प्रवासी भारतीयों ने तय किया एक लंबा सफर

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In colonial times racial discrimination was instituted as a state policy by the colonial government. But the de-colonization brought in its wake another set of problems. In Gandhi’s lifetime itself the Indians in Ceylon (Sri Lanka) and Burma (Myanmar) entered a critical phase with the Ceylonese and Burmese populations respectively wanting to get rid of them. The first two legislations passed by the D.S. Senanayake government in independent Ceylon deprived almost a million people of Indian origin of their citizenship. While Indians might have captured power in Mauritius, they have been reduced to a minuscule minority in Myanmar. Thus Indians face a new kind of racialism in those erstwhile colonies.

– प्रियदर्शी दत्ता

 पोखरण द्वितीय के बाद जब भारत प्रतिबंधों से जूझ रहा था ऐसे में 1998 में उभरते हुए भारत के प्रति अपने संबंधों में मजबूत विश्वास दिखाया। उदारीकरण के वातावरण के बाद भारतीय मूल के समुदाय अपने देश के साथ जुड़ने को तैयार थे। भारत के एक सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता केन्‍द्र तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और परमाणु शक्ति के रूप में उभरने से प्रवासी भारतीयों में अत्‍यधिक आत्‍मविश्‍वास जगा दिया था। यह खेल के मैदान से व्यापार सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों जैसे विभिन्‍न स्‍थलों पर दिखाई भी दिया। अगस्‍त 2000 में गठित एक उच्‍च स्‍तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर इसे 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस अथवा ओवरसीज इंडियन के रूप में अपनाया गया।

प्रवासी भारतीयों की चिंताएं भारतीय नेतृत्व के मस्‍तिष्‍क में लंबे समय से थीं। ब्रिटेन  में हाऊस ऑफ कॉमन्‍स पर 1841 की शुरूआत में जितना शीघ्र हो सके मॉरीशस में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों की दयनीय हालत की जांच के लिए दबाब डाला गया था। यह ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी उन्मूलन (1833) के बाद अनुबंधित व्‍यवस्‍था की शुरुआत के कुछ वर्ष के भीतर हुआ था। इसी तरह से 1894 में कांग्रेस के मद्रास सत्र में दक्षिण अफ्रीकी उपनिवेशों में भारतीयों के मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया गया था। कांग्रेस  ने पूना (1895) कोलकाता (1896) मद्रास (1898) लाहौर (1900) कोलकाता (1901) और अहमदाबाद (1902) सत्रों में भी इसी तरह के प्रस्तावों को अपनाया। उन दिनों में प्रवासी भारतीयों से अभिप्राय अधिकांश दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में भारतीयों से संबंधित था। इन्‍होंने स्थानीय ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके अधिकारों के अतिक्रमण के खिलाफ कई संघर्ष आरंभ किए थे। गांधी-स्मट्स समझौता 1914 उनके लिए एक बड़ी जीत का द्योतक है।

दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बर्मा, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड इत्यादि में प्रवासी भारतीय काफी संख्या में थे। इनमें से कइ 1940 के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज में स्वयंसेवक रहे और साथ ही फंडिंग का भी इंतजाम किया। मलेशिया में जन्मी तमिल मूल की युवा लड़कियों की कहानियां भी है जिन्होंने बंदूक उठाकर कंधे से कंधा मिलाते हुए उस भारत की आजादी की लड़ाई करने का फैसला किया जिसे उन्होंने कभी देखा भी नहीं था।

प्रवासी भारतीय दिवस से महात्मा गांधी के 9 जनवरी 1915 को भारत आगमन की यादें भी ताजा होती हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए 21 साल तक लड़ाइयां लड़ी। उनके अहिंसक प्रतिरोध का रूप, जिसे उन्होंने सत्याग्रह नाम दिया, उसे लागू तो भारत में किया लेकिन उसका विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। गांधी के समय के औपनिवेशिक विश्व में प्रवासी भारतीयों की स्थिति आज की स्थिति से बेहद अलग थी। वो ऐसे दिन थे जब विदेश जाना ये विदेश में बसने को प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था। विदेश जाने वाले ज्यादातर भारतीय फैक्ट्रियों में मजदूरी और खेती से जुड़े कार्यों में मजदूर के लिए पट्टे पर (अफ्रीका, वेस्टइंडीज, फिजी, श्रीलंका, बर्मा इत्यादि देशों में) ले जाए जाते थे। लेकिन हिंदू समाज में समुद्री यात्रा निशेध जैसे मध्यकालीन मान्यताओं को बदलने का श्रेय उन्हीं लोगो को जाता है।

औपनिवेशिक काल में नस्लभेद को औपनिवेशिक सरकारों ने राज्य की नीति की तरह स्थापित किया था। लेकिन औपनिवेशिक काल के खात्मे के बाद भी कई दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हुई। गांधी के जीवनकाल के दौरान ही सिलॉन (श्रीलंका) और बर्मा (म्यांमार) में भारतीयों और वहां के स्थानीय लोगों के बीच तकरार होने लगी और सिलॉन और बर्मा के लोग भारतीयों से दूरी चाहने लगे।

डीएस सेनानायके की सरकार द्वारा पारित शुरुआती 2 प्रस्ताव में ही आजाद सिलॉन के करीब 10 लाख भारतीय मूल के नागरिकों को वहां की नागरिकता से महरूम कर दिया। हालांकि मॉरिसस में भारतीयों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत कर ली लेकिन म्यांमार में अल्पसंख्यक बना दिए गए। इस तरह के देशों में भारतीयों को एक नए तरह के नस्लवाद का शिकार होना पड़ा।

औपनिवेशिक काल समुद्री प्रभुत्व का काल भी था। 1950 के आखिर तक पानी के जहाज ही महाद्वीपों के बीच आने जाने का सबसे भरोसेमंद साधन थे। 1960 की शुरुआत में हवाई जहाज ने लंबी दूरी के लिए पसंदीदा आवागमन के साधन के रूप में पानी के जहाज की जगह ले ली। भारत से प्रवास के स्वरूप को देखें तो मानव संसाधन की दक्षता और भारत से आवागमन पर इसकी छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। संयोग से करीब उसी समय अमेरिका में पारित हुए अप्रवास और राष्ट्रीयता कानून, 1965 ने कौशल संपन्न पेशेवरों और छात्रों के प्रवास की राह आसान कर दी। इस ऐतिहासिक कानून ने भारतीय प्रवासी समुदाय की संख्या और साख को बदलकर रख दिया। 1960 में जहां 12000 भारतीय अमेरिका में रहते थे वही आज उनकी संख्या 25 लाख हो चुकी है। ये पढ़े लिखे और सफल प्रवासी भारतीय दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों को भी राह दिखा रहे हैं।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। जब भारत कमजोर विकास दर से जकड़ा हुआ था उस समय यहां के नागरिक विदेशों में अपनी भारतीय पहचान को उजागर होने देना नहीं चाहते थे। भारत में भी अप्रवासी भारतीयों को भगोड़े की तरह देखा जाता था। लेकिन उदारीकरण के बाद विकास दर में तेजी, आईटी पॉवर हब के रूप में भारत का उदय और वाजपेयी सरकार की विकास नीतियों ने मिलकर प्रवासी भारतीयों का हौसला बढ़ाया। सैटेलाइट टीवी, इंटरनेट के आगमन और उसके बाद 1990 के दशक में घर-घर में टीवी की पहुंच के बाद विदेशों में बसे भारतीयों को लगातार अपने देश से संपर्क का साधन मिल गया। अब प्रवासी भारतीयों के लिए भी अपनी जन्मभूमि के हित के बारे में सोचना संभव हो गया। भारतीय और अप्रवासी भारतीय मिलकर देश को दुनिया में ऊंचा स्थान दिलाने के बारे में सोच सकते हैं। इससे नए ‘वैश्विक भारतीय’ की अवधारणा को बल मिला और इसी नाम के साथ कंचन बनर्जी ने 2008 में बोस्टन में एक मैगजीन भी शुरू की।

लेकिन अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय समुदाय को नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता और कानूनी भेदभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई मोर्चों पर अभी सफलता मिलनी बाकी है। ऐसे में महात्मा गांधी के 1890 में दक्षिण अफ्रीका में शुरू किए गए संघर्ष की लौ बुझने नहीं देनी है।

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