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आपदा न्यूनीकरण परियोजनाओं की समीक्षा, भूकम्प चेतावनी और ग्लेशियर झीलों पर फोकस

 

 

देहरादून, 4 मई । मुख्य सचिव श्री आनंद बर्द्धन ने सचिवालय में आयोजित उच्चस्तरीय बैठकों में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली, ग्लेशियर झील विस्फोट (GLOF) जोखिम न्यूनीकरण, राष्ट्रीय भूकम्प जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम तथा भूस्खलन प्रबंधन से जुड़े कार्यों की प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने सभी संबंधित विभागों और तकनीकी संस्थानों को समयबद्ध ढंग से कार्य पूर्ण करने और आपसी समन्वय मजबूत करने के निर्देश दिए।

बैठक में बताया गया कि राज्य में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली को लगातार सुदृढ़ किया जा रहा है। वर्तमान में 169 सेंसर और 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं। आईआईटी रुड़की के सहयोग से इस प्रणाली का संचालन और उन्नयन किया जा रहा है। इसके अलावा, भूकम्पीय संवेदनशील क्षेत्रों में 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर लगाने और चेतावनी प्रसार के लिए 526 अतिरिक्त सायरन स्थापित करने की योजना है।

ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत वसुंधरा झील को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल-टाइम मॉनिटरिंग तंत्र स्थापित किए जाएंगे। इस मॉडल को आगे अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर भी लागू करने की योजना है। मुख्य सचिव ने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी को 2026-27 और 2027-28 की कार्ययोजना के लिए विस्तृत टाइमलाइन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास श्री विनोद कुमार सुमन ने बताया कि राष्ट्रीय भूकम्प विज्ञान केंद्र के अंतर्गत देशभर में 167 सिस्मोलॉजिकल वेधशालाएं संचालित हैं, जिनमें 8 उत्तराखण्ड में हैं। राज्य में भूकम्प निगरानी को और मजबूत करने के लिए रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ और चकराता में नई वेधशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव है।

भूस्खलन और डिब्रिस फ्लो (मलबा बहाव) के जोखिम आकलन के तहत चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में 48 संवेदनशील स्थलों की पहचान की गई है। इन स्थानों को जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। इन क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर सर्वेक्षण, निगरानी और निवारक कार्य किए जाएंगे।

इस कार्य के लिए गठित संयुक्त समिति में उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान और उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र शामिल हैं।

मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि आपदा चेतावनी प्रणालियों को और अधिक सटीक, त्वरित और विश्वसनीय बनाया जाए, ताकि आमजन तक समय पर सूचना पहुंच सके और संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

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