पर्यावरण दिवस पर विशेष : पृथ्वी पर हमारी आवश्यकताओं के लिए तो काफी है, मगर हमारे लालच के लिए नहीं : गाँधी

Spread the love

 

-जयसिंह रावत
युग पुरुष महात्मा गांधी ने कभी भी अपने भाषणों या लेखों में पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख नहीं किया। शायद इसलिये भी कि उनके समय में पर्यावरण असन्तुलन से उपजी चिन्ताआं को मान्यता नहीं दी जाती थी। फिर भी वह पृथ्वी या प्रकृति के प्रति मानवीय आचरण से जिस तरह मानव समाज को आगाह करते थे वह उनकी अद्भुत दूरदृष्टि ही थी। उनका कालजयी वाक्यांश आज भी बार-बार दुहराया जाता है कि ‘‘हमारी आवश्यकता की पूर्ति के लिये इस पृथ्वी पर पर्याप्त संसाधन हैं मगर हमारे लालच के लिये नहीं हैं। इसलिये उन्हें विश्व का पहला पर्यावरणवादी कहा जाय तो उचित ही होगा। गांधी जी ने हिमालय के महत्व को भी उसी समय रेखांकित कर प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ न करने की नसीहत दे दी थी। पर्यावरण चेतना की अलख जगाने वाले चण्डी प्रसाद भट्ट और सुन्दरलाल बहुगुणा भी तो गांधी जी के अनुयायी ही तो हैं!


दुनियां ने गांधी को 67 साल बाद समझा
देखा जाय तो विश्व में पर्यावरण को लेकर हलचल तब शुरू हुयी जब विश्व विरादरी का ध्यान वढ़ते वैश्विक तापमान के खतरे की ओर गया। इस दिशा में विश्व के अनेक जागरूक राष्ट्र एकजुट होकर प्रयास करने को सहमत हुए। वर्ष 1972 में स्वीडन के शहर स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व का पहला अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें 119 देशों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यू.एन.ई.पी) का प्रारंभ ‘एक धरती’ के सिद्धांत को लेकर किया और एक ‘पर्यावरण संरक्षण का घोषणा पत्र’ तैयार किया जो ‘स्टाकहोम घोषणा’ के नाम से जाना जाता है। इसी समय, संपूर्ण विश्व में एक तिथि (5 जून) को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में मनाने की भी स्वीकृति हुई। दरअसल ये सम्मेलन गांधी द्वारा पर्यावरण और इसके प्रभावों के बारे में उठाई गई चिंताओं की तुलना में बहुत बाद में बुलाए गए थे। भारत में भी पर्यावरण की रक्षा के लिए चिपको जैसे प्रमुख आंदोलनों के प्रणेता चंडी प्रसाद भट्ट और उसे व्यापक प्रचार देने वाले सुंदर लाल बहुगुणा और बाबा आमटे तथा मेधा पाटकर ने गांधी से ही प्रेरणा ली। पर्यावरण, शहरीकरण और मशीनीकरण के बारे में गांधी की चिंता उनके भाषणों, लेखन और श्रमिकों के लिए उनके संदेशों में स्पष्ट थी। यह ध्यान देने योग्य है कि वह दृष्टि और व्यवहार में दुनिया के शुरुआती पर्यावरणविद् थे। चण्डी प्रसाद भट्ट और सुन्दर लाल बहुगुणा को भी गांधीवाद ने ही तो प्रेरित किया था।


गांधी जी ने 1905 में धरती की चिन्ता प्रकट की थी

गांधी ने आधुनिक पर्यावरणविद्ों से बहुत पहले दुनिया को बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की समस्याओं के बारे में आगाह किया था। गांधी ने कल्पना की थी कि मशीनीकरण से न केवल औद्योगीकरण, बड़े पैमाने पर शहरीकरण, बेरोजगारी होगी, बल्कि पर्यावरण का विनाश भी होगा। एक सदी पूर्व 1909 में लिखी गई उनकी पुस्तक, ‘‘हिंद स्वराज’’ ने पर्यावरण के विनाश और ग्रह के लिए खतरे के रूप में दुनिया के सामने आने वाले खतरों की चेतावनी दी थी। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में, गांधी पर्यावरण प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य के लिए इसके परिणामों से पूरी तरह अवगत थे। वह विशेष रूप से उद्योग में काम करने की भयावह परिस्थितियों के बारे में चिंतित थे, जिसमें श्रमिकों को दूषित, जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्होंने 5 मई, 1906 को इंडियन ओपिनियन में उन चिंताओं को व्यक्त किया और कहा था कि ‘‘‘आजकल, खुली हवा की आवश्यकता के बारे में प्रबुद्ध लोगों में सराहना बढ़ रही है।’’


कहा था पृथ्वी पर हमारे लिये काफी मगर हमारे लालच के लिये नहीं

गांधीजी का दृष्टिकोण, पर्यावरण के प्रति व्यापक था। उन्होने देशवासियों से, तकनीकों के अन्धानुकरण के विरुद्ध, जागरूक होने का आवाहन किया था। उनका मानना था कि पश्चिम के जीवन स्तर की नकल करने से, पर्यावरण का संकट पनप सकता है। कहते थे कि यदि विश्व के अन्य देश भी आधुनिक तकनीकों के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करेंगे तो पृथ्वी के संसाधन नष्ट हो जायेंगे। इसीलिये उन्होंने कहा था कि पृथ्वी पर मानव की अवश्यकता पूर्ति के लिये पर्याप्त संसाधन हैं मगर उसकी हवश के लिये नहीं। मतलब यह कि पकृति के साथ जीना सीखों और उसके साथ बेजा छेड़छाड़ मत करो। गांधी जी का मानना था कि पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियाँ नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहरें हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा। वन्य जीवन, वनों में कम हो रहा है किन्तु वह शहरों में बढ़ रहा है। 1909 की शुरुआत में ही उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘हिंद स्वराज’’ में मानव जाति को अप्रतिबंधित उद्योगवाद और भौतिकवाद के प्रति आगाह किया था। वह नहीं चाहते थे कि भारत इस संबंध में पश्चिम का अनुसरण करे और चेतावनी दी कि यदि भारत अपनी विशाल आबादी के साथ पश्चिम की नकल करने की कोशिश करता है पृथ्वी के संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे। उन्होंने 1909 में भी तर्क दिया कि औद्योगीकरण और मशीनों का लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि वह मशीनों के विरोध में नहीं थे। उन्होंने निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर मशीनरी के उपयोग का विरोध किया। उन्होंने नदियों और अन्य जल निकायों को प्रदूषित करने के लिए लोगों की आलोचना की। उन्होंने धुएं और शोर से हवा को प्रदूषित करने के लिए मिलों और कारखानों की आलोचना की।

हिमालय की पर्यावरणीय सेवा से अविभूत थे गांधी जी

आज हिमालय पर्यावरणीय चिन्ताओं का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। वह इसलिये कि पर्वतराज न केवल गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी सदानीराओं का श्रोत है बल्कि ऐशि का मौसम नियंत्रक भी है और जैव विविधता का भण्डार भी है लेकिन मानवीय छेडछाड़ के कारण हिमालय पर 2013 की जैसी केदारनाथ जल प्रलय और 2021 की ऋषिगंगा-धौलीगंगा की बाढ़ आ रही हैं। मानव जीवन असुरक्षित हो गया और मौसम चक्र के बदलने से अनेक समस्याएं खड़ी हो गयी हैं। गांधी जी ने जून 1921 में उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा प्रवास के दौरान अपनी डायरी में हिमालय के विराट स्वरूप के साथ ही मानव जीवन के लिये उसकी उपयोगिता का इस तरह बहुत ही सटीक वर्णन किसा है, ‘‘यदि हिमालय न होता तो गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र औ सिन्धु भी न हों ; हिमालय न हो तो ये नदियां न हों, न वर्षा हो और वर्षा न हो तो भारत रेगिस्तान या सहारा की मरुभूमि बन जाय। इस बात को जानने वाले और सदैव हर बात के लिये सदैव ईश्वर का उपकार मानने वाले हमारे दीर्घदर्शी पूर्वजों ने हिमालय को यात्रा धाम बना दिया था।


हरिद्वार और बारणसी की मलिनता से बहुत दुखी थे

स्वच्छता भी पर्यावरण का ही हिस्सा है और गंाधी जी स्वच्छता के प्रति अतिरिक्त रूप से जागरूक थे। खास कर हरिद्वार और बाराणसी में गंन्दगी से बहुत दुखी थे। गांधी जी जब 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद 5 अप्रैल को कुंभ के अवसर पर मुन्शीराम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो गंगा की गंदगी को देख कर उन्हें बड़ा कष्ट हुआ। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि…. ‘‘ऋषिकेश और लक्ष्मण झूले के प्राकृतिक दृष्य मुझे बहुत पसन्द आये। ………परन्तु हरद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गन्दा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुये उन्हें कुछ संकोच न होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देख कर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची……..। गांधी जी ने काशी विश्वनाथ की गंदगी पर कुछ यूं टिप्पणी की थी, ……मैं इसके बाद भी एक दो बार काशी विश्वनाथ गया।…….किन्तु गन्दगी और हो-हल्ला जैसे के तैसे ही वहां देखे।….’’ हरिद्वार के बारे में उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि …….पहली बार जब 1915 में मैं हरद्वार गया था तो मैं सहज ही बहुतेरी बातें आखों देख सका था ……. लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदली की जाती है। गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिये ध्यान लगा कर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुये असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं। तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है। …………..यह तो हुयी प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!