आपकी नींद की आदतें भी दे सकती हैं अवसाद का संकेत, नए अध्ययन में खुलासा
सुबह उठते ही थकान, देर रात तक जागना और जरूरत से ज्यादा सोना शरीर की जैविक घड़ी में गड़बड़ी के संकेत हो सकते हैं। नए अध्ययन में अवसाद और शरीर की जैविक घड़ी के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आया; भारतीय जीवनशैली, बदलते कार्यसमय और अनियमित नींद के संदर्भ में भी उपयोगी हैं

–क्रिस्टीना कैरन
आमतौर पर माना जाता है कि अवसाद यानी डिप्रेशन का मतलब लगातार उदासी, निराशा, किसी काम में मन न लगना या जीवन के प्रति उत्साह कम होना है। लेकिन क्या सुबह उठने पर अत्यधिक थकान महसूस करना, रात को देर तक जागना और छुट्टी के दिनों में सामान्य से कहीं ज्यादा सोना भी अवसाद के किसी विशेष स्वरूप का संकेत हो सकता है? ऑस्ट्रेलिया में हुए एक नए अध्ययन ने इसी सवाल की ओर चिकित्सा जगत का ध्यान आकर्षित किया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अवसाद से पीड़ित कुछ लोगों में समस्या का संबंध शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी से हो सकता है। ऐसे मरीजों के उपचार में नींद और जागने के समय को नियमित करने वाली चिकित्सा उपयोगी साबित हो सकती है।
भारत जैसे देश में यह अध्ययन विशेष महत्व रखता है, जहां महानगरों में देर रात तक काम करने, मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग, अनियमित कार्यसमय, रात्रिकालीन पाली और पर्याप्त नींद न लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हालांकि हर देर से सोने या सुबह थकान महसूस करने वाले व्यक्ति को अवसादग्रस्त मान लेना गलत होगा।
क्या है शरीर की जैविक घड़ी?
मनुष्य के शरीर में लगभग 24 घंटे का एक प्राकृतिक चक्र काम करता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सर्केडियन रिदम या जैविक दैनिक लय कहा जाता है। यह चक्र निर्धारित करता है कि हमें कब नींद आएगी, कब जागने की प्रवृत्ति होगी, शरीर का तापमान कैसे बदलेगा और विभिन्न हार्मोन कब सक्रिय होंगे।
इस व्यवस्था को नियंत्रित करने में मस्तिष्क की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सूर्य का प्राकृतिक प्रकाश शरीर को दिन और रात का संकेत देता है। इसी के अनुसार मेलाटोनिन जैसे हार्मोन का स्राव प्रभावित होता है, जो नींद के समय निर्धारण में सहायता करता है।
जब किसी व्यक्ति की दिनचर्या लंबे समय तक इस प्राकृतिक लय से असंगत रहती है, तो नींद, ऊर्जा, एकाग्रता और मनोदशा प्रभावित हो सकती है। हालांकि जैविक घड़ी में गड़बड़ी और अवसाद के बीच संबंध जटिल है। नींद की समस्या अवसाद का कारण भी बन सकती है, उसका परिणाम भी हो सकती है और दोनों किसी तीसरे कारण से भी उत्पन्न हो सकते हैं।
11 हजार से अधिक मरीजों पर अध्ययन
सिडनी विश्वविद्यालय के ब्रेन एंड माइंड सेंटर के मनोचिकित्सा विशेषज्ञ प्रोफेसर इयान बी. हिकी और उनके सहयोगियों ने अवसाद से पीड़ित 11 हजार से अधिक ऑस्ट्रेलियाई लोगों का अध्ययन किया। अक्टूबर 2026 में ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइकियाट्री में प्रकाशित इस शोध में लगभग 2,600 प्रतिभागियों, अर्थात करीब एक चौथाई, में ऐसे लक्षण पाए गए जिन्हें शोधकर्ताओं ने ‘सर्केडियन डिप्रेशन’ नामक प्रस्तावित उप-प्रकार से जोड़ा।
यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि सर्केडियन डिप्रेशन अभी अवसाद की कोई स्वतंत्र, औपचारिक रूप से मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय निदान श्रेणी नहीं है। शोधकर्ताओं ने इसे एक संभावित उप-प्रकार के रूप में प्रस्तावित किया है। इसके नैदानिक महत्व और उपचार संबंधी उपयोगिता की पुष्टि के लिए और अध्ययन आवश्यक हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसे मरीजों में अवसाद अपेक्षाकृत कम उम्र में शुरू होने, अवसाद के दौरान वजन बढ़ने और कुछ गंभीर मानसिक लक्षण सामने आने की संभावना अधिक पाई गई। कुछ प्रतिभागियों में आत्महत्या संबंधी विचार भी अधिक दर्ज किए गए। हालांकि ये सांख्यिकीय संबंध हैं; इनसे किसी एक व्यक्ति के लिए बीमारी की गंभीरता या भविष्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नींद और दैनिक जीवन से संबंधित कुछ विशेष संकेतों की पहचान की। इनमें सुबह उठने पर अत्यधिक थकान, सामान्यतः देर से जागना, रात में अधिक सक्रिय महसूस करना, छुट्टियों में कामकाजी दिनों की तुलना में काफी देर तक सोना, मौसम के अनुसार नींद, भूख, वजन, ऊर्जा या मनोदशा में बदलाव और अवसाद के गंभीर दौर में अधिक सोना शामिल थे। अध्ययन में इन सात संकेतों में से कम से कम तीन की मौजूदगी को प्रस्तावित उप-प्रकार की पहचान के लिए इस्तेमाल किया गया।
लेकिन इसे घरेलू निदान का तरीका नहीं समझना चाहिए। देर रात तक जागना, नींद पूरी न होना, स्लीप एपनिया, थायरॉयड संबंधी समस्याएं, कुछ दवाएं और अन्य शारीरिक स्थितियां भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकती हैं। केवल इन संकेतों के आधार पर अवसाद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
भारतीय जीवनशैली के लिए क्या मायने?
भारत में इस शोध के निष्कर्षों को विशेष सावधानी के साथ समझने की जरूरत है। सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन, सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कर्मचारी बदलती पालियों में काम करते हैं। विद्यार्थियों में देर रात तक पढ़ाई या मोबाइल इस्तेमाल करने और सुबह जल्दी विद्यालय या महाविद्यालय जाने की दिनचर्या भी नींद की कमी पैदा कर सकती है।ऐसे लोगों में थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें सर्केडियन डिप्रेशन है। कार्यसमय और नींद के बीच लगातार असंगति मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक जोखिम कारक हो सकती है, जिसकी अलग चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।
भारतीय परिस्थितियों में एक और महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक प्रकाश का है। पर्याप्त सुबह का उजाला शरीर की जैविक घड़ी को समय का संकेत देने में मदद करता है। दूसरी ओर, देर रात तेज कृत्रिम प्रकाश और स्क्रीन का इस्तेमाल कुछ लोगों में नींद आने का समय पीछे खिसका सकता है।
क्या अवसाद की दवाओं के बजाय नींद सुधारना पर्याप्त होगा?
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि प्रस्तावित सर्केडियन डिप्रेशन वाले प्रतिभागियों ने कुछ प्रचलित अवसादरोधी दवाओं से अपेक्षाकृत कम लाभ और अधिक दुष्प्रभाव होने की जानकारी दी।इस आधार पर शोधकर्ताओं ने संभावना व्यक्त की कि ऐसे कुछ मरीजों को जैविक घड़ी के समय को व्यवस्थित करने वाले उपचारों से लाभ मिल सकता है। इनमें नियंत्रित प्रकाश चिकित्सा, नींद-जागने की नियमित दिनचर्या और चुनिंदा परिस्थितियों में मेलाटोनिन आधारित उपचार शामिल हो सकते हैं।लेकिन इस अध्ययन से यह सिद्ध नहीं होता कि ऐसे उपचार अवसादरोधी दवाओं से बेहतर हैं। अध्ययन में उपचार की प्रभावशीलता का निर्णायक परीक्षण नहीं किया गया था। इसलिए मरीजों को अपनी दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए और न ही चिकित्सकीय सलाह के बिना मेलाटोनिन या तेज प्रकाश चिकित्सा शुरू करनी चाहिए। विशेषकर बाइपोलर डिसऑर्डर वाले व्यक्तियों में ऐसे उपचारों के लिए अतिरिक्त सावधानी आवश्यक हो सकती है।
वैज्ञानिकों ने भी उठाए सवाल
नए अध्ययन से असंबद्ध विशेषज्ञों ने इसके निष्कर्षों को दिलचस्प बताया है, लेकिन कुछ सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया है।अध्ययन के अधिकांश प्रतिभागी यूरोपीय मूल के थे। इसलिए उसके निष्कर्षों को सीधे भारतीय आबादी पर लागू नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, नींद संबंधी जानकारी प्रतिभागियों ने स्वयं दी थी। वस्तुनिष्ठ नींद मापन और दीर्घकालीन निगरानी से निष्कर्ष अधिक मजबूत हो सकते थे।
यह भी स्पष्ट नहीं था कि मूल्यांकन के समय सभी प्रतिभागी अवसाद के सक्रिय दौर से गुजर रहे थे या नहीं। इसलिए यह निर्धारित करना कठिन है कि जैविक घड़ी की गड़बड़ी अवसाद से पहले मौजूद थी या अवसाद के कारण उत्पन्न हुई।इन सीमाओं के बावजूद अध्ययन एक महत्वपूर्ण संभावना प्रस्तुत करता है कि भविष्य में अवसाद के उपचार को मरीजों की नींद और जैविक लय के अनुसार अधिक व्यक्तिगत बनाया जा सकेगा।
भारतीय पाठकों के लिए उपयोगी सावधानियां
नींद और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए कुछ सामान्य उपाय सहायक हो सकते हैं।
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प्रतिदिन लगभग एक ही समय पर सोने और जागने का प्रयास करें। वयस्कों को सामान्यतः सात से नौ घंटे की नींद की आवश्यकता होती है।
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सुबह प्राकृतिक प्रकाश में कुछ समय बिताएं और नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
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सोने से पहले मोबाइल, तेज रोशनी और कैफीन का उपयोग सीमित रखें।
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छुट्टियों और कामकाजी दिनों की नींद की दिनचर्या में बहुत अधिक अंतर न रखें।
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लगातार उदासी, रुचि में कमी, अत्यधिक थकान या नींद की परेशानी बनी रहने पर चिकित्सक अथवा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
यदि उदासी या अन्य लक्षण अधिकांश दिनों में दो सप्ताह या उससे अधिक बने रहें, अथवा रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित करने लगें, तो पेशेवर मूल्यांकन आवश्यक है। आत्महत्या के विचार आने पर तत्काल सहायता लेनी चाहिए। भारत में मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए सरकारी टेली-मानस सेवा के नंबर 14416 या 1800-891-4416 पर संपर्क किया जा सकता है।
नींद को केवल आराम नहीं, स्वास्थ्य का आधार समझें
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह नहीं है कि देर तक सोने वाला हर व्यक्ति अवसादग्रस्त है, बल्कि यह है कि नींद की प्रकृति, उसका समय और नियमितता मानसिक स्वास्थ्य को समझने के महत्वपूर्ण संकेतक हो सकते हैं।अब तक अवसाद के उपचार में उदासी, चिंता और व्यवहार संबंधी लक्षणों पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। नए शोध से यह संभावना मजबूत होती है कि कुछ मरीजों के लिए नींद-जागने की जैविक लय का मूल्यांकन भी उपचार योजना का उपयोगी हिस्सा बन सकता है।
भारतीय समाज में नींद की कमी को अक्सर मेहनत, व्यस्तता या आधुनिक जीवनशैली की अनिवार्यता मान लिया जाता है। यह दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। पर्याप्त और नियमित नींद कोई विलासिता नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की बुनियादी आवश्यकता है। हालांकि नींद की गड़बड़ी को बीमारी का नाम देने से पहले उसके वास्तविक कारणों को समझना भी उतना ही जरूरी है।
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आधार: क्रिस्टीना कैरन की 23 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट तथा उसमें वर्णित ब्रिटिश जर्नल ऑफ साइकियाट्री का अध्ययन। यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है, व्यक्तिगत निदान या उपचार का विकल्प नहीं।

