कांग्रेस, वामपंथ और अब भगवा: बंगाल में 74 साल बाद ‘महा-परिवर्तन’
The 2026 West Bengal election marks a historic shift as the BJP secures a decisive majority, ending 15 years of TMC rule. This “Great Transformation” realizes Syama Prasad Mookerjee’s vision in his birthplace after decades of ideological distance rooted in the Jan Sangh’s limited role during the independence movement. While the BJP crossed 198 seats, the Congress marginally improved, winning two seats after previously holding zero. However, intense polarization and record 92.93% turnout highlight concerns over India’s secular fabric. The new government faces the challenge of ending political violence and restoring democratic dignity.
— जयसिंह रावत
पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जिसे भविष्य के इतिहासकार ‘महा-परिवर्तन’ की संज्ञा देंगे। 2026 के विधानसभा चुनावों के जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि बंगाल में ‘भगवा’ का परचम लहराना अब लगभग तय है। सात दशकों के लंबे वैचारिक वनवास के बाद, भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पहली बार उनके सपनों को साकार करने की दिशा में बढ़ी है। भाजपा ने 198 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाकर 15 साल के ममता बनर्जी के शासन की चूलें हिला दी हैं। लेकिन यह जीत जितनी भव्य दिख रही है, इसका विश्लेषण उतना ही गहरा और निष्पक्षता की मांग करता है।
ऐतिहासिक परहेज: जनसंघ और स्वतंत्रता आंदोलन का संशय
एक बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जिस प्रदेश ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसा नेतृत्व दिया, उसने उनकी विचारधारा से इतने सालों तक दूरी क्यों बनाए रखी? इसके पीछे बंगाल का विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक इतिहास है। बंगाल स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना का केंद्र था, जहाँ कांग्रेस और वामपंथी क्रांतिकारी विचारधाराएं अग्रणी थीं। बंगाल के मानस में यह बात गहरे तक पैठी रही कि जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब जनसंघ और उसके वैचारिक आधार स्तंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका वैसी सक्रिय नहीं थी जैसी अन्य दलों की थी।
आलोचकों का तर्क रहा है कि 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जहाँ बंगाल का युवा जेलों में था, वहीं आरएसएस और तत्कालीन हिंदू महासभा के नेतृत्व पर अंग्रेजों के प्रति नरम रुख अपनाने के आरोप लगते रहे। बंगाल के बुद्धिजीवी वर्ग ने हमेशा यह महसूस किया कि जिस विचारधारा ने स्वतंत्रता के सामूहिक संघर्ष में अपनी आहुति नहीं दी, वह बंगाल की क्रांतिकारी विरासत का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकती है? यही कारण था कि भाजपा को लंबे समय तक एक “बाहरी” और स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों से कटी हुई पार्टी माना जाता रहा।
सांप्रदायिकता की काली छाया और धर्मनिरपेक्ष ढांचा
आज जब बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत दिख रही है, तो इसके साथ ही सांप्रदायिकता की वह काली छाया भी चर्चा में है जो भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने (Secular Fabric) को चुनौती दे रही है। बंगाल हमेशा से ‘सर्वधर्म समभाव’ और स्वामी विवेकानंद की उदारवादी चेतना का गढ़ रहा है। लेकिन इस चुनाव ने समाज को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया है। एक ओर ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ के आरोप लगे, तो दूसरी ओर ‘बहुसंख्यक ध्रुवीकरण’ की राजनीति ने सिर उठाया।
धार्मिक पहचान के आधार पर वोटों का यह विभाजन भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के लिए एक चिंताजनक संकेत है। यदि सत्ता का आधार केवल धार्मिक गोलबंदी बन जाए, तो वह उस समावेशी भारत की आत्मा को लहूलुहान कर देता है जिसे रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस ने संजोया था। बंगाल में भगवा का उदय यदि केवल एक विचारधारा की जीत है तो ठीक, लेकिन यदि यह सांप्रदायिक वैमनस्य की नींव पर खड़ा है, तो यह देश की एकता के लिए एक गंभीर चुनौती होगी।
टीएमसी की कमजोरी और कांग्रेस की सूक्ष्म वापसी
तृणमूल कांग्रेस की इस हार के पीछे सत्ता का अहंकार और भ्रष्टाचार के गहरे आरोप हैं। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने ममता बनर्जी की ‘मां-माटी-मानुष’ की छवि को गहरा आघात पहुँचाया। वहीं, इस महा-मुकाबले के बीच कांग्रेस का शून्य से निकलकर 2 सीटों पर पहुँचना एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण संकेत है। यह दर्शाता है कि कट्टर ध्रुवीकरण के बीच भी मतदाताओं का एक छोटा वर्ग अभी भी पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ओर उम्मीद से देख रहा है। साथ ही, नई पार्टी AJUP का 2 सीटों पर आना टीएमसी के अभेद्य मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी का पुख्ता प्रमाण है।
ताजे चुनाव: रिकॉर्ड मतदान और आयोग पर सवाल
इन चुनावों में 92.93% की रिकॉर्ड वोटिंग ने यह साबित कर दिया कि बंगाल की जनता व्यवस्था परिवर्तन के लिए कितनी आतुर थी। हालांकि, चुनावी शुचिता पर इस बार भी गंभीर सवाल उठे। मतदान के दौरान हुई छिटपुट हिंसा और फालता (Falta) जैसी सीटों पर धांधली के कारण दोबारा मतदान के आदेश ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा रखा।
श्यामा प्रसाद का सपना और भविष्य की डगर
आज जब बंगाल में भाजपा सरकार बनाने की दहलीज पर है, तो इसे डॉ. मुखर्जी की वैचारिक विरासत की ‘घर वापसी’ माना जा रहा है। भाजपा ने घुसपैठ और ‘सीएए’ जैसे मुद्दों को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। डॉ. मुखर्जी का सपना केवल सत्ता पाना नहीं था, बल्कि बंगाल की खोई हुई बौद्धिक गरिमा को बहाल करना था।
नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बंगाल की राजनीतिक हिंसा की संस्कृति को समाप्त करना और उस सांप्रदायिक सद्भाव को बचाए रखना होगा, जो इस चुनाव के दौरान सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना तभी साकार होगा जब बंगाल केवल राजनीतिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और आर्थिक प्रगति के मामले में भी भारत का सिरमौर बनेगा। ममता बनर्जी के घटते प्रभाव के बीच राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच नए समीकरण बनना अब तय है।
(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन का सहमत या असहमत होना जरुरी नहीं है. लेखक स्वयं प्रतिठित लेखक और पत्रकार हैं..एडमिन )

