मोदी जी ! गढ़वाली-कुमाऊंनी को संवैधानिक दर्जा दो, वरना नाटक मत करो

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  • गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषणों से अधिक आठवीं अनुसूची में अच्छी लगेंगी
  • 50 लाख से अधिक लोग बोलते हैं गढ़वाली और कुमाऊंनी
  • पंवार और चंद राजवंशों की राजभाषाएं रहीं गढ़वाली-कुमाऊंनी
  • कुल 38 भाषाएं आना चाहती है आठवीं अनुसूची में

      –जयसिंह रावत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देहरादून की जनसभा में अपने भाषण की शुरुआत गढ़वाली भाषा से करना इस उत्तराखण्ड की मातृ भाषाओं, गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किये जाने के प्रति आशा जगा गया। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी मोदी जी अपने भाषणों की शुरुआत गढ़वाली से कर चुके हैं। इस बार तो उन्होंने बिना पढ़े ही अपने भाषण की शुरुआत गढ़वाली के 4 वाक्यों से कर दी। अगर इसके बाद भी उत्तराखण्डवासियों की इस भावनात्मक मांग नहीं मानी गयी तो मोदी जी का गढ़वाली प्रेम नाटक ही माना जायेगा। यही नहीं डबल इंजन का वायदा भी महज एक जुमला ही साबित होगा।

मोदी जी के भाषण की शुरुआत

उत्तराखंड कासभी दाणा सयाणौदीदीभूलियौंचच्चीबोडियों और भैबैणो। आप सबु थैं, म्यारू प्रणाम ! मिथै भरोसा छ, कि आप लोग कुशल मंगल होला ! मी आप लोगों थे सेवा लगौण छू, आप स्वीकार करा !

संसद में कई बार उठ चुकी गढ़वाली-कुमाऊंनी की मांग

उत्तराखण्ड सहित देश के विभन्न भागों में 50 लाख से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली उत्तराखण्ड की गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को संविधान की आठवीं सूची में शामिल किये जाने की मांग कोई नयी नहीं है। चूंकि यह मांग भारत सरकार द्वारा पूरी की जानी है और इसे विधिवत संसद द्वारा संविधान संशोधन के जरिये पूरी होना है, इसलिये उत्तराखण्ड के सांसद समय-समय पर यह मांग संसद में उठाते रहे हैं। इस मांग को लेकर भाजपा और कांग्रेस समेत उत्तराखण्ड में प्रभाव रखने वाले दल एकमत रहे हैं। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। भाजपा के ही नैनीताल के सांसद ( केन्द्रीय रक्षा राज्यमंत्री) अजय भट्ट ने 22 नवम्बर 2019 को गढ़वाली-कुमाऊंनी-जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिये संविधान संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया था। उनसे पहले हरिद्वार के सांसद रमेश पोखरियाल निशंक केन्द्र में शिक्षा मंत्री बनने से पहले इस मांग को लोकसभा में जोरदार ढंग से उठा चुके हैं। उनसे भी पहले पौड़ी गढ़वाल का प्रतिनिधित्व कर रहे सतपाल महाराज ने जुलाई 2011 में लोकसभा में इस मांग पर जोर देने के लिये एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था। यही नहीं उन्होंने इस मांग को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री डा0 मनमोहनसिंह को एक ज्ञापन भी सौंपा था।

पंवार और चंद राजवंशों की राजभाषाएं

अमेरिका की वैश्विक संस्था एसआइएल इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित ’’इथनोलॉग’’ की वार्षिक रिपोर्ट-2005 में गढ़वाली बोलने वालों की संख्या 29,20,000 बतायी गयी है। लेकिन भारत की सन् 2011 की जनगणना में गढ़वाली बोलने वालों की संख्या 24,82,089 दर्ज हुयी है। जो कि 2001 में 22,67,314 दर्ज हुयी थी। गढ़वाली पंवार वंश की राजभाषा रही है। जिसका प्रमाण आज भी महाराजा जगतपाल के शासनकाल के देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर के दानपात्र पर अंकित गढ़वाली में राजाज्ञा है। बदरीनाथ सहित विभिन्न स्थानों पर पाये गये ताम्रपत्र भी गढ़वाली में ही लिखे गये मिलते हैं। यद्यपि गढ़वाली को यूनेस्को ने लुप्ति की कगार पर तो नहीं मगर संवेदनशील स्थिति में अवश्य बताया है। जाहिर है कि इसको भी संरक्षण की आवश्यकता है। मणिपुरी, कांकणी और संस्कृत जैसी भाषाएं गढ़वाली और कुमाऊंनी से कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं।

यूनेस्को की सूची के अनुसार सुरक्षित नहीं गढ़वाली-कुमाऊंनी

सन् 1961 के सर्वे में कुमाऊंनी भाषा बोलने वालों की संख्या 10,30,254 दर्ज हुयी थी जो कि 20211 तक 20,81,057 हो गयी। यूनेस्को के विश्व भाषा मानचित्र में अभी तक कुमाऊंनी को विलुप्ति के गंभीर खतरे में नहीं रखा गया है, फिर भी इसे असुरक्षित अवश्य ही बताया गया है जिसे प्रोत्साहित और समृद्ध किये जाने की जरूरत है। पुराने ताम्रपत्र जैसे दस्तावेजों से प्रमाणित होता है कि कुमाऊंनी भाषा कत्यूरी और चन्द राजवंशों की राजभाषा रही है। इस भाषा में बेहतरीन साहित्य का सृजन प्राचीनकाल से होता रहा है।

आठवीं अनुसूची में दर्ज 22 भाषाएं

वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में जो  22 भाषाएं शामिल हैं, उनमें (1) असमिया, (2) बंगाली, (3) गुजराती, (4) हिंदी, (5) कन्नड़, (6) कश्मीरी, (7) कोंकणी, (8) मलयालम, (9) मणिपुरी, (10) मराठी, (11) नेपाली, (12) उड़िया, (13) पंजाबी, (14) संस्कृत, (15) सिंधी, (16) तमिल, (17) तेलुगु, (18) उर्दू (19) बोडो, (20) संथाली, (21) मैथिली और (22) डोगरी शामिल हैं।

आठवीं अनुसूची में शामिल करने की प्रकृया

शुरू में संविधान की आठवीं अनुसूची में केवल 14 भाषाएं शामिल थीं। इसमें सिन्धी भाषा को 1967 में जोड़ा गया। उसके बाद 1992 में कांकणी, मणिपुरी और नेपाली को तथा 2004 में बोड़ो, डोगरी, मैथिली और संथाली को इस अनुसूची में जोड़ा गया। नयी भाषाओं को इस अनुसूची में जोड़ने की प्रकृया संविधान के अनुच्छेद 344(1) में दी गयी है जिसमें इसके लिये राष्ट्रपति द्वारा एक आयोग के गठन का प्राधान है। आयोग में पहले से दर्ज भाषाओं के प्रतिनिधि भी लेने की व्यवस्था है। इस आयोग की सिफारिशों पर संसद की 30 सदस्यीय समिति द्वारा विचार किये जाने के उपरान्त कार्यवाही के लिये राष्ट्रपति को सिफारिश करने का प्रावधान धारा 344 ( उपधारा 4, 5 और 6) में दिया गया है। लेकिन भाषाओं की मांग पर भाषाओं के दो बोल भाषण में देने के सिवा कुछ नहीं मिल पाता है।

महापात्रा आयोग की रिपोर्ट चाट रही है धूल

आठवीं अनुसूची में नयी भाषाओं को शामिल करने के लिये सितम्बर 2003 में सीताकान्त मोहापात्रा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट 2004 भारत सरकार को सौंप दी थी। इस रिपोर्ट पर भी आज तक कार्यवाही नहीं हुयी। चूंकि प्रधानमंत्री मोदी जिस भी क्षेत्र में जाते हैं वहां की स्थानीय भाषा में अपने संबोधन की शुरुआत करते हैं, इसलिये उम्मीद की जानी चाहिये कि उनके कार्यकाल में विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिये जाने की मांग पर विचार होगा। अगर नहीं होता है तो लोगों को क्षेत्रीय भाषाओं में लुभाना ढकोसला ही माना जायेगा।

आठवीं अनुसूची में आना चाहती 38 भाषाएं

वर्तमान में गढ़वाली और कुमाऊंनी के साथ ही कम से कम 38 भारतीय भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ने की मांग की जा रही है। इन भाषाओं में (1) अंगिका, (2) बंजारा, (3) बजिका, (4) भोजपुरी, (5) भोटी, (6) भोटिया, (7) बुंदेलखंडी (8) छत्तीसगढ़ी, (9) धातकी, (10) अंग्रेजी, (11) गढ़वाली (पहाड़ी), (12) गोंडी, (13) गुज्जर/गुज्जरी (14) हो, (15) कच्छी, (16) कामतापुरी, (17) कार्बी, (18) खासी, (19) कोडवा (कूर्ग), (20) कोक बराक, (21) कुमाऊँनी (पहाड़ी), (22) कुरक, (23) कुर्माली, (24) लेप्चा, (25) लिम्बु, (26) मिजो (लुशाई), (27) मगही, (28) मुंडारी, (29) नागपुरी, (30) निकोबारी, (31) पहाड़ी (हिमाचली), (32) पाली, (33) राजस्थानी, (34) संबलपुरी/कोसली, (35) शौरसेनी (प्राकृत), (36) सिरैकी, (37) तेनीदी और (38) तुलु शामिल हैं।

नयी शिक्षा नीति और क्षेत्रीय भाषाएं

केन्द्र सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति में पाँचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। नयी नीति उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षण देने और उनको समृद्ध बनाने का है। इसलिये आशा की जानी चाहिये कि गढ़वाली और कुमाऊंनी जैसी सदियों से बोली जाने वाली समृद्ध भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलेगा। देश की राजधानी दिल्ली में गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं के लाखों उपयोगकर्ताओं की भावनाओं के अनुरूप वहां भी इन भाषाओं की अकादमी का गठन किया गया है।

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