साथ जोड़ा है और 32 करोड़ से ज़्यादा स्टूडेंट आईडी जारी किए हैं। यह छात्रों को अपनी अकादमिक प्रगति खोए बिना अलग-अलग संस्थानों में क्रेडिट जमा करने, ट्रांसफर करने और रिडीम करने की सुविधा देता है।
- ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री (अपार आईडी)छात्र की सीखने की यात्रा के दौरान हासिल किए गए अकादमिक और कौशल क्रेडिट को इकट्ठा करती है। 31 मार्च, 2026 तक, छात्रों के लिए 15.48 करोड़ से ज़्यादा वेरिफाइड अपार आईडी बनाए जा चुके हैं।
- अब153 विश्वविद्यालय साल में दो बार एडमिशन और कई एंट्री/एक्जिट पॉइंट की सुविधा देती हैं। यह सुविधा 2035 तक उच्च शिक्षा में 50 प्रतिशत ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो (जीईआर) का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में एक अहम कदम है।
शिक्षा में तकनीक और नवाचार
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने के लिए, सरकार ने एक मज़बूत डिजिटल लर्निंग व्यवस्था बनाई है। जून 2026 तक, स्वयं ने 18,580 से ज़्यादा पाठ्यक्रम प्रदान किए हैं, जिसमें 6.1 करोड़ से ज़्यादा नामांकन और 53.7 लाख प्रमाणीकरण दर्ज किए गए हैं। स्वयंप्रभा, पीएम ई-विद्या औऱ दीक्षा टेलीविज़न, रेडियो, डिजिटल कंटेंट और ई-संसाधनों के ज़रिए सीखने के अवसरों को और बढ़ाया है। अकेले दीक्षा में 135 भाषाओं में 3.66 लाख से ज़्यादा ई-कंटेंट संसाधन मौजूद हैं। उच्च शिक्षा के स्तर पर, ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ पहल ने 7,414 संस्थानों में अकादमिक और शोध संसाधनों तक पहुंच बढ़ाई है, जिससे लगभग 99 लाख लोगों को फ़ायदा हुआ है।
नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए, अटल इनोवेशन मिशन ने 10,000 से ज़्यादा अटल टिंकरिंग लैब बनाई हैं, जिनसे 1.1 करोड़ से ज़्यादा छात्रों को मदद मिली है और उभरती तकनीकों में 16 लाख से ज़्यादा परियोजनाओं के विकास में मदद मिली है। इसके अलावा, 72 अटल इनक्यूबेशन सेंटर्स ने 6,700 से ज़्यादा स्टार्टअप्स को समर्थन किया है और 32,000 से ज़्यादा नौकरियां पैदा करने में मदद की है।
उच्च शिक्षा: ज़्यादा संस्थान, ज़्यादा पहुंच
2014 से युवाओं के लिए भारत के उच्च शिक्षा से जुड़े मूलभूत ढ़ांचे का भौतिक विस्तार काफ़ी बड़ा और रणनीतिक रूप से किया गया है।
- उच्च शिक्षा में कुल नामांकन2014-15 में 3.42 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 4.46 करोड़ हो गया है।
- भारत अब दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल व्यवस्था में से एक चलाता है —14.71 लाख स्कूल, जिनमें 24.69 करोड़ छात्र पढ़ते हैं और 1.01 करोड़ से ज़्यादा अध्यापक पढ़ाते हैं।
- मेडिकल कॉलेजों की संख्या2014 में 431 से बढ़कर 2025-26 में 818 हो गई है। 2025-26 तक एमबीबीएस और पीजी सीटों की संख्या बढ़कर क्रमशः 1,28,976 और 85,822 हो गई है।
- पांचआईआईटी — तिरुपति, पलक्कड़, भिलाई, जम्मू और धारवाड़ का विस्तार किया गया है, जिससे 6,576 से ज़्यादा सीटों की वृद्धि हुई है और उनकी कुल छात्र क्षमता दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है।
- दुनिया भर में भारत की अकादमिक उपस्थिति भी बढ़ रही है।जंज़ीबार और अबू धाबी में दो अंतरराष्ट्रीय आईआईटी कैंपस खोले गए हैं। सितंबर 2025 में, आईआईएम अहमदाबाद ने भी अपना दुबई कैंपस खोला। उम्मीद है कि 15 विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर खोलेंगी।
- भारत के उच्च शिक्षा संस्थान अब नामी ग्लोबल संस्थानों के साथ ट्विनिंग,संयुक्त और डुअल डिग्री प्रोग्राम का प्रस्ताव दे रहे हैं। एचईआई की संख्या 2014-15 में 51,000 से ज़्यादा थी, जो जून 2025 तक बढ़कर 70,000 से ज़्यादा हो गई है।
कौशल निर्माण: भविष्य के लिए तैयार कार्यबल तैयार करना
पिछले 12 सालों में, सरकार ने कौशल का एक ऐसा बहु-स्तरीय तंत्र बनाया है, जिसका मकसद देश के युवाओं को वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है। इस व्यवस्थित प्रयास ने पारंपरिक व्यावसायिक प्रशिक्षण से ध्यान हटाकर एक ऐसे मॉडल पर फ़ोकस किया है, जो मांग आधारित और उद्योग जगत से जुड़ा है, और जिसमें उच्च तकनीक वाली क्षमताओं और औद्योगिक कौशल को प्राथमिकता दी जाती है।
स्किल इंडिया मिशन (एसआईएम)
2015 में शुरू किया गया स्किल इंडिया मिशन, कौशल विकास केंद्रों के बड़े नेटवर्क के ज़रिए कौशल, पुर्न कौशल और अप-स्किल प्रशिक्षण देता है। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई अहम योजनाएँ शुरू की हैं कि स्किल इंडिया मिशन कार्यक्रम को असरदार ढंग से लागू किया जा सके:
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई)
- जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस)
- नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम (एनएपीएस)
- औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में क्राफ़्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम (सीटीएस)
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई): 2015 में शुरू की गई यह योजना, रोज़गार और उद्यमिता से जुड़ी एक प्रमुख लघु अवधि, औद्योगिक आधारित कौशल विकास पहल है।
अपने चार चरणों के दौरान, यह एक पायलट इंसेंटिव-बेस्ड सर्टिफिकेशन पहल से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर, मांग-आधारित और परिणाम-उन्मुख कौशल व्यवस्था बन गई है।
- पीएमकेवीवाई 1.0 (2015-16): 19 लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों को ट्रेनिंग दी गई।
- पीएमकेवीवाई 2.0 (2016-20): 1.10 करोड़ से ज़्यादा उम्मीदवारों को प्रशिक्षण/ओरिएंटेशन दिया गया।
- पीएमकेवीवाई 3.0 (2020-22): 7 लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों को ट्रेनिंग दी गई।
पीएमकेवीवाई 3.0 के तहत, सरकार ने कोविड वॉरियर्स के लिए ‘कस्टमाइज़्ड क्रैश कोर्स प्रोग्राम‘ और ‘स्किल हब पहल‘ जैसी खास पहल शुरू कीं। इन पहलों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के अनुसार व्यावसायिक राष्ट्रीय शिक्षा, इंडस्ट्री के लिए ज़रूरी प्रशिक्षण और मुख्यधारा की शिक्षा के साथ कौशल को जोड़ने को बढ़ावा दिया।
- पीएमकेवीवाई 4.0 (2022-26): व्यावहारिक और भविष्य के लिए ज़रूरी कौशल पर ध्यान देते हुए, पीएमकेवीवाई ट्रेनिंग को राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचा (एनएसक्यूएफ) के साथ जोड़ा गया है।
प्रशिक्षण में काम करते हुए सीखने का अनुभव शामिल है और इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उभरते हुए क्षेत्र शामिल हैं। जॉब रोल उद्योग जगत के नेतृत्व वाले सेक्टर स्किल काउंसिल (एसएससी) द्वारा तैयार किए जाते हैं।
- जून 2026 तक, 36 राज्यों और 741 ज़िलों में फैले 40 क्षेत्रों में 27 लाख से ज़्यादा उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दिया गया है।
जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस): 2018 से जन शिक्षण संस्थानों में बदलाव के साथ भारत में कौशल विकास वास्तव में समावेशी हो गया है। स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से पाठ्यक्रम तैयार किए जाते हैं, जिनमें सिलाई, कढ़ाई, हैंडीक्राफ्ट, फ़ूड प्रोसेसिंग और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ शामिल हैं, जिससे ज़मीनी स्तर पर रोज़गार के ज़्यादा मौके पैदा होते हैं। मुख्य उपलब्धियाँ:
o 2018 से 31 मार्च 2026 तक कुल 36.48 लाख लाभार्थियों को ट्रेनिंग दी गई।
o 31 मार्च 2026 तक 26,720 जनजातीय लाभार्थियों को नामांकित किया गया और 26,519 को प्रशिक्षण दिया गया।
o दिसंबर 2024 से, जेएसएस के उत्पाद ‘उद्यमकार्ट’ पोर्टल पर बेचे जा रहे हैं, जिससे कारीगर और छोटे उद्यमी सीधे खरीदारों से जुड़ते हैं।
नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम (एनएपीएस): अगस्त 2016 में शुरू की गई यह योजना अभी अपने दूसरे चरण, एनएपीएस 2.0 में लागू की जा रही है।
यह कार्यक्रम प्रशिक्षुओं को कुछ हद तक भत्ता देकर शिक्षुता प्रशिक्षण को बढ़ावा देता है। शिक्षुता “सीखते हुए कमाना” और उद्योग आधारित कौशल विकास का एक अहम आधार बनी हुई है। सरकार एनएपीएस पोर्टल के ज़रिए प्रशिक्षुओं के बैंक अकाउंट में सीधे स्टाइपेंड का 25% हिस्सा (₹1,500 प्रति महीने तक) जमा करती है।
- 2016 से लेकर 31 मार्च, 2026 तक, ऑटोमोटिव, IT-ITeS, इलेक्ट्रॉनिक्स, रिटेल और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में 54.41 लाख से ज़्यादा प्रशिक्षुओं को काम दिया गया है।
- सितंबर 2025 में शुरू किया गया सीओपी (सर्टिफिकेट ऑफ़ प्रोफ़िशिएंसी) उन प्रशिक्षुओं के लिए एक अतिरिक्त मान्यता है, जो पूरी अवधि और व्यावहारिक मूल्यांकन पूरा करते हैं। 31 मार्च 2026 तक, 67,711 सीओपी जारी किए गए थे।
क्राफ्ट्समेन ट्रेनिंग स्कीम (सीटीएस): कारीगर प्रशिक्षण योजना (सीटीएस) घरेलू उद्योगों के लिए अलग-अलग व्यापारों में कुशल कामगारों की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करती है। इसका मकसद व्यवस्थित प्रशिक्षण के ज़रिए औद्योगिक उत्पादन की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों को बेहतर बनाना है। साथ ही, इसका उद्देश्य पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी के लायक कौशल सिखाकर उनमें बेरोज़गारी को कम करना भी है।
- सीटीएस के तहत, देश भर में 14,688 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (सरकारी – 3,345 और निजी – 11,343) के ज़रिए 169 पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण दिया जाता है।
- मार्च 2026 तक, तीन साल की अवधि में कुल 14 नए सीटीएस पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं और 22 मौजूदा पाठ्यक्रमों में बदलाव किए गए हैं। ये पाठ्यक्रम इंडस्ट्री की ज़रूरतों के अनुरूप हैं।
इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आईटीआई)
आईटीआई भारत में दीर्घावधि तक चलने वाली व्यावसायिक शिक्षा की रीढ़ हैं और उद्योग को कुशल कर्मियों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित कराते हैं। पिछले 12 सालों में, सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि इस नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार और आधुनिकीकरण हो।
पीएम-सेतु (उन्नत आईटीआई के ज़रिए प्रधानमंत्री कौशल और रोजगार क्षमता परिवर्तन में बदलाव) को अक्टूबर 2025 में शुरू किया गया था। यह केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना है, जिसकी अनुमानित लागत ₹60,000 करोड़ है।
इसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- हब-एंड-स्पोक मॉडल के तहत 1,000 सरकारी आईटीआई (200 हब आईटीआई और 800 स्पोक आईटीआई) को अत्याधुनिक अवसंरचना और आधुनिक उपकरणों के साथ अपग्रेड करना।
- क्लस्टर के सह-स्वामित्व और सह-प्रबंधन के लिए एंकर इंडस्ट्री पार्टनर्स (एआईपी) के साथ स्पेशल पर्पस व्हीकल्स (एसपीवी) की स्थापना करना।
- लेबर मार्केट की मांग के आधार पर पाठ्यक्रम शुरू करना और उन्हें फिर से डिज़ाइन करना, जिसमें आधुनिक तकनीक के साथ अपग्रेड किए गए ज़्यादा मांग वाले पारंपरिक ट्रेड शामिल हैं।
- हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु और अन्य सहित कई राज्य अपनी मुख्य क्षमताओं के आधार पर 1,000 आईटीआई के अपग्रेडेशन में सहयोग कर रहे हैं।
- वैश्विक साझेदारी के साथ कौशल विकास के लिए नेशनल सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस के तौर पर पांच नेशनल स्किल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट्स (भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, कानपुर और लुधियाना) की क्षमता बढ़ाना।
एसओएआर (एआई के लिए तैयारी हेतु कौशल विकास)
जुलाई 2025 में शुरू किया गया एसओएआर, कक्षा 6 से 12 तक के स्कूली छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में जानकारी और एआई से जुड़े बुनियादी कौशल सिखाता है। यह शिक्षकों को भी एआई जानकारी को पढ़ाई-लिखाई में शामिल करने के लिए तैयार करता है। यह कार्यक्रम छात्रों के लिए 15-घंटे के तीन मॉड्यूल पेश करता है:
- एआई के बारे में जानना
- एआई के प्रति आकांक्षा रखना
- एआई कौशल हासिल करना
यह शिक्षकों के लिए 45-घंटे का एक खास मॉड्यूल भी पेश करता है, जिसमें नैतिक एआई के इस्तेमाल और मशीन लर्निंग के बुनियादी विषयों पर ध्यान दिया जाता है।
एसओएआर के तहत, आईबीएम, माइक्रोसॉफ्ट और सिस्को जैसी वैश्विक तकनीक कंपनियों के साथ मिलकर लधु अवधि के पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। ये साझेदारी भारतीय युवाओं को भविष्य के लिए ज़रूरी कौशल से लैस कर रही हैं, ताकि वे न केवल आज की नौकरियों के लिए, बल्कि आने वाले समय के अवसरों के लिए भी तैयार रहें।
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (पीएमआईएस)
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (पीएमआईएस) अकादमिक शिक्षा और उद्योग जगत की ज़रूरतों के बीच के अंतर को कम करने के लिए एक अहम और बदलाव लाने वाली पहल है। अक्टूबर 2024 में शुरू की गई इस पहल का मकसद देश भर के युवाओं को व्यवस्थित और पेड इंटर्नशिप के अवसर देना है।
मुख्य विशेषताओं में शामिल हैं:
- मई 2026 तक 63 हज़ार से ज़्यादा इंटर्नशिप के अवसर उपलब्ध हैं
- ₹9,000की मासिक आर्थिक सहायता (सरकार + कंपनी का योगदान)
- ₹6,000की एकमुश्त आकस्मिक अनुदान
- एमसीए और होस्ट कंपनी द्वारा जारी संयुक्त डिजिटल सर्टिफिकेट
- इंटर्न का ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ और ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ के तहत बीमा
- 730से ज़्यादा ज़िलों और सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 25 से ज़्यादा क्षेत्रों में अवसर
| अवसर से प्रभाव तक: करियर को आकार देती इंटर्नशिप
दिल्ली की 23 वर्षीय पॉलिटिकल साइंस ग्रेजुएट, अवि राणा ने ओएनजीसी के कौशल विकास केंद्र और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस डिवीज़न में इंटर्नशिप की। इंटर्नशिप के दौरान, उन्होंने ब्रांड मैनेजमेंट, स्पॉन्सरशिप, एडवरटाइजिंग और एसएपी वर्कफ़्लो पर काम किया, जिससे उन्हें संगठनात्मक प्रक्रियाओँ का व्यावहारिक अनुभव मिला। उनके सफ़र की एक खास बात इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स समेत वरिष्ठ नेतृत्व के साथ बातचीत करना था, जिससे उनका नज़रिया व्यापक हुआ और आत्मविश्वास बढ़ा। इस इंटर्नशिप ने उन्हें कक्षा की पढ़ाई से हटकर असल दुनिया का अनुभव दिया और उन्हें प्रोफेशनल करियर के लिए तैयार किया। |
स्किल इंडिया डिजिटल हब (एसआईडीएच): कौशल विकास के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण
2023 में शुरू किया गया ‘स्किल इंडिया डिजिटल हब’ (एसआईडीएच) कौशल विकास, रोज़गार, अप्रेंटिसशिप और उद्यमिता के लिए एक एकीकृत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मंच के तौर पर काम करता है। यह सीखने वालों, प्रशिक्षण देने वालों, नौकरी देने वालों और सरकारी कार्यक्रमों को एक ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ता है। एसआईडीएच ने कौशल व्यवस्था में अवसरों और सेवाओं तक पहुँच को आसान बना दिया है।
मई 2026 तक, एसआईडीएच के 1.89 करोड़ से ज़्यादा नामांकित उपयोगकर्ता थे, इसने लगभग 1.38 करोड़ ई-केवाईसी वेरिफिकेशन पूरे किए और 23 भाषाओं में मौकों तक पहुँच प्रदान की। इस मंच पर अलग-अलग क्षेत्रों के 1,000 से ज़्यादा पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा, इस मंच को डिजिलॉकर, ई-श्रम, नेशनल करियर सर्विस (एनसीएस), यूआईडीएआई और पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (पीएफएमएस) जैसी प्रमुख राष्ट्रीय डिजिटल व्यवस्था के साथ जोड़ा गया है।
संकल्प के ज़रिए कौशल विकास व्यवस्था को मज़बूत करना
आजीविका संवर्धन के लिए कौशल विकास और ज्ञान जागरूकता (संकल्प ) कार्यक्रम विश्व बैंक की मदद से शुरू की गई एक पहल थी, जिसे 2018 में शुरू किया गया और मार्च 2025 में पूरा किया गया। ₹1,650 करोड़ के कुल परिव्यय वाले संकल्प के तीन मुख्य उद्देश्य थे — संस्थागत मज़बूती, गुणवत्ता आश्वासन और समावेशी कौशल विकास।
मुख्य उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
- ज़िला कौशल समितियों (डीएससी) की संख्या 2019-20 में 248 से बढ़कर 2024-25 में 776 हो गई, जिससे लगभग पूरा देश इसके दायरे में आ गया।
- स्थानीय स्तर पर कौशल विकास की रणनीतियों के लिए ज़रूरी ज़िला कौशल विकास योजनाओं (डीएसडीपी) का दायरा 223 से बढ़कर 746 ज़िलों तक हो गया। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के अनुरूप मांग-आधारित कौशल विकास सुनिश्चित हुआ।
- ‘बेहतर रोज़गार और निरंतरता के लिए त्वरित मिशन’ (एएमबीईआर)प्रोजेक्ट ने नवाचार आधारित प्रशिक्षण के ज़रिए बेहतर रोज़गार और निरंतरता के नतीजे दिखाए। मार्च 2025 में इसके पूरा होने तक, 24,055 उम्मीदवारों को प्रमाण पत्र दिए गए और 18,192 उम्मीदवारों को नौकरी मिली।
- उद्यमिता पहलों के कारण 21,602 उद्यम स्थापित हुए और 20,875 उद्यम रजिस्ट्रेशन/ट्रेड लाइसेंस की सुविधा मिली, जिससे 20,575 से ज़्यादा वेतन-आधारित रोज़गार के अवसर पैदा हुए।
- संकल्प के तहत 16 देशों को कवर करने वाला एक ‘वैश्विक कौशल कमी अध्ययन’ पूरा किया गया, जिससे 25,000 से ज़्यादा भारतीय उम्मीदवारों को अंतरराष्ट्रीय रोज़गार बाज़ार में भेजने में मदद मिली।
- सौर तकनीशियन और इलेक्ट्रॉनिक्स मैकेनिक ट्रेड के लिए सीखने का शानदार अनुभव देने के लिए ऑगमेंटेड रियलिटी (एआर) और वर्चुअल रियलिटी (वीआर) तकनीक का इस्तेमाल करके छह सिम्युलेटेड ई-स्किल लैब विकसित की गईं।
भारत के युवाओं के लिए रोज़गार के रास्ते बनाना
सरकार ने भारत की जनसांख्यिकीय लाभांश को राष्ट्रीय विकास की ताकत में बदलने के लिए व्यवस्थित प्रयास किए हैं। यह बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा करके और खास नीतिगत उपायों के ज़रिए किया जा रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था का औपचारिक होना पिछले दशक के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक बदलावों में से एक रहा है। युवाओं को संगठित क्षेत्र में लाने में काफी प्रगति हुई है। ईपीएफओ के आंकड़ों से पता चलता है कि अप्रैल 2020 से जून 2025 के बीच 18-28 साल की उम्र के 3.45 करोड़ से ज़्यादा युवा औपचारिक कार्यबल में शामिल हुए हैं।
रोज़गार के लिए सीधे उपाय: युवाओं को अवसरों से जोड़ना
प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना: इस योजना की घोषणा सरकार ने अगस्त 2025 में ₹1 लाख करोड़ के बड़े परिव्यय के साथ की थी। यह योजना नियोक्ताओं और औपचारिक क्षेत्र में पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारियों, दोनों को रोज़गार से जुड़े प्रोत्साहन देती है। इस योजना का लक्ष्य दो साल के भीतर 3.5 करोड़ नौकरियां पैदा करने में मदद करना है, जो भारत के इतिहास में रोज़गार से जुड़े सबसे बड़े उपायों में से एक है।
रोज़गार मेले: अक्टूबर 2022 में शुरू किए गए ये मेले देश भर में रोज़गार पैदा करने और कार्यबल को मज़बूत करने की दिशा में एक अहम कदम हैं। इनका मकसद युवाओं को सार्थक नौकरी के अवसर देकर सशक्त बनाना और राष्ट्रीय विकास में उनकी भूमिका को बढ़ाना है। अपनी शुरुआत के बाद से, 18 रोज़गार मेलों के ज़रिए देश भर के युवाओं को कुल मिलाकर 12 लाख से ज़्यादा नियुक्ति पत्र दिए गए हैं।
नेशनल करियर सर्विस (एनसीएस) पोर्टल: एनसीएस भारत के डिजिटल रोज़गार बाज़ार के तौर पर काम करता है। जुलाई 2015 में शुरू किया गया यह पोर्टल नौकरी की तलाश में जुटे युवाओं को अलग-अलग क्षेत्रों के नियोक्ताओं से जोड़ता है, जिससे जानकारी की कमी दूर होती है और देश के हर कोने में युवाओं तक रोज़गार के अवसर पहुँचते हैं।
जनवरी 2026 तक, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एनसीएस पोर्टल पर 78.86 लाख से ज़्यादा नौकरी तलाशने वाले और 12.36 लाख से ज़्यादा नियोक्ता नामांकित हो चुके हैं। इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एनसीएस पोर्टल पर 3.43 करोड़ से ज़्यादा रिक्तियां उपलब्ध कराई गई हैं।
आत्मनिर्भर भारत रोज़गार योजना (एबीआरवाई): कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई इस योजना का मकसद नौकरियों को बचाना और नए रोज़गार को बढ़ावा देना था। अक्टूबर 2020 से मार्च 2024 तक चली इस योजना के तहत, नए कर्मचारियों के लिए नियोक्ता के ईपीएफ योगदान को कवर किया गया, जिससे आर्थिक अनिश्चितता के दौर में भर्ती की लागत कम हुई। योजना के खत्म होने तक, 60.49 लाख लोगों को इसका फ़ायदा मिला।
| रक्षा क्षेत्र में युवा
जून 2022 में शुरू की गई अग्निपथ योजना के तहत, 17.5 से 21 साल की उम्र के युवाओं को चार साल के कार्यकाल के लिए सशस्त्र बलों में ‘अग्निवीर’ के तौर पर भर्ती किया जाता है। देश की सेवा के अलावा, यह कार्यक्रम युवाओं को अनुशासन, तकनीकी कौशल और नेतृत्व की क्षमताएं भी सिखाता है। कार्यकाल पूरा होने पर, इन अग्निवीरों को सरकार से ‘सेवा निधि’ वित्तीय पैकेज मिलता है, जो उनके नागरिक करियर में मदद करता है। 2025 की शुरुआत तक, इस योजना के तहत 1.5 लाख तक अग्निवीरों को शामिल किया जा चुका था। सेवा के बाद रोज़गार में आसानी के लिए, सरकार ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल सेंट्रल (सीएपीएफ) और असम राइफ़ल्स में भर्ती के लिए पूर्व अग्निवीरों को 10 प्रतिशत आरक्षण और उम्र में छूट दी है। फ़रवरी 2026 में, भारतीय रेलवे और भारतीय सेना ने अग्निवीरों और पूर्व सैनिकों के लिए रोज़गार के मौकों को बेहतर बनाने के लिए सहयोग का एक फ़्रेमवर्क भी शुरू किया। मौजूदा नीति के तहत, रेलवे में लेवल-1 की 10 प्रतिशत पोस्ट और लेवल-2 व उससे ऊपर की 5 प्रतिशत पोस्ट पूर्व अग्निवीरों के लिए आरक्षित हैं, जिससे उनके नागरिक क्षेत्र में रोज़गार में जाने के लिए व्यवस्थित मौके बनते हैं। |
विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र में रोज़गार सृजन: ‘मेक इन इंडिया‘ और पीएलआई योजनाएं
जब सरकार ने 25 सितंबर 2014 को ‘मेक इन इंडिया’ की शुरूआत की थी, तो मकसद साफ़ था — भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना और बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा करना। बारह साल बाद, इसके नतीजे फ़ैक्टरियों, सप्लाई चेन और लाखों युवा भारतीयों की आजीविका में साफ़ दिखाई देते हैं।
‘मेक इन इंडिया 2.0′ में अब 27 क्षेत्र शामिल हैं — 15 विनिर्माण और 12 सेवा क्षेत्र— जिनमें एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल, फ़ूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल्स, ड्रोन और आईटी शामिल हैं। ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत के युवा और कुशल कार्यबल को सबसे ज़्यादा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है।
इस पहल के केंद्र में ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ (पीएलआई) योजना है। मार्च 2020 में सरकार द्वारा शुरू की गई यह योजना 14 अहम क्षेत्रों में लागू की गई है, ताकि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके और भारत के विनिर्माण तंत्र में नया निवेश लाया जा सके। इस योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में अहम फ़ायदे दिखे हैं, जिससे वैश्विक विनिर्माण में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मज़बूत हुई है:
- पीएलआई-आधारित निवेश ने भारत में स्मार्टफ़ोन उत्पादन को बढ़ावा दिया है, जिससे देश एक बड़ा वैश्विक मोबाइल फ़ोन विनिर्माण केंद्र बन गया है।
- 31 मार्च 2026 तक, अलग-अलग क्षेत्रों में ₹2.40 लाख करोड़ से ज़्यादा का वास्तविक निवेश हुआ है, जिससे ₹22.66 लाख करोड़ से ज़्यादा का उत्पादन/बिक्री हुई है और 14.15 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) मिला है।
- पीएलआई योजना के तहत निर्यात ₹15.20 लाख करोड़ से ज़्यादा हो गया है।
पीएलआई योजनाएं अब सिर्फ़ नीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है:
उद्यमशीलता: युवाओं के नेतृत्व वाले व्यापार और नवाचार को बढ़ावा देना
पिछले 12 सालों में, सरकार ने उद्यमशीलता का एक मज़बूत तंत्र बनाया है, जो युवा भारतीयों को नौकरी खोजने वाले के बजाय नौकरी देने वाला बनने में मदद करता है। नीतिगत समर्थन के ज़रिए, आसानी से वित्तीय मदद मिलने, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और नवाचारों पर केंद्रित पहलों के ज़रिए, पूरे देश में उद्यमशीलता का विस्तार हुआ है।
स्टार्टअप इंडिया: दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तंत्र बनाना
16 जनवरी 2016 को शुरू की गई ‘स्टार्टअप इंडिया ‘ पहल देश के नवाचार की नींव का एक अहम हिस्सा बन गई है। पिछले दशक में, इस आंदोलन ने भारत की आर्थिक दिशा को पूरी तरह से बदल दिया है और युवाओं को नौकरी खोजने वालों से बदलकर साहसी नौकरी देने वालों में बदल दिया है।
भारत के स्टार्टअप क्षेत्र का विकास पूरे देश में नवाचार के व्यवस्थित विस्तार को दर्शाता है।
- 2014से पहले, भारत में सिर्फ़ 350 स्टार्टअप थे। जून 2026 तक, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या बढ़कर 2.3 लाख से ज़्यादा हो गई है, जिससे भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप तंत्र बन गया है।
- पिछले दशक में भारत के उच्च मूल्यों वाले व्यवस्था तंत्र में काफी इजाफा हुआ है। 2014 में $1 बिलियन से ज़्यादा मूल्य वाली सिर्फ़ 4 निजी कंपनियाँ थीं, जिनकी संख्या 2026 की शुरुआत तक बढ़कर 120 से ज़्यादा हो गई है। अब इनका कुल मूल्य $350 बिलियन से ज़्यादा है। यह भारत के स्टार्टअप तंत्र के बड़े पैमाने और दुनिया भर में इसकी बढ़ती अहमियत को दिखाता है।
- शुरुआत में टियर-1 शहर आगे थे, लेकिन अब यह लहर छोटे कस्बों और गाँवों तक पहुँच गई है। आज, मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से लगभग 50 प्रतिशत टियर-2 और टियर-3 शहरों से आते हैं, जो यह दिखाता है कि नवाचार अब सिर्फ़ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है।
| सूचक | 2026 |
| डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप | 2.3 लाख+ (जून 2026) |
| यूनिकॉर्न कंपनियाँ | 120+ |
| कुल यूनिकॉर्न का मूल्य | $350 बिलियन+ |
| टियर-2/3 शहरों से स्टार्टअप | ~50% |
| महिला निदेशक/पार्टनर वाले स्टार्टअप | 45%+ (दिसंबर 2025) |
- स्टार्टअप युवाओं के लिए रोज़गार का एक अहम ज़रिया बनकर उभरे हैं, जिन्होंने अप्रैल 2026 तक कुल मिलाकर 23 लाख से ज़्यादा नौकरियाँ पैदा की हैं। ये कंपनियाँ तकनीक, विनिर्माण और गिग इकॉनमी में मौके पैदा करने के लिए भारत की युवा आबादी का लाभ उठाती हैं।
वित्तीय अवसंरचना: हर स्तर पर पूंजी
पिछले दशक में पीएमआईएस द्वारा किए गए सबसे अहम बदलावों में से एक है, आजीवन चलने वाला वित्तीय तंत्र बनाना। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी युवा उद्यमी को अपनी यात्रा के किसी भी स्तर पर पूंजी की कमी न हो।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई): 2015 में शुरू की गई पीएमएमवाई एक मुख्य योजना है, जिसका मकसद सूक्ष्म और छोटे व्यवसायों को पूंजी प्रदान करना है। यह योजना सूक्ष्म और छोटे व्यवसायों और युवा उद्यमियों को ₹20 लाख तक का बिना गारंटी वाला लोन देती है।
- स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (एसआईएसएफएस): अप्रैल 2021 से शुरू हुई एसआईएसएफएस, स्टार्टअप इंडिया फ्रेमवर्क के तहत एक खास वित्तीय पहल है। इसका मकसद स्टार्टअप की यात्रा के शुरुआती चरणों में पूंजी की कमी को पूरा करना है। इसका लक्ष्य स्टार्टअप को प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट, प्रोटोटाइप विकास, उत्पाद के ट्रायल, बाज़ार में पहुंच और व्यवसायीकरण के चरणों के लिए वित्तीय मदद देना है। इस योजना के तहत शुरुआती चरण के स्टार्टअप को मदद करने के लिए 215 से ज़्यादा इनक्यूबेटरों को ₹945 करोड़ की राशि मंज़ूर की गई है।
- स्टार्टअप के लिए फंड ऑफ़ फंड्स (एफएफएस): 2016 में शुरू की गई यह योजना बढ़ते व्यवसायों के लिए लंबे समय की दीर्घावधि घरेलू जोखिम के लिए पूंजी देती है। ₹10,000 करोड़ के फंड के साथ भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) द्वारा प्रबंधित की जाने वाली एफएफएस, सेबी-रजिस्टर्ड वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) में निवेश करती है। बदले में वे भारतीय स्टार्टअप में पूंजी लगाते हैं। अब तक, यह फंड 145 से ज़्यादा एआईएफ को दिया जा चुका है, जिन्होंने मिलकर पूरे भारत में 1,370 से ज़्यादा स्टार्टअप में ₹25,500 करोड़ से ज़्यादा का निवेश किया है।
- स्टार्टअप के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम (सीजीएसएस): यह योजना वित्तीय संस्थानों के ज़रिए डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप को बिना गारंटी वाला लोन देती है। स्टार्टअप उधारकर्ताओं के लिए ₹800 करोड़ से ज़्यादा के 330 से ज़्यादा लोन की गारंटी दी गई है। इसने युवा उद्यमियों को बैंकों के पास जाने पर आने वाली सबसे आम रुकावटों में से एक को दूर किया है।
- स्टार्टअप इंडिया इन्वेस्टर कनेक्ट पोर्टल: मार्च 2023 में शुरू किया गया यह पोर्टल युवा उद्यमियों को एक ही एप्लीकेशन के ज़रिए कई निवेशकों तक पहुँचने में मदद करता है। यह पहली बार कंपनी शुरू करने वालों को वेंचर कैपिटल और एंजेल नेटवर्क तक पहुँचने की सुविधा देता है, जो पहले उनकी पहुँच से बाहर थे। जून 2026 तक, इस प्लेटफ़ॉर्म पर 10,836 से ज़्यादा पंजीकृत स्टार्टअप, 126 पंजीकृत निवेशक और 44 सक्रिय निवेश के अवसर मौजूद हैं। 6,800 से ज़्यादा स्टार्टअप्स ने निवेशकों की ज़रूरतों पर प्रतिक्रिया दी है, जिससे पहली बार कंपनी शुरू करने वालों के लिए वेंचर कैपिटल और एंजेल इन्वेस्टमेंट नेटवर्क तक पहुँच बढ़ी है।
- ‘स्टैंड-अप इंडिया स्कीम’ ने सभी को साथ लेकर चलने वाली समावेशी उद्यमशीलता को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। यह महिलाओं और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति समुदायों के लोगों को संस्थागत क्रेडिट (बैंक ऋण आदि) पाने में मदद करती है। यह स्कीम विनिर्माण, सेवा, व्यापार और खेती से जुड़े क्षेत्रों में व्यापार शुरू करने के लिए ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक के बैंक ऋण की सुविधा देती है।
‘स्टैंड-अप इंडिया स्कीम’ ने पिछले कुछ सालों में ज़बरदस्त प्रगति की है। इसके शुरू होने के बाद से, मंज़ूर की गई कुल राशि 31 अक्टूबर 2018 को ₹14,431.14 करोड़ थी, जो 17 मार्च 2025 तक बढ़कर ₹61,020.41 करोड़ हो गई।
| बेरोज़गारी से व्यापार तक: एक ग्रामीण युवा का सफ़र
उत्तर प्रदेश के टांडा गाँव के रहने वाले युवा विशाल कुमार के पास मार्केटिंग और सेल्स का कौशल होने के बावजूद उन्हें बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा। कोई पक्की आमदनी न होने के कारण, उन्हें अपने परिवार का गुज़ारा करने में मुश्किल हो रही थी। ‘प्रधानमंत्री मुद्रा योजना’ (पीएमएमवाई) के ज़रिए, उन्होंने कंप्यूटर स्टेशनरी का व्यापार शुरू करने के लिए ₹3 लाख का ऋण लिया। बैंक से शुरुआती मदद मिलने के बाद, उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया और धीरे-धीरे अपना स्टॉक और बिक्री बढ़ाई। समय के साथ, उनका व्यापार स्थिर हो गया और आमदनी में सुधार हुआ। इससे वे अपने घर की मरम्मत करवा पाए और अपने परिवार के लिए बिजली और पानी जैसी ज़रूरी सुविधाएँ जुटा पाए।
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युवाओं के साथ डिजिटल जुड़ाव: ‘मेरा युवा भारत‘ (माई भारत) तंत्र
31 अक्टूबर 2023 को सरकार ने ‘मेरा युवा भारत’ (माई भारत) को एक स्वायत्त ‘फिजिटल’ (फिजिकल + डिजिटल) मंच के तौर पर शुरू किया। यह 15 से 29 साल के भारतीय युवाओं के लिए एक सिंगल, एकीकृत तंत्र बनाने के लिए भौतिक जुड़ाव और डिजिटल संपर्क को एकीकृत करता है। माई भारत एक स्वायत्त शीर्ष निकाय है, जो युवाओं को जोड़ने के लिए “पूरे-सरकार” वाला ढाँचा प्रदान करती है। यह एक ही मंच के ज़रिए सीखने, स्वयं सेवा, मेंटरशिप, करियर से जुड़ी सेवाएँ और नागरिक भागीदारी के मौके देती है।
माय भारत युवाओं को क्या-क्या प्रदान करता है:
- स्वास्थ्य सेवा, लोक प्रशासन, पोस्ट ऑफिस, साइबर सुरक्षा और ऑल इंडिया रेडियो जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में अनुभव-आधारित लर्निंग प्रोग्राम, ताकि युवा पढ़ाई के दौरान ही असल दुनिया का अनुभव ले सकें
- राष्ट्रीय मिशन, सामुदायिक सेवा, पर्यावरण से जुड़े अभियान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़े स्वयं सेवा के अवसर
- सीवी बिल्डर, रोज़गार के अवसर समेत करियर से जुड़े टूल्स और पीएम इंटर्नशिप स्कीम से जुड़ने की सुविधा
- नागरिक भागीदारी के मंच — जैसे युवा संसद और पदयात्रा, जो युवाओं को हर स्तर पर शासन और नीति बनाने की प्रक्रिया से जोड़ते हैं
- राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर बौद्धिक चर्चा के लिए माय भारत पॉडकास्ट, क्विज़ और निबंध मॉड्यूल
- ज़्यादा लोगों तक पहुँचने के लिए 1 अक्टूबर 2025 को शुरू किया गया माय भारत मोबाइल ऐप
विभिन्न मंचों पर प्रभाव (2025-26 तक):
- जून 2026 तक MyBharat पोर्टल पर 2.19 करोड़ से ज़्यादा युवा पंजीकृत
- 383010 अनुभव-आधारित लर्निंग प्रोग्राम बनाए गए, जिनसे 1.03 लाख से ज्यादा युवा जुड़े।
- 1,45,259स्वयं सेवा के अवसर, जिनसे 8,25,825 स्वयं सेवक जुड़े।
- पूरे भारत में ज़मीनी स्तर पर मौजूदगी मज़बूत करने के लिए 170 से ज़्यादा ज़िला युवा अधिकारियों की भर्ती की गई।
माय भारत 2.0 में एआई-सक्षम टूल, मेंटरशिप नेटवर्क और करियर सेवाएं शामिल हैं, यह मंच सिर्फ़ जुड़ाव का ज़रिया न रहकर युवाओं के सशक्तिकरण का एक पूरा तंत्र बन गया है।
विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग (वीबीवाईएलडी) — जिसे 2025 के राष्ट्रीय युवा महोत्सव से नए रूप में तैयार किया गया है। यह युवाओं के नेतृत्व और नीति निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी के लिए मुख्य मंच बन गया है:
- वीबीवाईएलडी 2026 के तहत विकसित भारत चैलेंज क्विज़ (2026) में 50 लाख से ज़्यादा युवाओं ने हिस्सा लिया।
- 21 देशों से भारतीय मूल के 78 युवाओं ने हिस्सा लिया, जिससे ग्लोबल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ।
- ज़िला-वार नेशनल रिपॉज़िटरी (2026) के लिए 6,000 युवा नेताओं की पहचान की गई।
- वीबीवाईएलडी 2026 के विचारों ने सीधे तौर पर केंद्रीय बजट 2026 को प्रेरित किया।
| डिजिटल साक्षरता: पीएमजीदिशा
ग्रामीण भारत के नागरिकों में डिजिटल साक्षरता सुनिश्चित करने के लिए 2017 में प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (पीएमजीदिशा) शुरू किया गया था। इसने नागरिकों (युवाओं सहित) को डिजिटल यंत्र इस्तेमाल करने, इंटरनेट चलाने, सरकारी सेवाओं का ऑनलाइन लाभ उठाने और डिजिटल वित्तीय लेनदेन करने के लिए प्रशिक्षित किया। यह योजना 31 मार्च 2024 को पूरी हुई। यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी डिजिटल साक्षरता पहलों में से एक थी। 6 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने के लक्ष्य के मुकाबले, देशभर में 6.39 करोड़ से ज़्यादा लोगों को प्रशिक्षित किया गया। |
युवाओं के लिए खेल: ज़मीनी स्तर से वैश्विक स्तर की कामयाबी तक
भारत में खेलों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, न तो परिवारों द्वारा और न ही सरकार द्वारा। हालाँकि, पिछले 12 वर्षों में, सरकार ने भारत के खेल परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। लेकिन आज खेल ऐसी चीज़ नहीं माने जाते, जिनसे ध्यान भटकता है, बल्कि उन्हें एक सम्मानित और अच्छा करियर विकल्प माना जाता है। यह बदलाव एक व्यवस्थित व्यवस्था की वजह से आया है, जो गाँव के स्तर से ही प्रतिभा की पहचान करता है और बेहतरीन एथलीटों को विश्व स्तर की वैज्ञानिक सहायता देता है।
प्रतिभा को संस्थागत बनाना: खेलो इंडिया मिशन
2016-17 में शुरू किया गया ‘खेलो इंडिया – खेलों के विकास के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम’ देश भर में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने का मुख्य आधार है। इसका मकसद ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की भागीदारी और खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन को बढ़ावा देना है।
- 1,067 खेलो इंडिया केंद्र और 35 स्टेट सेंटर्स ऑफ़ एक्सीलेंस का एक देशव्यापी नेटवर्क बनाया गया है। ये सुनिश्चित करते हैं कि दूर-दराज़ और कम सुविधा वाले इलाकों सहित सभी ज़िलों में अच्छी प्रशिक्षण सुविधाएँ उपलब्ध हों।
- कीर्ति (खेलो इंडिया राइजिंग टैलेंट आइडेंटिफिकेशन) कार्यक्रम के ज़रिए प्रतिभाओं की पहचान को काफ़ी मज़बूत किया गया है। मार्च 2024 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम में कम उम्र में ही खेल की क्षमता की पहचान करने के लिए डेटा-आधारित आकलन का इस्तेमाल किया जाता है। अब तक 1.8 लाख से ज़्यादा आकलन किए जा चुके हैं, जिससे युवा एथलीटों की एक मज़बूत व्यवस्था तैयार हुई है, जो व्यवस्थित प्रशिक्षण तंत्र में शामिल हो रहे हैं।
- जून 2026 तक, खेलो इंडिया के अलग-अलग कार्यक्षेत्रों के तहत कुल 23,080 एथलीटों को सहायता दी जा रही है। हर एथलीट को कोचिंग, उपकरण, डाइट और प्रतियोगिता के अनुभव के लिए सालाना ₹6.28 लाख की आर्थिक सहायता मिलती है।
- खेलो इंडिया यूथ गेम्स, खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स, खेलो इंडिया पैरा गेम्स और खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसी पहलों के ज़रिए, सरकार ने देश भर के युवाओं, विश्वविद्यालयों के खिलाड़ियों, पैरा-एथलीटों और आदिवासी समुदायों के लिए प्रतिस्पर्धात्मक मंच बनाकर उनकी समावेशी भागीदारी सुनिश्चित की है।
वैश्विक स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन हासिल करना: टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स)
राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शन और वैश्विक स्तर पर पोडियम तक पहुँचने के बीच के अंतर को कम करने के लिए, सरकार ने सितंबर 2014 में टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) शुरू की। यह बेहतरीन खेलों के लिए एक लक्षित और उच्च प्रदर्शन वाला तरीका है। टॉप्स खिलाड़ियों को उनकी ज़रूरतों के हिसाब से और उन पर केंद्रित समर्थन देता है, जिसमें विदेशी कोचिंग, अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण का अनुभव, एडवांस्ड स्पोर्ट्स साइंस, उपकरण और हर महीने स्टाइपेंड शामिल है। यह योजना अभी कोर ग्रुप में 98 खिलाड़ियों और विकास समूहों में 165 खिलाड़ियों को समर्थन देती है, जिसमें ओलंपिक और पैरालंपिक दोनों तरह के खेल शामिल हैं।
इस लंबे समय के निवेश का असर हाल के वर्षों में भारत के वैश्विक प्रदर्शन में साफ़ दिखता है:
फिटनेस एक जन-आंदोलन के रूप में: एक स्वस्थ पीढ़ी का निर्माण
सरकार द्वारा अगस्त 2019 में शुरू किए गए ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ ने फिटनेस को व्यक्तिगत प्रयास से बदलकर एक राष्ट्रीय आंदोलन बना दिया है। यह शारीरिक गतिविधि को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा बनाता है, खासकर युवाओं के बीच।
- इस पहल में बड़े पैमाने पर लोगों ने हिस्सा लिया है, 23.68 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने ‘फिट इंडिया फ्रीडम रन’, ‘फिट इंडिया स्कूल वीक’ और ‘फिट इंडिया क्विज़’ जैसी गतिविधियों में भाग लिया है।
- इस आंदोलन को शिक्षा प्रणाली का भी हिस्सा बनाया गया है।
- जून 2026 तक, 4.5 लाख से ज़्यादा स्कूलों को ‘फिट इंडिया स्कूल फ़्लैग’ से सम्मानित किया गया है, जिससे शारीरिक फिटनेस को रोज़मर्रा की दिनचर्या और सह-पाठ्यचर्या गतिविधियों में शामिल किया गया है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि युवा भारतीयों में कम उम्र से ही फिटनेस, अनुशासन और अच्छी सेहत की आदतें विकसित हों।
- दिसंबर 2024 में शुरू होने के बाद से, ‘फिट इंडिया संडेज़ ऑन साइकिल’ एक देशव्यापी आंदोलन बन गया है। मई 2026 तक, इस आंदोलन में 2.8 लाख से ज़्यादा जगहों पर 30 लाख से ज़्यादा नागरिक शामिल हो चुके हैं।
स्वास्थ्य और कल्याण: युवाओं के लिए एक समग्र दृष्टिकोण
यह मानते हुए कि एक स्वस्थ “अमृत पीढ़ी” राष्ट्रीय उत्पादकता की नींव है, सरकार ने शारीरिक, मानसिक और निवारक देखभाल पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक बहुआयामी स्वास्थ्य ढांचा लागू किया है।
- राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके): 2014 में शुरू किया गया यह प्रमुख कार्यक्रम 10-19 वर्ष की आयु के किशोरों की समग्र ज़रूरतों को पूरा करता है। यह केवल स्वास्थ्य केंद्रों पर मिलने वाली देखभाल से बदलकर समुदाय-आधारित मॉडल में बदल गया है। आरकेएसके में ग्रामीण और शहरी आबादी, स्कूल जाने वाले और स्कूल न जाने वाले युवा, विवाहित और अविवाहित सभी शामिल हैं और इसमें हाशिए पर रहने वाले समूहों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसमें छह मुख्य क्षेत्र शामिल हैं: पोषण, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, चोटें, हिंसा और गैर-संचारी रोग।
किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिकों (एएफएचसी) में काउंसलिंग और चिकित्सकीय सेवाएँ लेने वाले किशोरों की संख्या 2014-15 में 39 लाख से बढ़कर 2024-25 में 1.7 करोड़ हो गई है।
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता (टेली-मानस): बिना किसी भेदभाव के मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ देने के लिए, टेली-मानस 24/7 हेल्पलाइन पेशेवर टेली-काउंसलिंग सेवाएँ देती है। यह पहल एक महत्वपूर्ण संसाधन रही है, अक्टूबर 2022 में शुरू होने के बाद से अब तक 39.52 लाख (जून 2026) से ज़्यादा कॉल प्राप्त किए गए हैं।
- नशीले पदार्थों के सेवन से बचाव: अगस्त 2020 में शुरू किए गए ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ ने बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए हैं और जून 2026 तक 10 करोड़ से ज़्यादा युवाओं तक पहुँच बनाई है। जुलाई 2025 में, नशा-मुक्त युवा कार्रवाई के लिए पाँच साल के रोडमैप के तौर पर ‘काशी घोषणापत्र’ अपनाया गया, जिसमें स्थानीय सरकारें, आध्यात्मिक संस्थाएँ और युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलन शामिल हैं।
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज: आयुष्मान भारत के ज़रिए, सरकार ने पूरे देश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा संस्थानों का एक मज़बूत नेटवर्क बनाया है। 27 फरवरी 2026 तक, 1.84 लाख से ज़्यादा आयुष्मान आरोग्य मंदिर (पहले हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर) काम कर रहे हैं। इन्होंने युवाओं सहित सभी नागरिकों की व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को काफी बढ़ाया है।
- सितंबर 2021 में शुरू किया गया आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम), स्वास्थ्य सेवाओं को ज़्यादा डिजिटल, सुलभ और किफायती बनाकर भारत के युवाओं की मदद करता है। सरकार एक देशव्यापी डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र बना रही है, जहाँ युवा अपने हेल्थ रिकॉर्ड मैनेज कर सकते हैं, टेलीमेडिसिन का लाभ उठा सकते हैं और डिजिटल इनोवेशन के नए अवसरों का फायदा उठा सकते हैं। शुरुआती चरण में 1,000 से कम लिंक्ड रिकॉर्ड से लेकर आज 100 करोड़ से ज़्यादा रिकॉर्ड तक, एबीडीएम दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र में से एक बन गया है।
पर्यावरण, नेतृत्व और नागरिक भागीदारी
भारत की युवा नीति सिर्फ़ आर्थिक मौकों तक ही सीमित नहीं है। यह उन नागरिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय ज़िम्मेदारियों तक भी फैली हुई है, जो एक सक्रिय नागरिक की पहचान होती हैं। सरकार ने ऐसे मज़बूत संस्थागत तंत्र बनाए हैं, जिनसे यह सुनिश्चित किया जा सके कि युवा समाज में सक्रिय रूप से भाग लें।
एनएसएस और एनवाईकेएस: समुदायिक जुड़ाव के मुख्य आधार
2023 से, नेशनल सर्विस स्कीम (एनएसएस) और नेहरू युवा केंद्र संगठन (एनवाईकेएस) ‘माई भारत’ फ़्रेमवर्क का हिस्सा हैं। इसने सामुदायिक सेवा और राष्ट्र-निर्माण के कामों में युवाओं की भागीदारी को मज़बूत किया है। स्वास्थ्य, साक्षरता, पर्यावरण संरक्षण, लिंग संवेदनशीलता, आपदा प्रबंधन और सामाजिक जागरूकता जैसे अभियानों के ज़रिए ये मंच देश भर के युवाओं को जोड़ते रहते हैं।
हाल के वर्षों में एनवाईकेएस और एनएसएस में युवाओं की भागीदारी में काफ़ी बढ़ोतरी देखी गई है।
अंतर्राष्ट्रीय जुड़ाव: विश्व मंच पर भारत के युवा
युवा मामलों के विभाग ने कई देशों और बहुपक्षीय संगठनों जैसे ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के साथ 30 सक्रिय एमओयू किए हैं। 14 देशों के साथ नियमित रूप से आपसी आधार पर युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनसे अलग-अलग संस्कृतियों के बीच समझ बढ़ती है और भारत का युवा नेटवर्क वैश्विक बनता है।
अंतर्राष्ट्रीय युवा जुड़ाव में हाल की कुछ अहम उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं:
- पहला बिम्सटेक युवा शिखर सम्मेलन (फरवरी 2025, अहमदाबाद) — 7 सदस्य देशों के 70 प्रतिनिधि, थीम: “बिम्सटेक के भीतर आदान-प्रदान के लिए युवाओं को एक पुल के रूप में देखना”।
- पोलिश युवा प्रतिनिधिमंडल (फरवरी 2025) — 21 सदस्यों वाला प्रतिनिधिमंडल ‘जामसाहब मेमोरियल यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम’ के तहत आया था, जो युद्ध के समय भारत की मानवीय विरासत की याद दिलाता है।
- मिस्र का युवा प्रतिनिधिमंडल (नवंबर–दिसंबर 2025) — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में युवा नेतृत्व पर केंद्रित।
- चौथा मध्य एशियाई युवा प्रतिनिधिमंडल (मार्च–अप्रैल 2026) — 100 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल जो सांस्कृतिक, शैक्षणिक और तकनीकी संबंधों पर काम कर रहा है।
- विकसित भारत रन 2025 — 91 देशों में 150 से ज़्यादा जगहों पर आयोजित (सितंबर 2025)– अपनी तरह की पहली वैश्विक युवा पहल, जो भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ की पहुँच को दर्शाती है।
2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान वाई20 के तहत, स्कूलों और कॉलेजों ने 64,000 से ज़्यादा कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें 26 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। वाराणसी में हुए वाई20 शिखर सम्मेलन में 120 से ज़्यादा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि शामिल हुए और अंत में वाई20 घोषणा-पत्र जारी किया गया, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (दुनिया एक परिवार है) में भारत के विश्वास को दर्शाता है।
बदलाव का एक दशक, संभावनाओं का भविष्य
पिछले 12 सालों में, भारत ने दुनिया के सबसे व्यापक और एकीकृत युवा विकास तंत्र में से एक को तैयार किया है। इसका तरीका साफ और एक जैसा रहा है। यह बिखरे हुए प्रयासों से हटकर एक व्यवस्थित, कई क्षेत्रों को जोड़ने वाले ढांचे की ओर बढ़ा है, जो शिक्षा, कौशल, रोज़गार, स्वास्थ्य, खेल और नागरिक भागीदारी जैसे क्षेत्रों में युवाओं को सशक्त बनाता है।
इसका असर हर पैमाने पर दिखता है। ज़्यादा युवा भारतीय स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं। लाखों लोगों को उद्योग जगत की ज़रूरतों के अनुसार कौशल का प्रशिक्षण दिया गया है। औपचारिक रोज़गार बढ़ा है, और शहरों से लेकर गांवों तक उद्यमिता का विस्तार हुआ है। युवा भारतीय अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में देश के लिए खेल में सम्मान और पदक जीत रहे हैं। चिकित्सा सुविधाएं युवाओं को बेहतर स्वास्थ्य के साथ जीने में मदद कर रही हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी के ज़रिए नेतृत्व कौशल का विकास युवाओं के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित कर रहा है। भारत के युवा न केवल अर्थव्यवस्था में हिस्सा ले रहे हैं, बल्कि अब उसे सक्रिय रूप से आकार भी दे रहे हैं।
2014 से 2026 तक का सफ़र एक स्पष्ट बदलाव को दिखाता है—पहुंच से सशक्तिकरण की ओर, और भागीदारी से नेतृत्व की ओर। सरकार ने ऐसे अवसर पैदा किए हैं, बाधाएं दूर की हैं और ऐसी व्यवस्था बनाई है, जिनसे युवाओं को अपनी पूरी क्षमता को पहचानने और उसे हासिल करने का मौका मिला है।
जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प की ओर बढ़ रहा है, इसकी मज़बूत नींव रखी जा चुकी है। ‘अमृत पीढ़ी’ के पास देश को आगे ले जाने के लिए ज़रूरी शिक्षा, कौशल, आत्मविश्वास और अवसर मौजूद हैं।
