छठवीं मूल्यांकन रिपोर्ट : जलवायु परिवर्तन का कारण भयंकर उत्सर्जन है, जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो रहे हैं,

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रिपोर्ट और नीति-निर्माताओं के लिये उसके सार-तत्त्व की प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं:- 

  • रिपोर्ट पुष्टि करती है कि जलवायु परिवर्तन का कारण भयंकर उत्सर्जन है, जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो रहे है। इन दुष्प्रभावों को पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है। यहां तक कि कुल उत्सर्जन में सबसे कम हिस्से वाले विकासशील देशों में भी इसे महसूस किया जा रहा है। इन दुष्प्रभावों से तापमान बढ़ेगा और एक समय ऐसा आयेगा, जब वह ऊंचे स्तर पर जा पहंचेगा।
  • रिपोर्ट में इस पर जोर दिया गया है कि अनुकूलन की कार्रवाई करने की फौरन जरूरत है और इसी तरह जलवायु परिवर्तन में कमी लाने की भी बेहद जरूरत है।
  • नीति-निर्माताओं के लिये सार-तत्त्व (एसपीएम) में समानता और जलवायु न्याय के आधार पर कार्रवाई करने की जरूरत पर बल दिया गया है, ताकि मानवजाति और ग्रह का कल्याण सुनिश्चित हो सके।
  • जलवायु अनुकलून का विज्ञान इस बात को पूरी तरह मानता है कि समानता और जलवायु न्याय का बहुत महत्त्व है तथा यह कि भारत ने हमेशा इस दिशा में प्रयास किया है और वह पेरिस समझौते को वजूद में लाया है।
  • इसके अलावा एसपीएम पूरी तरह यह मानता है कि जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिये स्वदेशी और स्थानीय ज्ञान का बहुत महत्त्व है।
  • जोखिल वाले और सीमान्त समुदायों, क्षेत्रों और आबादी को बढ़ते खतरे का सामना है। एसपीएम मानता है कि विकास का अभाव तथा सामाजिक और आर्थिक असमानता के कारण यह जोखिम और बढ़ गया है।
  • रिपोर्ट दुनिया के लिये चेतावनी का संदेश है कि वे गैर-टिकाऊ उत्पादन और खपत को छोड़ दें तथा तेजी से जलवायु अनुकूल विकास की तरफ आगे बढ़ें। सतत जीवनशैली का उल्लेख पेरिस समझौते में शामिल किया गया है, जो भारत के प्रयासों का नतीजा है। प्रधानमंत्री ने 2015 में इसका नेतृत्व किया था।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुकूलन का प्रभाव और उसकी सीमायें पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री तापमान से अधिक हो जायेगी। भारत कार्य समूहI के एआर-6 में योगदान के जारी होने के मद्देनजर इस बात को मानता है कि उससे यह साफ हो गया है कि विकसित देशों को चाहिये कि वे अपना उत्सर्जन कम करें तथा 2050 तक उसे शून्य स्तर तक ले आयें।
  • वित्त का प्रावधान विकासशील देशों तथा जोखिम वाली आबादी के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके लिये फौरन और कारगर तरीके से काम करना होगा। सार्वजनिक वित्त अनुकूलन की क्षमता बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाता है।
  • जोखिम पैदा करने वाले गैर-जलवायु उत्प्रेरकों को कम करना जरूरी है, ताकि अनुकूलन को प्रोत्साहित किया जा सके। इससे जोखिम में कमी आ रही है। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की तेज प्रगति से अनुकूलन सम्बंधी क्षमता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।
  • रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है कि जलवायु अनुकूल विकास के मद्देनजर अनुकूलन और कमी के बीच संतुलन जरूरी है, जो राष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह देशों की अपनी क्षमता पर है, जिसमें विश्व उत्सर्जन में संसाधनों तथा पूर्व की हिस्सेदारी को शामिल किया गया है।
  • रिपोर्ट पूरी तरह यह मानती है कि जलवायु परिवर्तन से नुकसान और क्षति का बहुत महत्त्व है। वित्तीय और प्रौद्योगिकीय संसाधनों के अभाव, क्षमता-निर्माण की कमी और अन्य अड़चनों के कारण अपर्याप्त अनुकूलन होता है, जो नुकसान और हानि की तरफ ले जाता है। इसके अलावा नुकसान और हानि बढ़ जाती है, क्योंकि अनुकूलन कुछ हदों तक होने के बाद भी तापमान का उच्च स्तर बाकी रहता है।
  • वित्त की भारी कमी के कारण अनुकूलन को हानि होती है। जलवायु वित्त का एक छोटा हिस्सा ही इसके लिये निश्चित होता है, जबकि बड़ा हिस्सा कटौती करने पर लगा दिया जाता है।
  • इको-सिस्टम आधारित अनुकूलन और प्रकृति आधारित नजरिया, जैसे हरित अवसंरचना से कई लाभ होते हैं। इससे अनुकूलन और कटौती के बीच तालमेल बनता है। रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के मद्देनजर प्रकृति आधारित समाधानों की सीमाओं और संभावनाओं के बारे में कहा गया है। इन समाधानों को एकल या प्रमुख समाधान के रूप में प्रोत्साहित करने की बात कही गई है, जबकि मामला इससे जुड़ा हुआ नहीं है।
  • रिपोर्ट में कृषि की प्रमुख भूमिका को पहचाना गया है और अनुकूलन में खाद्य सुरक्षा को बहुत महत्त्व दिया गया है।
  • भारत को जलवायु खतरों के विभिन्न प्रकारों का सामना है और यहां जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर बहुत जोखिम है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि भावी जलवायु अनुकूल विकास मार्ग, जलवायु जोखिम, अनुकूलन उपायों और शेष कार्बन बजट पर निर्भर है।

भारत पहले ही जलवायु अनुकूल विकास पथ पर चल पड़ा है। इसके तहत अनेक अनुकूलन केंद्रित विकास गतिविधियां तथा उत्सर्जन कटौती में योगदान का काम हो रहा है। कॉप-26 में पेरिस समझौते पर कार्यान्वयन शुरू हुआ था। भारत ने अपने संकल्प को दोहराया था कि वह जलवायु परिवर्तन को लेकर कार्रवाई कर रहा है, जिसमें 2070 तक शून्य उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करना संकल्प शामिल है। उसने एक सूत्री मंत्र दिया था – एल.आई.एफ.ई = लाइफस्टाइल फॉप एनवॉयरेनमेंट।

भारत मानता है कि भावी रिपोर्टों को “सॉल्यूशन स्पेस” को मजबूत करना चाहिये और दक्षता, लागत तथा लाभों के बारे में समग्र ज्ञान की तरफ कदम बढ़ाने चाहिये।

भारत दृढ़ता से विश्वास करता है कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक सामूहिक कार्रवाई समस्या है, जिसे केवल अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा बहुपक्षीय आधार पर ही हल किया जा सकता है।

भारत की समग्र और प्रति व्यक्ति मौजूदा उत्सर्जन उल्लेखनीय रूप से कम है तथा विश्व कार्बन बजट में उसकी हिस्सेदारी से तो काफी नीचे है। इसके अलावा वैश्विक जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के उसके प्रयास पेरिस समझौते के लक्ष्यों के अनुकूल हैं।

 

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