नारियल के बेकार छिलकों से हजारों करोड़ का कारोबार, लाखों लोगों को रोजगार
Key achievements during last 12 years (since 2014-15):
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More than 21,000 coir units are registered on the Udyam registration portal employing 2.3 lakh persons making them a part of the formal MSME policy ecosystem.
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Export of coir and coir products has more than quadrupled, from ₹1,630.33 crore in FY 2014-15 to ₹6,614.40 crore in FY 2025-26, registering an increase of 305.70%.
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Over 68,000 persons have been trained under various training programmes with more than 80% being women.
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More than 150 innovative machines, technologies and value-added coir products in the coir sector.
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Facilitated participation of more than 1,000 exporters in International Exhibitions abroad and financial assistance of more than ₹20 crores given to more than 850 entrepreneurs under Export Market Promotion.
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1,400+ promotional programmes organised and 950+ exhibitions participated across India.
— उषा रावत –
नारियल का रेशा अब केवल रस्सियों, चटाइयों और गद्दों तक सीमित नहीं रहा। कभी बेकार समझकर फेंक दिए जाने वाले नारियल के छिलके आज हजारों करोड़ रुपये के उद्योग, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण आधार बन गए हैं। पिछले ग्यारह वर्षों में भारत से नारियल रेशे के उत्पादों का निर्यात चार गुने से अधिक बढ़ा है। इस पारंपरिक उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कृषि अवशेष को उपयोगी वस्तुओं में बदलकर आर्थिक मूल्य पैदा किया जा रहा है।
भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में नारियल के पेड़ सदियों से लोगों की आजीविका और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। नारियल का पानी और गिरी खाद्य पदार्थों के रूप में उपयोग किए जाते हैं, जबकि उसके बाहरी रेशेदार छिलके से रस्सियां, चटाइयां और घरेलू उपयोग की अनेक वस्तुएं बनाई जाती रही हैं। लेकिन अब यही पारंपरिक कुटीर उद्योग आधुनिक तकनीक, नए उत्पादों और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग के कारण एक बड़े व्यावसायिक क्षेत्र का रूप ले रहा है। नारियल का रेशा, जिसे अंग्रेजी में कॉयर कहा जाता है, भारत के उन प्राकृतिक संसाधनों में शामिल है जिनके माध्यम से रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्यों को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।
केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की ओर से 14 अक्टूबर 2026 को जारी जानकारी के अनुसार भारत दुनिया में नारियल रेशे और उससे निर्मित उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक तथा निर्यातक है। वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई बताई गई है। देश में इस उद्योग का अनुमानित कारोबार करीब 16 हजार करोड़ रुपये है। वित्त वर्ष 2025-26 में नारियल रेशे और उससे बने उत्पादों का निर्यात 6,614.40 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अमेरिका, चीन, नीदरलैंड, स्पेन और ब्रिटेन भारतीय उत्पादों के प्रमुख विदेशी बाजारों में शामिल हैं।

नारियल के बाहरी छिलके में मजबूत प्राकृतिक रेशे होते हैं। इन्हें अलग करके साफ किया जाता है और फिर आवश्यकता के अनुसार सूत, रस्सियों, चटाइयों, गद्दों, ब्रश तथा अन्य वस्तुओं में बदला जाता है। इस प्रक्रिया में निकलने वाला महीन रेशेदार चूर्ण भी उपयोगी होता है। इसे कॉयर पिथ कहा जाता है। उचित प्रसंस्करण के बाद इसका उपयोग पौधों के लिए उगाने के माध्यम, मिट्टी की नमी बनाए रखने वाले पदार्थ और जैविक खाद तैयार करने में किया जा सकता है। इस प्रकार नारियल का लगभग पूरा बाहरी छिलका आर्थिक उपयोग में लाया जा सकता है।
इस उद्योग की बढ़ती उपयोगिता का एक कारण पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता भी है। प्राकृतिक नारियल रेशा जैविक रूप से विघटित होने वाला पदार्थ है। इससे बने कुछ उत्पाद प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम पदार्थों के विकल्प बन सकते हैं। कृषि एवं बागवानी में नारियल रेशे के उपयोग से पौधों की जड़ों के आसपास नमी बनाए रखने में सहायता मिलती है। ढलानों पर मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करने के लिए भी नारियल रेशे की जालियों का उपयोग किया जाता है। विशेष रूप से सड़क निर्माण, ढलान संरक्षण और पौधरोपण के कार्यों में इनकी उपयोगिता बढ़ रही है। हालांकि ऐसे उत्पादों की वास्तविक पर्यावरणीय उपयोगिता उनके प्रसंस्करण, परिवहन और इस्तेमाल की परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है।

इस उद्योग की आर्थिक प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण संकेत निर्यात में हुई वृद्धि है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने 1,630.33 करोड़ रुपये मूल्य के नारियल रेशे और संबंधित उत्पादों का निर्यात किया था। वित्त वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 6,614.40 करोड़ रुपये हो गया। अर्थात इस अवधि में निर्यात मूल्य में लगभग 305.70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह उपलब्धि दर्शाती है कि परंपरागत भारतीय उत्पादों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं, बशर्ते उत्पादन की गुणवत्ता, आधुनिक तकनीक और विपणन पर ध्यान दिया जाए।
भारत से नारियल रेशा उत्पादों का निर्यात

नारियल रेशा उद्योग की एक अन्य विशेषता ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला रोजगार में उसकी भूमिका है। सरकारी विवरण के अनुसार इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सात लाख से अधिक श्रमिक जुड़े हैं, जिनमें लगभग 80 प्रतिशत महिलाएं बताई गई हैं। दूसरी ओर, उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर 21 हजार से अधिक नारियल रेशा इकाइयां पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 2.3 लाख लोगों के कार्यरत होने की जानकारी दी गई है। ये दोनों आंकड़े अलग-अलग दायरों से संबंधित हैं। पहला व्यापक उद्योग में रोजगार का अनुमान है, जबकि दूसरा औपचारिक रूप से पंजीकृत इकाइयों से संबंधित है।
महिलाओं की इतनी बड़ी भागीदारी इस उद्योग को सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। नारियल रेशे से सूत तैयार करना, रस्सियां बनाना, चटाइयां बुनना और हस्तशिल्प वस्तुओं का निर्माण ऐसे कार्य हैं जिन्हें छोटे उद्यमों तथा सामुदायिक उत्पादन केंद्रों के माध्यम से संचालित किया जा सकता है। इन गतिविधियों से महिलाओं को स्थानीय स्तर पर आय अर्जित करने के अवसर मिलते हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां नियमित रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां ऐसे उद्योग पारिवारिक आय बढ़ाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
सरकार की कॉयर विकास योजना के अंतर्गत तकनीकी सुधार, कौशल प्रशिक्षण, नए उत्पादों का विकास, विपणन सहायता और निर्यात प्रोत्साहन के प्रयास किए जा रहे हैं। वर्ष 2014-15 से अब तक विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में 68 हजार से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है, जिनमें 80 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। इसी अवधि में 150 से अधिक नई मशीनों, प्रौद्योगिकियों और मूल्यवर्धित उत्पादों के विकास की जानकारी दी गई है। अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में एक हजार से अधिक निर्यातकों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया, जबकि 850 से अधिक उद्यमियों को निर्यात बाजार प्रोत्साहन के अंतर्गत 20 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता प्रदान की गई।
इस उद्योग की सफलता केवल सरकारी आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों की उपलब्धियों में भी दिखाई देती है। महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग की रंजना रामचंद्र कदम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता प्राप्त कर नारियल रेशा उत्पाद बनाने की इकाई स्थापित की। कॉयर बोर्ड के तकनीकी मार्गदर्शन से उन्होंने आवश्यक मशीनें और उपकरण जुटाए। उनकी इकाई में अब रस्सियां, तकिए और पायदान बनाए जाते हैं। इस छोटे उद्यम ने छह लोगों को नियमित रोजगार भी उपलब्ध कराया है।
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी क्षेत्र की अल्लम गौथमी की कहानी महिला उद्यमिता का एक और उदाहरण है। उन्होंने पांच वर्ष पहले कॉयर बोर्ड के प्रशिक्षण केंद्र से प्रशिक्षण प्राप्त किया और बाद में अपना उद्यम स्थापित किया। सरकारी विवरण के अनुसार उनकी इकाई का वार्षिक कारोबार लगभग 35 लाख रुपये तक पहुंच गया है और वह करीब 10 लाख रुपये का वार्षिक लाभ अर्जित कर रही है। इस उद्यम से छह महिलाओं को रोजगार मिला है। गौथमी ने स्वयं भी लगभग 120 महिलाओं को चटाई बुनाई, रस्सी निर्माण और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिलाने में योगदान दिया है।
केरल के कोझिकोड में सुरेंद्रन पी. ने नारियल रेशे के चूर्ण से जैविक खाद तैयार करने का व्यवसाय शुरू किया। कॉयर बोर्ड और केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान से मिले प्रशिक्षण का लाभ उठाकर उन्होंने एक वर्ष के भीतर 500 से अधिक ग्राहक बनाए। उनकी इकाई ने 20 टन से अधिक जैविक खाद की बिक्री की और पांच लोगों को रोजगार दिया। इसी प्रकार केरल के अलाप्पुझा निवासी जी. साबू ने वर्ष 2024 में नारियल रेशा कताई इकाई स्थापित की। उनकी इकाई स्थानीय समितियों और निर्माताओं को सूत तथा रस्सियां उपलब्ध कराती है और आसपास के गांवों के आठ से दस श्रमिकों को रोजगार देती है।
ये उदाहरण बताते हैं कि उचित प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, वित्तीय संसाधन और बाजार उपलब्ध होने पर परंपरागत उद्योग भी सफल उद्यमिता का आधार बन सकते हैं। हालांकि छोटे उद्यमियों के सामने कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादन लागत, गुणवत्ता नियंत्रण, बाजार तक पहुंच और आधुनिक मशीनों में निवेश जैसी चुनौतियां बनी रहती हैं। निर्यात में वृद्धि के साथ घरेलू उत्पादकों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना भी आवश्यक है।
नारियल रेशा उद्योग की संभावनाएं केवल नारियल उत्पादक राज्यों तक सीमित नहीं हैं। इसके तैयार उत्पाद देश के दूसरे क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए हिमालयी राज्यों में सड़क निर्माण से प्रभावित ढलानों, मिट्टी के कटाव वाले क्षेत्रों और पौधरोपण स्थलों पर नारियल रेशे की जैविक जालियों के उपयोग की संभावनाएं हैं। बागवानी और पौधशालाओं में भी नारियल रेशे से तैयार माध्यम उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि पहाड़ी परिस्थितियों में इनके व्यापक उपयोग से पहले स्थानीय भूगर्भीय, जलवायवीय और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार परीक्षण आवश्यक होगा।
भारत के नारियल रेशा उद्योग की कहानी वास्तव में कृषि अवशेष को आर्थिक संपदा में बदलने की कहानी है। इसमें परंपरागत कौशल, ग्रामीण श्रम, महिला उद्यमिता, आधुनिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय व्यापार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस नारियल के छिलके को कभी सीमित उपयोग वाला पदार्थ समझा जाता था, उसी से आज हजारों करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है।
यह अनुभव देश के दूसरे कृषि आधारित उद्योगों के लिए भी उपयोगी है। धान की पराली, केले के तने, बांस, गन्ने की खोई और अन्य कृषि अवशेषों से उपयोगी उत्पाद बनाने की संभावनाएं मौजूद हैं। आवश्यकता ऐसे अनुसंधान और उद्यमों को बढ़ावा देने की है, जो स्थानीय संसाधनों से रोजगार पैदा करें और पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम करें। नारियल रेशा उद्योग इसी दिशा में एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।



