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वंदे मातरम् न गाने पर आपराधिक कार्रवाई के सवाल की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट

 

धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर गायन से इनकार करने वालों के अधिकारों पर केंद्र से मांगा जवाब, ‘बिजो इमैनुएल’ फैसले का दिया हवाला

नई दिल्ली, 23 सितंबर। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल पर विचार करने का फैसला किया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आवाज के कारण ‘वंदे मातरम्’ के एक या अधिक अंतरे नहीं गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए। अदालत ने इस संबंध में केंद्र सरकार से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मंगलवार को प्रसिद्ध कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में वर्ष 2026 में किए गए संशोधन और ‘वंदे मातरम्’ के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
अदालत तय नहीं करेगी कि कितने अंतरे हों
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग-अलग सवालों के बीच स्पष्ट अंतर किया। पहला सवाल यह कि ‘वंदे मातरम्’ के दो अंतरे राष्ट्रीय गीत माने जाएं या सभी छह अंतरे। दूसरा सवाल यह कि धार्मिक विश्वास अथवा अंतरात्मा के आधार पर गीत नहीं गाने वाले व्यक्ति को दंडित किया जा सकता है या नहीं।
पीठ ने संकेत दिया कि राष्ट्रीय गीत का स्वरूप और उसके कितने अंतरे मान्य किए जाएं, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। यह विषय लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित शासन और संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत राष्ट्रीय गीत से जुड़ी राष्ट्रीय भावना या आकांक्षाओं का पुनर्निर्धारण नहीं करेगी। लेकिन यदि कानून के कारण किसी व्यक्ति की धार्मिक या अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्रभावित होती है और उसके सामने आपराधिक कार्रवाई का खतरा उत्पन्न होता है, तो उस संवैधानिक प्रश्न की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
1986 के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने 1986 के ऐतिहासिक ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ फैसले का उल्लेख करना है। यह मामला उन स्कूली बच्चों से संबंधित था, जिन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया था, हालांकि वे राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय माना था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का अपमान नहीं करता और सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो केवल राष्ट्रगान न गाने के कारण उसे दंडित नहीं किया जा सकता। वर्तमान पीठ ने कहा कि उस फैसले में स्थापित सिद्धांत आज भी देश का कानून है और उसे पलटा नहीं गया है।
इसी आधार पर मौजूदा मामले में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि जो व्यक्ति ‘वंदे मातरम्’ के प्रति सम्मान रखता है, लेकिन धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के कारण उसका गायन नहीं करता, क्या उसे आपराधिक दंड के दायरे में लाया जा सकता है।
2026 के संशोधन से क्यों बदली कानूनी स्थिति
विवाद की पृष्ठभूमि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में 2026 में किए गए संशोधन से जुड़ी है। संशोधित प्रावधान में राष्ट्रीय गान के साथ राष्ट्रीय गीत को भी शामिल किया गया है। किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने अथवा गायन कर रही सभा में व्यवधान पैदा करने पर तीन वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान हो सकता है।
यहीं एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर सामने आता है। गीत स्वयं न गाना और दूसरों को गीत गाने से रोकना या गायन में व्यवधान पैदा करना एक ही बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह जांच का विषय है कि संशोधित कानून और सरकारी निर्देशों का प्रयोग कहीं इस प्रकार तो नहीं किया जा सकता कि केवल स्वयं गीत न गाने वाले व्यक्ति को भी आपराधिक परिणाम भुगतने पड़ें।
इससे पहले 25 मार्च 2026 को भी ‘वंदे मातरम्’ संबंधी सरकारी निर्देश सुप्रीम कोर्ट के सामने आए थे। उस समय अदालत ने हस्तक्षेप नहीं किया था क्योंकि गीत नहीं गाने के लिए कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं था। याचिकाकर्ता का कहना है कि बाद में कानून में संशोधन और आपराधिक दंड का प्रावधान जुड़ने के कारण अब परिस्थितियां बदल गई हैं।
टी.एम. कृष्णा की आपत्ति क्या है
टी.एम. कृष्णा ने गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी है जिनमें कुछ सरकारी, औपचारिक और सांस्कृतिक अवसरों पर ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह अंतरों के गायन की व्यवस्था की गई है। उनका तर्क है कि गीत के अंतिम चार अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भ आते हैं और सभी छह अंतरों का गायन अनिवार्य किए जाने से कुछ नागरिकों की धार्मिक तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
कृष्णा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि संशोधित कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। उनके अनुसार इससे कानून के इस्तेमाल को लेकर अस्पष्टता पैदा हो सकती है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(ए), 21 और 25 के तहत प्राप्त अधिकारों का भी उल्लेख किया गया है।
धर्मनिरपेक्षता के तर्क पर भी हुई बहस
सुनवाई के दौरान यह तर्क भी दिया गया कि सभी छह अंतरों को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता देना संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र से जुड़ा सवाल पैदा करता है। हालांकि पीठ इस व्यापक तर्क से तत्काल सहमत नहीं दिखाई दी। न्यायमूर्ति बागची ने संकेत दिया कि किसी राष्ट्रीय गीत में ईश्वर अथवा धार्मिक प्रतीक का उल्लेख होना अपने आप में धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध होने का निर्णायक आधार नहीं हो सकता। अदालत ने इसके बजाय उस अधिक सीमित संवैधानिक प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया कि किसी व्यक्ति की धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा उसे गीत गाने से रोकती है तो क्या राज्य उसे दंडित कर सकता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उनके और याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के बीच कानून निर्माण और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर तीखी बहस भी हुई। हालांकि पीठ ने मामले को भावनात्मक बहस के बजाय संवैधानिक प्रश्नों तक सीमित रखने पर जोर दिया।
सम्मान और अनिवार्य गायन के बीच संवैधानिक अंतर
सुप्रीम कोर्ट की मंगलवार की टिप्पणियों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने अभी कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है और न ही ‘वंदे मातरम्’ के छह अंतरों की वैधता पर कोई अंतिम फैसला दिया है। अदालत ने फिलहाल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और यह जांच करने का संकेत दिया है कि संशोधित कानून लागू करते समय संविधान द्वारा दी गई अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
इस प्रकार मामला अब ‘वंदे मातरम्’ के पक्ष या विपक्ष से आगे बढ़कर एक बुनियादी संवैधानिक प्रश्न पर केंद्रित है—राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करने की राज्य की शक्ति और किसी नागरिक की अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता के बीच सीमा कहां निर्धारित होगी। सुप्रीम कोर्ट के 1986 के ‘बिजो इमैनुएल’ फैसले की रोशनी में आने वाली सुनवाई इस सीमा को और स्पष्ट कर सकती है।

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