पिंडर घाटी के शेर स्वर्गीय शेर सिंह दानू की स्मृति में लोहाजंग में 5 दिवसीय मेला 23 नवम्बर से

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–थराली से हरेंद्र बिष्ट–

अभाज्य उत्तर प्रदेश राज्य के तहत पिंडर घाटी से एक मात्र विधायक स्व शेर सिंह दानू की स्मृति में 23 से 27 नवंबर लोहाजंग में 5 दिवसीय सांस्कृतिक,औद्योगिक एवं पर्यटन विकास मेले का आयोजन कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी जाएगी।

अविभाज्य  उत्तर प्रदेश के दौरान तत्कालीन विकासखंड थराली अब देवाल के अंतर्गत पड़ने वाले एशिया के सबसे दुरस्थ मतदान केन्द्रों में सुमार बहतरा गांव के पास पिनाऊ गांव के मूल निवासी पूर्व विधायक शेर सिंह दानू के पिता मेजर देव सिंह दानू स्वतंत्रता आंदोलन के अगुवा  नेताओं में सुमार थें। उन्होंने  नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना ने कमांडर रहते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया। कालांतर में आजादी के बाद वें स्वतंत्र भारत में द्वितीय गढ़वाल राइफल के पहले सुबेदार मेजर बनाए गए।

विधायक दानू का जन्म सैनिक नगरी लैंसडाउन में हुआ और यही पर उनकी प्रारंभिक शिक्षा दिक्षा हुईं। इसके बाद उन्होंने बीए,एमए , एलएलबी, एलएलएम की शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त करते हुए वकालत के साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण किया और इसके लिए उन्होंने अपनी मात्र भूमि पिंडर घाटी का चयन किया। सीमांत जिला चमोली के पिछड़े पिंडर क्षेत्र के विकास के लिए वें दिन रात प्रयासरत रहे। वकील दानू ने जनसंघ के टिकट पर कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से 1969 में विधायक का चुनाव लड़ा और पिंडर घाटी की एकता के बलबूते विधायक बने और 1974 तक विधायक रहें।इस दौरान उन्होंने पिंडर क्षेत्र के विकास के लिए जों नींव रखी आज भी उसी पर क्षेत्र का विकास आगे बढ़ रहा हैं।1985 में उप्र सरकार ने दानू को गढ़वाल मंडल विकास निगम का अध्यक्ष बनाया 87 में अध्यक्ष रहते उनका देहांत हो गया। उनकी यादों को ताजा रखने एवं क्षेत्र के युवाओं को उनके पदचिन्हों पर चलने के लिए प्रेरित करने के लिए पिछले कुछ वर्षों से उसके नाम से लोहाजंग में एक मेले का आयोजन किया जा रहा है। कमेटी के अध्यक्ष इंद्र सिंह राणा ने बताया कि मेला 23 से 27 नवंबर तक आयोजित होगा।

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*पिंडर की एका को तोड़ने की साजिश रची राजनीतिक दलों ने और हुए सफल*

दरअसल स्व दानू के विधायक बनने के बाद राजनीतिक षड़यंत्र के तहत पिंडर घाटी जो कि सीधे रूप से कर्णप्रयाग विधानसभा से जुड़ी हुई थी। को नौली गांव से देवाल के अंतिम गांव बेहतरा तक को काट कर उल्टे बनाएं गए बद्रीकेदार विधानसभा क्षेत्र में जोड़ दिया गया।माना जाता हैं कि पिंडर की एका को देखते हुए राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं ने पिंडर के राजनेताओं को आगे बढ़ाने से रोकने के लिए ऐसा कदम उठाया था। जिसमें वें सफल भी रहे स्वतंत्रता के बाद एवं उत्तराखंड बनने से पहले तक पिंडर क्षेत्र से दानू ही एकलौते विधायक बन पाए थे।
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*बधाण के ढेबरो ने दिखाई थी एकजुटता*

बताया जाता है कि 1969 में जब उप्र विधानसभा के चुनाव शुरू हुए स्व दानू को जनसंघ ने कर्णप्रयाग क्षेत्र से अपना उम्मीदवार घोषित किया, तों आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में चमोली के अन्य क्षेत्रों से पिछड़े होने एवं यहां की आर्थिकी का मुख्य जरिया ढेबरों (सामान ढोने वाली बकरियां) अधिक होने के चलते कुछ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने कर्णप्रयाग चौराहे पर कुछ बकरियां पर सामान लाद कर अपने प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करना शुरू कर दिया।उनका मंतव्य था कि आप लोग उनके प्रत्याशी को वोट देंगे या कि बकरियों पर सामान ढोने वाले क्षेत्र के दानू को देंगे।इस तरह के प्रचार को देख पिंडर घाटी की जनता पूरी तरह दानू के पक्ष में लामबंद हो गई और दानू भारी मतों से विजई बनें।

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