निठारी काण्ड : उन्नीस साल बाद जेल खुली, मगर लौटने को जिंदगी नहीं बची
Surendra Koli’s story is a disturbing tale of crime, justice and a life irreversibly altered. Arrested in the 2006 Nithari killings, he spent nearly 19 years in prison, faced multiple death sentences and came close to execution. Eventually, his convictions collapsed and the Supreme Court acquitted him in the final case. Freedom, however, could not restore what time had taken away—his mother had died, his family had moved on, and his name remained burdened by notoriety. Living under another name, he sought a fresh start through a small tea shop in Haridwar, where his life ended tragically.
सुरेंद्र कोली की त्रासद कथा—फांसी के फंदे से बचा, अदालत से बरी हुआ, लेकिन घर, परिवार और अपनी पहचान तक पीछे छूट गई

-जयसिंह रावत
किसी फिल्म की पटकथा में यह कहानी लिखी जाती तो शायद दर्शक कहते कि लेखक ने दुख और विडंबना कुछ ज्यादा ही भर दी है। पहाड़ के एक साधारण परिवार का युवक रोजगार की तलाश में घर छोड़ता है। महानगर में घरेलू नौकर बनता है। फिर अचानक देश के सबसे भयावह अपराधकांडों में से एक का चेहरा बन जाता है। अदालतों से एक के बाद एक मौत की सजाएं मिलती हैं। फांसी का फंदा इतना करीब पहुंच जाता है कि जिंदगी और मौत के बीच कुछ घंटे ही बाकी दिखाई देते हैं। लेकिन फांसी टल जाती है। वर्षों बाद मुकदमों की दिशा बदलती है। एक-एक कर दोषसिद्धियां गिरती हैं और अंततः देश की सर्वोच्च अदालत आखिरी मामले में भी उसे बरी कर देती है। करीब 19 वर्ष बाद जेल का दरवाजा खुलता है।
आदमी आजाद हो जाता है।
लेकिन बाहर वह जिंदगी नहीं बची थी, जिसे वह उन्नीस साल पहले छोड़कर गया था।
मां मर चुकी थी। बेटी बड़ी होकर अपने घर जा चुकी थी। परिवार बिखर चुका था। रोजगार के लिए दर-दर भटकना था और सबसे बड़ी विडंबना यह कि जिस नाम को अदालतों ने अंततः अपराध की दोषसिद्धि से मुक्त कर दिया, उसी नाम के साथ सामान्य जिंदगी जीना कठिन हो गया था।
इसलिए सुरेंद्र कोली को शायद जेल से बाहर आने के बाद भी एक और कैद से बचने के लिए अपना नाम पीछे छोड़ना पड़ा। हरिद्वार में लोग उसे सुरेंद्र कोली नहीं, ‘सदाराम’ के नाम से जानते थे।
और फिर 18 सितंबर 2026 की सुबह उसकी छोटी-सी चाय की दुकान के भीतर उसका शव फंदे से लटका मिला। कोई आत्महत्या-पत्र नहीं मिला। पुलिस परिस्थितियों की जांच कर रही है।
निठारी से हरिद्वार की उस चाय की दुकान तक पहुंची सुरेंद्र कोली की कहानी केवल अपराध, सजा और रिहाई की कहानी नहीं रह जाती। यह उस सवाल की कहानी भी बन जाती है कि कानून किसी आदमी को आजाद कर दे, लेकिन उसके जीवन के उन्नीस साल, परिवार, सामाजिक पहचान और भविष्य वापस न कर सके तो आजादी का अर्थ आखिर क्या रह जाता है?
निठारी और वह नाम जिससे देश सिहर उठा
दिसंबर 2006 में नोएडा के निठारी में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर के मकान के पीछे नाले और आसपास से बच्चों तथा महिलाओं के मानव अवशेष मिलने की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। पंढेर के घरेलू नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार किया गया। उसके खिलाफ अपहरण, हत्या, दुष्कर्म और साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर आरोपों में मुकदमे चले। निठारी देश के सबसे चर्चित और भयावह आपराधिक मामलों में शामिल हो गया।
इसके बाद लगभग दो दशकों तक सार्वजनिक स्मृति में निठारी और सुरेंद्र कोली का नाम इस तरह जुड़ गया कि दोनों को अलग-अलग देखना कठिन हो गया। अदालतों ने अलग-अलग मामलों में उसे दोषी ठहराया और कई बार मृत्युदंड सुनाया। सितंबर 2014 में स्थिति यहां तक पहुंची कि उसे फांसी के लिए मेरठ जेल भेज दिया गया। कानूनी हस्तक्षेप के बाद अंतिम समय में फांसी टली और बाद में मृत्युदंड उम्रकैद में बदल गया।
तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि वर्षों बाद उसी व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमों की कानूनी बुनियाद पर ऐसे सवाल उठेंगे कि अंततः सभी 13 मामलों में दोषसिद्धियां समाप्त हो जाएंगी।
फिर अदालतों में पलटने लगी कहानी
अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निठारी से जुड़े 12 मामलों में कोली को बरी कर दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इन मामलों में बरी किए जाने के खिलाफ अपीलें भी खारिज कर दीं। फिर भी एक मामला बचा रहा, जिसमें उसकी पुरानी दोषसिद्धि कायम थी।
11 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने उस अंतिम मामले में भी उसकी दोषसिद्धि समाप्त कर दी। अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि एक ही घटनाक्रम और समान प्रकार के साक्ष्यों पर आधारित अन्य मामलों में जिन प्रमाणों को कानूनी कसौटी पर स्वीकार नहीं किया गया, उन्हीं के सहारे एक अकेली दोषसिद्धि कैसे कायम रखी जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी 2011 की दोषसिद्धि संबंधी व्यवस्था वापस लेते हुए कोली को अंतिम मामले में भी बरी किया और तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
निर्णय में एक और बात अत्यंत महत्वपूर्ण थी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर गहरा खेद व्यक्त किया कि इतने लंबे अनुसंधान और मुकदमेबाजी के बावजूद वास्तविक अपराधी की पहचान उस स्तर तक स्थापित नहीं हो सकी, जिसकी कानून अपेक्षा करता है।
करीब 19 साल बाद सुरेंद्र कोली जेल से बाहर आया।
लेकिन न्यायालय से मिली यह आजादी उसके जीवन की घड़ी को दिसंबर 2006 पर वापस नहीं ले जा सकती थी।
जिस घर में लौटना था, वह समय के साथ चला गया
यहीं से इस कहानी का सबसे मानवीय और शायद सबसे पीड़ादायक हिस्सा शुरू होता है।
उन्नीस वर्ष किसी कैलेंडर के केवल 19 पन्ने नहीं होते। इतने समय में बच्चे जवान हो जाते हैं, बूढ़े माता-पिता चले जाते हैं, रिश्ते बदल जाते हैं और इंतजार भी एक दिन थक जाता है।
कोली की मां उसकी रिहाई नहीं देख सकीं। वर्ष 2022 में उनका निधन हो गया। कोली ने जेल से बाहर आने के बाद इसका दुख अपने परिचितों से साझा भी किया था कि मां उसे आजाद होते नहीं देख सकीं। उसकी बेटी का विवाह हो चुका था। परिवार वर्षों से अलग परिस्थितियों में अपना जीवन आगे बढ़ा चुका था।
जिस व्यक्ति को बार-बार मृत्युदंड मिला हो और जिसकी फांसी तक लगभग निश्चित दिखाई दी हो, उसके परिवार से यह अपेक्षा करना भी आसान है कि वह अनिश्चितकाल तक समय को रोककर रखे; उस परिस्थिति को जीना कहीं अधिक कठिन रहा होगा। पत्नी के सामने अपने बच्चों का पालन-पोषण और भविष्य था। परिवार को भी उस सामाजिक बोझ का सामना करना पड़ा होगा, जो देश के सबसे बदनाम आपराधिक मामलों में से एक के साथ नाम जुड़ने से आता है।
और फिर लगभग दो दशक बाद वह आदमी वापस आया।
जिस मां के पास जाना था, वह नहीं थी। बेटी अपनी गृहस्थी में जा चुकी थी। परिवार की जिंदगी अपनी दिशा में बहुत आगे निकल चुकी थी।
जेल का फाटक खुल गया था, लेकिन जिस घर की ओर लौटना था, वह घर समय बहुत पीछे छोड़ आया था।
आजादी तो मिल गई, अब रोटी कैसे मिले?
अदालत से बरी होने के बाद जीवन का अगला प्रश्न कानून का नहीं, पेट का था।
लगभग दो दशक जेल में गुजारने के बाद पचास की उम्र पार कर चुका आदमी आखिर नए सिरे से कौन-सा रोजगार शुरू करे? उसके पास पूंजी नहीं थी, नया पेशेवर कौशल सीमित था और उसके साथ एक ऐसा नाम जुड़ा था जिसे इंटरनेट और सार्वजनिक स्मृति ने हमेशा के लिए निठारी से जोड़ दिया था।
हरिद्वार पहुंचकर उसने अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने की कोशिश की। स्थानीय लोगों के बीच वह ‘सदाराम’ बन गया। उसने सिडकुल क्षेत्र में सुरक्षा गार्ड के रूप में भी काम किया। रिपोर्टों के अनुसार वह कुछ समय से हरिद्वार में इसी बदली हुई पहचान के साथ रह रहा था।
इस प्रसंग में शायद उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना छिपी थी।
जिस आदमी ने लगभग उन्नीस साल अदालतों में अपनी पहचान से जुड़े आरोपों से लड़ते हुए बिताए, बाहर निकलकर सामान्य जीवन जीने के लिए उसी पहचान को छिपाने लगा।
कानून की किताब में वह बरी हो चुका था, लेकिन समाज की स्मृति से कोई न्यायिक आदेश उसका पुराना परिचय मिटा नहीं सकता था।
आखिर एक चाय की दुकान में मिली नई शुरुआत
अंततः उसने हरिद्वार के सप्तसरोवर-भूपतवाला क्षेत्र में छोटी-सी चाय की दुकान शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार दुकान उसने अपनी मृत्यु से कुछ ही दिन पहले शुरू की थी। शायद उसकी आकांक्षा भी अब बहुत छोटी हो चुकी थी—इतनी कमाई हो जाए कि दो वक्त की रोटी मिल सके और इतनी गुमनामी मिल जाए कि कोई उसके अतीत के बारे में सवाल न करे।
कभी राष्ट्रीय समाचारों की सबसे बड़ी सुर्खियों में रहा व्यक्ति अब एक छोटी-सी दुकान में केतली चढ़ाकर जिंदगी फिर से शुरू कर रहा था।
लेकिन वह शुरुआत कुछ ही दिनों की साबित हुई।
18 सितंबर की सुबह दुकान नहीं खुली। अंदर देखने पर उसका शव फंदे से लटका मिला। पुलिस को कोई आत्महत्या-पत्र नहीं मिला है। प्रथम दृष्टया पुलिस इसे आत्महत्या का मामला मान रही है, लेकिन मृत्यु से पहले की परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि उसके अंतिम क्षणों में वास्तव में क्या हुआ अथवा उसके मन में क्या चल रहा था। पोस्टमार्टम और पुलिस जांच से ही परिस्थितियां अधिक स्पष्ट हो सकेंगी।
निठारी के पीड़ितों को भूलकर नहीं लिखी जा सकती यह कहानी
सुरेंद्र कोली की जिंदगी का यह पक्ष जितना मार्मिक है, निठारी की कहानी उससे कहीं बड़ी है। उसे केवल कोली की त्रासदी में समेट देना उन परिवारों के साथ अन्याय होगा, जिनके बच्चे और प्रियजन गायब हुए, जिनके अवशेष मिले और जिन्होंने वर्षों न्याय की प्रतीक्षा की।
उनका दुख वास्तविक था और है।
इसलिए कोली के साथ जो हुआ, उसका वर्णन निठारी के पीड़ितों के दुख को छोटा करके नहीं किया जा सकता। बल्कि अंतिम न्यायिक परिणाम इस मामले को और बेचैन करने वाला बनाता है। यदि कोली के खिलाफ दोषसिद्धियां कानूनी कसौटी पर अंततः टिक नहीं सकीं, तो उन बच्चों और महिलाओं के साथ हुए अपराधों के लिए जवाबदेह कौन था?
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी इसी कारण असाधारण महत्व रखती है—इतनी लंबी जांच के बाद भी वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं हो सकी।
इस त्रासदी में इसलिए केवल एक प्रश्न नहीं है।
पीड़ित परिवार पूछ सकते हैं—हमारे बच्चों के साथ जो हुआ, उसका न्याय कहां है?
और सुरेंद्र कोली की कहानी पूछती है—यदि दोषसिद्धियां अंततः टिक नहीं सकीं तो जेल में गुजरे करीब 19 वर्ष कौन लौटा सकता है?
दोनों प्रश्न एक-दूसरे को समाप्त नहीं करते। उलटे वे हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था के सामने एक साथ खड़े होते हैं।
जेल खुल गई थी, अतीत की कैद नहीं
न्यायालय दोषसिद्धि रद्द कर सकता है। जेलर सलाखों का दरवाजा खोल सकता है। सरकारी अभिलेख में आदमी फिर स्वतंत्र नागरिक हो सकता है।
लेकिन समाज की स्मृति का कोई जेलर नहीं होता।
2006 में जब सुरेंद्र कोली जेल गया था, तब उसके पास एक परिवार था, मां थी, बच्चे थे और आगे की जिंदगी थी। करीब 19 वर्ष बाद जब वह बाहर आया तो समय उन सबको बदल चुका था। उसके सामने जीवन फिर से शुरू करने की चुनौती थी और साथ में वह नाम था, जिसे लगभग दो दशकों तक देश ने निठारी के भयावह अपराधों के साथ सुना था।
शायद इसीलिए हरिद्वार में सुरेंद्र कोली को ‘सदाराम’ बनना पड़ा।
यह नाम बदलना मात्र छद्म पहचान का मामला नहीं लगता। इसे उस व्यक्ति की सामान्य जीवन में लौटने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसकी पुरानी पहचान उसके आगे-आगे चल रही थी।
फिर एक छोटी-सी चाय की दुकान मिली। लगा होगा कि जिंदगी अब बहुत कुछ नहीं तो कम से कम रोज की रोटी और थोड़ी-सी शांति दे देगी।
वह मोहलत भी बहुत छोटी निकली।
सुरेंद्र कोली की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच अभी अपना उत्तर देगी। लेकिन उसका जीवन एक ऐसा प्रश्न छोड़ गया है, जिसका उत्तर किसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं मिलेगा।
किसी आदमी को अदालत से बरी होने के बाद यदि उसके जीवन के उन्नीस वर्ष, बिखरा परिवार, रोजगार और अपनी पुरानी पहचान के साथ सामान्य ढंग से जीने का अधिकार वापस न मिल सके, तो क्या केवल जेल का दरवाजा खुल जाना ही पूरी आजादी है?

