वित्तीय कुप्रबंधन और वोटों की हवस ने कर्ज में डुबो दिया उत्तराखंड को

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-जयसिंह रावत

वित्तीय कुप्रबंधन और वोटों के लिए राज्य के सीमित संसाधनों को लुटवाने के कारण  उत्तराखंड की माली हालात लगातार बिगड़ती जा रही है। राज्य पर अब तक 73,751 करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है। खास बात यह है कि राज्य सरकार को कर्ज और उसका ब्याज चुकाने के लिए भी बाजार से उधार लेना पड़ रहा है।जबकि पडोसी राज्य हिमाचल को अस्तित्व में आये 50 साल हो गए फिर भी उस पर ( 2020 -21 ) तक मात्र 53,700 करोड़ का ही कर्ज था।

 

Jay Singh Rawat speaks on financial mismanagement and lust for votes

हमारे राज्य का राजकोषीय घाटा  8503 -70 ( 2022 -23 के बजट के अनुसार ) तक पहुंच गया है। कर्ज लेकर वेतन दे रहे हैं और सस्ती लोकप्रियता के लिए दरियादिली ऐसे दिखाते हैं जैसे अरब देशों के अमीर हों। इस साल राज्य को 6017. 85 करोड़ केवल कर्ज का ब्याज ही चुकाना पड़ेगा। कर्ज में डूबते इस राज्य के राजनीतिक नेतृत्व का चरित्र भी देखिये ! हमारे विधायक अपने वेतन भत्ते निरंतर बढ़ाते जा रहे हैं. खुद ही मांगते हैं और खुद ही खुद को मुंहमांगी दे देते हैं.

2018 तक हिमाचल पर कुल  46,502 करोड़ रुपये का कर्ज था , जो 2020-21 तक 53,700 करोड़ हो गया।

उत्तराखंड विधान सभा में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग ) की नवीनतम रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य सरकार पर कर्ज घटने के बजाय हर साल बढ़ता जा रहा है। इसके उलट आय में खास वृद्धि नहीं हो रही है। इसी के चलते सरकार को रिक्त पदों पर स्थायी कर्मियों की बजाय आउटसोर्स कर्मचारी रखने पड़ रहे हैं। वर्ष 2016-17 में राज्य पर 44,583 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो 20-21 तक 73,751 करोड़ रुपये तक पहुंच गया यानी इस अवधि में सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से 29,168 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। सरकार को अपने कर्ज व उसके ब्याज को चुकाने के लिए भी उधार लेना पड़ रहा है। हालत यह है कि लिए कर्ज की 70.90 रकम कर्ज-ब्याज चुकाने में खर्च हो रही है और करीब 29 बजट वेतन, भत्ते, पेंशन व अन्य कार्यों के खर्च में इस्तेमाल किया जा रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया कि ऋण जितना ज्यादा होगा, राजकोषीय नीति अस्थिर होने की उतनी अधिक संभावना रहेगी। उच्च ऋण को ज्यादा एक्सेस(आधिक्य) चाहिए। उच्च स्तर के ऋण से चुनौतियां रहती हैं। यह अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाता है। लोक ऋण की स्थिरता से सरकार को टैक्स बढ़ाने या व्यय घटाने पर फैसले को बाध्य होना पड़ता है। इसका असर सीधे जनता पर पड़ता है।

 

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