सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर 30 जुलाई को सुनवाई, बिहार मतदाता सूची संशोधन को मिली मंजूरी
नई दिल्ली, 14 जुलाई। देश में चुनाव व्यवस्था और निर्वाचन आयोग की भूमिका से जुड़े दो महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अहम घटनाक्रम दर्ज किए हैं। एक ओर मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई अब 30 जुलाई को होगी, वहीं दूसरी ओर अदालत ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-एसआईआर) को संवैधानिक और वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों की पुष्टि की है।
चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर 30 जुलाई को अगली सुनवाई
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि नया कानून चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है क्योंकि इसके तहत चुनाव आयुक्तों के चयन की समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इससे चयन प्रक्रिया पर कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ गया है।
मामले की सुनवाई पहले न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ के समक्ष हो रही थी, लेकिन उन्होंने 20 मार्च 2026 को स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। इसके बाद न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष अंतिम बहस शुरू हुई। 6 मई को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन तथा 7 मई को एडीआर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपनी दलीलें पूरी कीं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2023 के अपने पूर्व निर्णय में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति में शामिल करने की व्यवस्था केवल अंतरिम थी और तब तक के लिए थी, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती। अदालत ने कहा कि उसके पूर्व फैसले का अर्थ यह नहीं था कि संसद केवल उसी स्वरूप में कानून बनाने के लिए बाध्य है।
याचिका के मूल हस्ताक्षरकर्ता प्रो. जगदीप एस. छोकर के निधन के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नए हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति भी प्रदान की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि यदि चयन समिति में किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष सदस्य को शामिल नहीं किया जा रहा है, तो केवल विपक्ष के नेता को शामिल कर आयोग की स्वतंत्रता का “दिखावा” क्यों किया जा रहा है। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की नियुक्ति में आज भी मुख्य न्यायाधीश चयन समिति का हिस्सा होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई को इस मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई 2026 के लिए निर्धारित करते हुए कहा कि तब तक पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेश प्रभावी रहेंगे।
बिहार मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-एसआईआर) को वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों की पुष्टि की है।
एडीआर ने चुनाव आयोग के 24 जून 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत बिहार में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का निर्णय लिया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का अधिकार उसके संवैधानिक दायित्वों का हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने से आयोग की यह शक्ति समाप्त नहीं होती, बशर्ते वह प्रचलित कानूनों का उल्लंघन न करे।
अदालत ने माना कि विशेष गहन संशोधन का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, अद्यतन और पारदर्शी बनाना है। न्यायालय के अनुसार, इस प्रक्रिया में ऐसे पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान मौजूद हैं, जिनसे किसी पात्र मतदाता का नाम मनमाने ढंग से हटाए जाने की संभावना नहीं रहती।
सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर के उस तर्क को भी अस्वीकार कर दिया कि इस प्रक्रिया में नागरिकों पर स्वयं को पात्र सिद्ध करने का अनुचित बोझ डाला गया है। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में पहले से नाम दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी भविष्य में कभी जांच नहीं की जा सकती। यदि किसी व्यक्ति के संबंध में संदेह उत्पन्न होता है, तो उसे नोटिस देने और अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर उपलब्ध कराया जाता है।
नागरिकता और मतदाता सूची में अंतर स्पष्ट
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा की जाने वाली जांच केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज करने या हटाने तक सीमित है। यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो गई है। इसका केवल इतना अर्थ है कि वह संबंधित समय पर मतदाता सूची में शामिल रहने की निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं कर पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी मामले में नागरिकता का प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उसका अंतिम निर्णय केवल नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी ही करेगा। चुनाव आयोग स्वयं किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता।
इन दोनों मामलों को देश की चुनावी व्यवस्था, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता तथा मतदाता सूची की विश्वसनीयता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता पर अब सुप्रीम कोर्ट 30 जुलाई को आगे की सुनवाई करेगा, जबकि बिहार मतदाता सूची संशोधन संबंधी निर्णय भविष्य में अन्य राज्यों में भी चुनाव आयोग की कार्यवाही के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।
