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बच्चों के डिजिटल मीडिया इस्तेमाल पर राष्ट्रीय नीति की जरूरत, स्कूलों में स्मार्टफोन पर रोक की सिफारिश

नई दिल्ली, 25 सितंबर। बच्चों के बढ़ते डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों को देखते हुए देश में एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाने और स्कूलों में स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने की जरूरत बताई गई है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों को उम्र के अनुरूप ही ऑनलाइन दुनिया में प्रवेश मिलना चाहिए। साथ ही नियमों का पालन सुनिश्चित करने और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही डिजिटल मंचों की होनी चाहिए, न कि बच्चों या उनके माता-पिता की।
‘प्रिवेंशन बाय डिजाइन: फ्रॉम वॉलंटरी सेल्फ-रेगुलेशन टू अ स्टेट ड्यूटी ऑफ केयर’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में बच्चों को ऑनलाइन नुकसान से बचाने के लिए कंपनियों के स्वैच्छिक नियमन पर निर्भर रहने के बजाय सरकार की कानूनी जिम्मेदारी तय करने की पैरवी की गई है। रिपोर्ट न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित ‘रिस्पॉन्सिबल एआई एंड सेफ डिजिटल स्पेसेस फॉर चिल्ड्रेन’ कार्यक्रम में जारी की गई। कार्यक्रम का आयोजन एथेना इन्फोनॉमिक्स और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने किया।
अध्ययन में 40 से अधिक देशों में बच्चों के डिजिटल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर लागू कानूनों और नीतियों की तुलना की गई है। इसके अलावा 110 देशों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन के इस्तेमाल से जुड़ी नीतियों का अध्ययन किया गया। रिपोर्ट के अनुसार इनमें 52 देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि 31 देशों ने राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए हैं। केवल नौ देशों ने इसका फैसला पूरी तरह स्कूलों पर छोड़ा है।
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि प्राथमिक और निचली माध्यमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को स्कूल के समय स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए देशभर में लागू होने वाला स्पष्ट और एकसमान नियम होना चाहिए, ताकि अलग-अलग संस्थानों में उसकी अलग-अलग व्याख्या की गुंजाइश न रहे।
रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा कि डिजिटल दुनिया के विस्तार के साथ बच्चों को होने वाले नुकसान का दायरा भी बढ़ा है, लेकिन रोकथाम की व्यवस्थाएं उसी गति से विकसित नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन नुकसान से निपटने के लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की जरूरत है, जो देशों की सीमाओं तक सीमित न हो। सोशल मीडिया मंचों को बच्चों के साथ ऐसे समझौते करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जिनसे उनके अधिकार और सुरक्षा प्रभावित हों।
उन्होंने कहा कि डिजिटल मंच इतने बड़े पैमाने पर काम करते हैं कि कार्रवाई के लिए बड़ी संख्या में बच्चों को नुकसान पहुंचने का इंतजार नहीं किया जा सकता। ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें संभावित खतरे की पहले पहचान हो और नुकसान होने से पहले बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर वैश्विक बहस अब उम्र आधारित प्रतिबंधों की ओर बढ़ रही है। अध्ययन में विभिन्न देशों के कानूनों का विश्लेषण करते हुए यह भी देखा गया है कि किस उम्र में बच्चा ऑनलाइन मंच के साथ कानूनी रूप से वैध समझौता कर सकता है और कब माता-पिता की सहमति आवश्यक होती है। अलग-अलग देशों में इसके लिए अलग आयु सीमा निर्धारित है। रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में नाबालिगों की संविदा संबंधी कानूनी क्षमता का भी उल्लेख किया गया है।
15 साल से कम उम्र में सोशल मीडिया खाता नहीं बनाने की सिफारिश
रिपोर्ट में पांच प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं। पहला, 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया खाता बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। 15 से 16 साल की उम्र में इसकी अनुमति तभी हो, जब अभिभावक की पहचान और सहमति की पुष्टि हो। इस व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी डिजिटल मंच की होनी चाहिए।
दूसरा, नाबालिगों की ऑनलाइन गतिविधियों और पसंद से जुड़ी जानकारी जुटाकर उन्हें लक्षित विज्ञापन दिखाने पर रोक लगाई जाए। इसके साथ ही लगातार नई सामग्री दिखाते रहने वाले ‘इनफिनिट स्क्रॉलिंग’ जैसे फीचर और बच्चों को लंबे समय तक मंच से जोड़े रखने के लिए बनाए गए ‘डार्क पैटर्न’ भी बंद किए जाएं।
तीसरा, उम्र की पुष्टि के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी सुरक्षित रहे। चौथा, ऑनलाइन सुरक्षा की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र संस्था गठित की जाए। पांचवां, बच्चों को डिजिटल नीति निर्माण की प्रक्रिया में शामिल करने के साथ उन्हें सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जाए।
रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल परिवारों पर डालने के बजाय सरकार, नियामक संस्थाओं और डिजिटल कंपनियों के स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

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