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मेरी प्रिय पुस्तक : सुमनश्री (अमर शहीद श्रीदेव सुमन ) आत्मकथ्य -कलीराम चमोली

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा 
कतिपय संजोये शब्द मैंने भाव में कहते हुए I
उत्सर्ग और बलिदान की महिमा यहाँ कहते हुए II
पर काव्य के सौंदर्य का मुझको नहीं कुछ ज्ञान है I शब्दार्थ के सामर्थ्य की मुझको नहीं कुछ पहचान है I I
कविकर्म क्या होता अहो मैं जानता कुछ भी नहीं I
सत्काव्य सर्जन शक्ति का लघु अंश भी मुझमें नहीं II
अल्पज्ञ हूँ फिर भी अहो मैं कर रहा यह धृष्टता I बहुविज्ञ वाचक वृन्द हे करदें क्षमा अल्पज्ञता II

श्रीदेव जी की कीर्ति गाथा, दीप्त सूर्य सामान है I
मैं व्यक्त जितना कर सका ,वह एक किरण समान है II
गढ़देश के नवरत्न की तो कीर्ति गाथा है बड़ी
मैं कर रहा हूँ चरितार्थ यह बात छोटे मुँह बड़ी II
पूरी सुमन बलिदान गाथा हो नहीं सकती कभी
परिजनों के कष्ट की भी शेष गाथा है अभी II गढ़रत्न की यह अमरगाथा,सिंधु भांति अथाह है
रसपान करके प्रेरणा लें ,लोग मेरी चाह है Ii
बहुसंख्या है इस देश में कटुकष्ट जिन्होंने सहे I संघर्ष में मारे गये ,फांसी चढ़े,कारा में रहे I

बलिदान की यह श्रृंखला इतिहास में अविच्छिन्न है I
पर देव का बलिदान इससे मूलतः बहुभिन्न है II
सुव्यक्त करना इस चरित को गहन सिंधु समान है
औ सामने इस कार्य के निजशक्ति बिंदु
समान है I I
सुमनाग्रजों ,सम्बन्धियों की कष्ट गाथा है बड़ी I इस राजशाही से जिन्होंने है लड़ाई यह लड़ी II इस युद्ध में प्रत्यक्ष जिनका सौख्य त्याग विशेष है I उन साथियों शुभचिंतकों का कष्ट कहना शेष है II

३१ दिसम्बर १९४५को उदयपुर में पंडित जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में संपन्पन लोकपरिषद के विशाल अधिवेशन में श्रीदेव सुमन को दी गई श्रद्धांजलि प्रस्ताव -गत साढे तीन वर्षों कै दौरान में रियासतों में आजादी की लड़ाई में जिन शहीदों ने लड़ते हुए बलिदान किया है उनके प्रति यह कान्फ्रेंस सम्मान प्रकट करती है। उन्ही शहीदों मैं एक वीर आत्मा श्रीदेव सुमन थे, जो टिहरी गढवाल की जेल में जान बूझकर किये गये दुर्व्यवहार के शिकार बनाकर मार डाले गये। उन्होंने हिम्मत और त्याग का जो आदर्श उपस्थित किया वह चिरकाल तक याद रहेगा और रियासत की जनता को अनुप्राणित करता रहेगा।-“गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां -भक्तदर्शन से साभार ”

 

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