दूसरे ग्रह से आई रेडियो तरंगें, अंतरिक्ष विज्ञान में हो सकती है पहली ऐसी खोज

Beta Pictoris b appears to have an aurora caused by a powerful magnetic field. If confirmed, it would be the first such field known outside our solar system.
पृथ्वी से 63 प्रकाश वर्ष से अधिक दूर स्थित एक ग्रह से मिली रेडियो तरंगों ने खगोल वैज्ञानिकों को उत्साहित कर दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये तरंगें ‘बीटा पिक्टोरिस बी’ नामक ग्रह के ध्रुवों पर बनने वाली शक्तिशाली ज्योति से निकल रही हो सकती हैं। यदि इसकी पुष्टि हो जाती है तो यह हमारे सौरमंडल के बाहर किसी ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र का पहला प्रत्यक्ष प्रमाण होगा। इस खोज से दूरस्थ ग्रहों की आंतरिक संरचना समझने के साथ-साथ ब्रह्मांड में जीवन के अनुकूल ग्रहों की तलाश का एक नया रास्ता भी खुल सकता है।
यह शोध 15 सितंबर को ऑनलाइन प्रकाशित किया गया था और अभी इसकी वैज्ञानिक सहकर्मी समीक्षा होनी बाकी है। इसलिए वैज्ञानिक इसे बेहद महत्वपूर्ण खोज मानने के बावजूद अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं।
बीटा पिक्टोरिस बी हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित एक विशाल गैसीय ग्रह है। इसे पहली बार 2008 में प्रत्यक्ष चित्रण के माध्यम से खोजा गया था। यह बृहस्पति से लगभग दोगुना बड़ा और उससे करीब 12 गुना अधिक भारी है। इसकी आयु करीब ढाई करोड़ वर्ष मानी जाती है, इसलिए खगोलीय पैमाने पर यह अभी बहुत युवा ग्रह है।
दक्षिण अफ्रीका की शक्तिशाली मीरकैट रेडियो दूरबीन की मदद से वैज्ञानिकों ने 2025 और 2026 के शुरुआती महीनों में इस ग्रह की दिशा से आने वाले असामान्य रेडियो संकेतों को दर्ज किया। इस वर्ष मई में किए गए आगे के अवलोकनों से शोधकर्ताओं को संकेतों का स्रोत अधिक सटीकता से निर्धारित करने में सफलता मिली। वैज्ञानिक तारे और ग्रह की अलग-अलग स्थिति पहचान सके और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रेडियो उत्सर्जन ग्रह की ओर से आ रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है चुंबकीय क्षेत्र
पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा में उसके चुंबकीय क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। सूर्य से लगातार आने वाले आवेशित कण और विकिरण पृथ्वी के वायुमंडल को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षा कवच का काम करता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों का पता लगाने में विशेष रुचि रखते हैं।
किसी बहुत दूर स्थित ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र सीधे देखना आसान नहीं है। इसका एक तरीका उससे निकलने वाली रेडियो तरंगों को खोजना है। चुंबकीय क्षेत्र आवेशित कणों और इलेक्ट्रॉनों को ग्रह के ध्रुवों की ओर मोड़ सकता है। इससे पृथ्वी सहित सौरमंडल के कई ग्रहों पर दिखाई देने वाली ध्रुवीय ज्योति जैसी घटनाएं पैदा होती हैं और इस प्रक्रिया में रेडियो तरंगें भी निकल सकती हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि बीटा पिक्टोरिस बी पर भी ऐसी ही प्रक्रिया चल रही है।
पृथ्वी से हजारों गुना शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र
सबसे चौंकाने वाली बात इस ग्रह के संभावित चुंबकीय क्षेत्र की ताकत है। रेडियो तरंगों की आवृत्ति के आधार पर वैज्ञानिक चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति का अनुमान लगा सकते हैं।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र लगभग 0.5 गॉस है, जबकि सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति का चुंबकीय क्षेत्र कुछ स्थानों पर लगभग 14 गॉस तक पहुंचता है। इसके मुकाबले बीटा पिक्टोरिस बी का चुंबकीय क्षेत्र कम से कम 1,250 गॉस होने का अनुमान लगाया गया है। यानी यह बृहस्पति के चुंबकीय क्षेत्र से भी कई दर्जन गुना और पृथ्वी के मुकाबले करीब ढाई हजार गुना शक्तिशाली हो सकता है।
इतना शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र आखिर कैसे पैदा हो रहा है, यह अभी वैज्ञानिकों के लिए बड़ा सवाल है। एक संभावना ग्रह की कम आयु से जुड़ी है। युवा ग्रह अधिक गर्म होते हैं और उनके भीतर मौजूद अतिरिक्त ऊर्जा शक्तिशाली चुंबकीय ‘डायनेमो’ को चला सकती है। ग्रह के अंदर घूमती और प्रवाहित होती विद्युत चालक सामग्री चुंबकीय क्षेत्र पैदा करती है।
क्या किसी चंद्रमा की भी भूमिका है?
एक अन्य संभावना और भी दिलचस्प है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बीटा पिक्टोरिस बी के आसपास घूम रहा कोई चंद्रमा भी इसकी ध्रुवीय गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
हमारे सौरमंडल में इसका उदाहरण बृहस्पति और उसके चंद्रमा आयो के रूप में मिलता है। आयो पर अत्यधिक ज्वालामुखीय गतिविधियां होती हैं। उससे निकलने वाले आवेशित कण बृहस्पति के चुंबकीय वातावरण में पहुंचकर उसकी ध्रुवीय ज्योति को प्रभावित करते हैं। बीटा पिक्टोरिस बी के मामले में भी ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा, हालांकि अभी तक उसके आसपास किसी चंद्रमा का निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है।
जीवन की खोज के लिए क्यों अहम है खोज
इस खोज का महत्व केवल एक विशाल ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी ग्रह पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनने और लंबे समय तक बने रहने में चुंबकीय क्षेत्र की कितनी भूमिका होती है।
मजबूत चुंबकीय क्षेत्र किसी ग्रह के वायुमंडल को उसके तारे से आने वाली शक्तिशाली हवाओं और विकिरण से बचाने में सहायता कर सकता है। इसलिए भविष्य में यदि पृथ्वी जैसे छोटे और चट्टानी ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र खोजे जा सकें तो वैज्ञानिक उनकी जीवन-अनुकूलता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
फिलहाल यह काम बेहद कठिन है। पृथ्वी जैसे ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र विशाल गैसीय ग्रहों की तुलना में बहुत कमजोर होते हैं। इसके अलावा पृथ्वी का अपना वायुमंडल कुछ आवश्यक रेडियो आवृत्तियों को जमीन तक पहुंचने से रोक देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे कमजोर संकेतों को पकड़ने के लिए भविष्य में अंतरिक्ष में अथवा चंद्रमा के उस हिस्से पर रेडियो दूरबीन लगाने की जरूरत पड़ सकती है जो हमेशा पृथ्वी से विपरीत दिशा में रहता है।
फिलहाल बीटा पिक्टोरिस बी जैसे विशाल ग्रह वैज्ञानिकों के लिए सबसे उपयुक्त लक्ष्य हैं। यदि आगे के अवलोकन इस खोज की पुष्टि करते हैं तो पहली बार किसी दूसरे सौरमंडल के ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र को सीधे रेडियो तरंगों के माध्यम से मापने का रास्ता खुल जाएगा।
यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक वैज्ञानिक दूरस्थ ग्रहों को मुख्यतः उनके आकार, द्रव्यमान, तापमान, कक्षा और वायुमंडल के आधार पर समझने की कोशिश करते रहे हैं। रेडियो संकेत उनके भीतर चल रही प्रक्रियाओं को समझने की एक नई खिड़की खोल सकते हैं।
दूसरे शब्दों में, 63 प्रकाश वर्ष दूर से आई ये रेडियो तरंगें किसी परग्रही सभ्यता का संदेश नहीं हैं। उपलब्ध प्रमाण इन्हें एक प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया से जोड़ते हैं। लेकिन उनका वैज्ञानिक संदेश कम रोमांचक नहीं है—वे पहली बार हमें किसी दूसरे सौरमंडल के ग्रह के अदृश्य चुंबकीय कवच को समझने का अवसर दे सकती हैं।
—“क्या 63 प्रकाश वर्ष दूर से आया है किसी दूसरी दुनिया का संदेश?”—लेकिन तुरंत स्पष्ट कर दिया जाएगा कि यह परग्रही सभ्यता का संकेत नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक रेडियो उत्सर्जन है।
