“भवन्ति न भवन्ति च”-होना न होना बराबर है

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-गोविंद प्रसाद बहुगुणा
हमारे धार्मिक ग्रन्थ दिलचस्प मुहाबरों से भरे पड़े हैं , इसमें गपशप से लेकर गंभीर विषयों पर भी चर्चा देखने को मिलती है -अब पढ़ने वाले का जिस तरह का मूढ़ हो,उसी मनस्थिति में वह उसका अर्थ ग्रहण करता है।
श्रीमद्भागवत के एकादश स्कंध में दो मित्रों -श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच चल रही यह चर्चा है।

मुझे तो इस मुहाबरे ने मोहित किया है- “भवन्ति न भवन्ति च” अर्थात होकर भी आप नहीं हैं ऎसी स्थिति अक्सर परिवार में बूढ़े लोगों की ही होती है I लेकिन इस श्लोक में चतुराई से एक सन्देश भी दिया गया है कि भाई अब परिवार में ज्यादा दखल देना बन्द करो, ऐसा व्यवहार करो कि जहां आपको होना चाहिए,वहां होइए और जहां आपकी जरूरत महसूस नहीं होती वहां से आप gracefully withdraw कीजिये अथवा एसा व्यवहार करो कि मानो आप वहां हम होकर भी अनुपस्थित जैसे हो ।

लेकिन यह कहना तो सरल है पर असली व्यवहार में लाना कठिन है, हमारा ईगो आडे आ जाता है। भाषा के हर वाक्यांश में एक सत्य छिपा हुआ है।

इसी तरह जैसे कोई पडोसी पूछ ले कि-
बाबू जी घर पर हैं क्या? तो जब उनको यह जबाब सुनने को मिले कि- हाँ हैं,अरे नहीं हैं। तब समझ जाईये कि आप कहां हैं I
यह भी एक निरपेक्ष स्थिति है कि अगला आदमी समझदार है ,वह परतंत्र होकर भी स्वतंत्र है। चलिये अब मूल श्लोक को सुना देता हूं जहां से ये भाव उपजे हैं-
यथाजलधरा व्योम्नि भवन्ति न भवन्ति च।
ब्रह्मणीदं तथा विश्वमवयव्युदयाप्ययात्।।-
जिस तरह आकाश में बादल बनते हैं और तब अपने घटक तत्त्वों के मिश्रण तथा विलय के द्वारा इधर-उधर बिखर जाते हैं, उसी तरह यह भौतिक ब्रह्माण्ड, परब्रह्म के भीतर, अपने अवयव रूपी तत्त्वों के मिश्रण तथा विलय से, बनता और विनष्ट होता है।
यह दुनिया हर समय प्रलय और उत्पति से ग्रस्त है अतः यह कभी ब्रह्म होता है कभी नहीं जैसे आकाश में कभी मेघ छाये रहते हैं और कभी नहीं। बादलों की जब जरूरत होती है आ जाते हैं फिर उड़ जाते हैं, यह प्रकृति का नियम है।
इसी तरह एक भाव यह भी है –
“किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत I
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च II
-where is your choice to say yes or no -your likes and dislikes
उद्धव जब द्वैत नाम की कोई वस्तु ही नहीं है तब उसमें अमुक वस्तु भली है और अमुक बुरी ,अथवा इतनी भली है इतनी बुरी -यह प्रश्न ही नहीं उठता -विश्व की सभी वस्तुए वाणी से कही जा सकती हैं अथवा सिर्फ मन से ही सोची जा सकती है इसलिए दृश्य एवँ अनित्य होने के कारण उनका मिथ्यात्व तो स्पष्ट है ही ।

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