सिकुड़ती बाहरी दुनिया और बदलती सामाजिक व्यवस्था

-देवेंद्र कुमार बुडाकोटी-
छोटे बच्चों और किशोरों के माता-पिता आजकल मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग को लेकर विशेष रूप से चिंतित हैं। आज की पीढ़ी के बच्चे मानो चौबीसों घंटे मोबाइल फोन से चिपके रहते हैं।
एक दिन मैंने किशोर पद्हानी से पूछा कि वह हर समय मोबाइल फोन में ही क्यों व्यस्त रहता है। उसने पलटकर सहजता से कहा, “तो फिर मैं क्या करूँ?”
उसका यह उत्तर मुझे सोचने पर मजबूर कर गया। जब मैंने इस विषय पर गंभीरता से विचार किया, तो महसूस हुआ कि केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि बड़े-बूढ़े भी आज मोबाइल फोन के प्रति उतने ही आसक्त हो चुके हैं। फिर आखिर नई पीढ़ी के बच्चों और किशोरों के मोबाइल उपयोग को लेकर ही इतनी चिंता क्यों व्यक्त की जाती है?
यदि मोबाइल फोन का यह अत्यधिक उपयोग वास्तव में अनुचित है, तो क्या हमारे पास इसका कोई व्यवहारिक समाधान भी है?
देहरादून की शिक्षाविद् सुश्री सोनाली वर्मा का मानना है कि, “मोबाइल फोन का बढ़ता हुआ अत्यधिक उपयोग परिवारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है। मेरी दृष्टि में इस समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध लगाने से नहीं हो सकता। इसके लिए जागरूक प्रयासों की आवश्यकता है और सबसे महत्वपूर्ण है कि माता–पिता स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करें। यही सिद्धांत मैं अपने जीवन और अपने बच्चों के साथ अपनाने का प्रयास करती हूँ। अपने विद्यालय के अभिभावकों तक भी यह संदेश पहुँचाना मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण विषयों में से एक है।“
वे आगे कहती हैं कि बच्चे उपदेशों से अधिक अपने माता-पिता के व्यवहार से सीखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं हर समय मोबाइल फोन में व्यस्त रहेंगे, तो वे अपने बच्चों से स्वस्थ डिजिटल आदतों की अपेक्षा नहीं कर सकते। आत्म-अनुशासन की शुरुआत बड़ों से होती है। उन्हें भोजन के समय, पारिवारिक बातचीत और साथ बिताए जाने वाले समय में मोबाइल फोन को अलग रखना चाहिए तथा बच्चों को पूरा समय और ध्यान देना चाहिए। हालांकि, यह भी सच है कि व्यक्ति केवल अपने व्यवहार पर ही नियंत्रण रख सकता है।
उत्तराखंड के एक सरकारी महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक डॉ. परितोष उप्रेती का कहना है, “बच्चे ही नहीं, बल्कि वयस्क भी मोबाइल फोन पर अधिक समय बिताने के कई कारण हैं। मोबाइल फोन इस तरह बनाए गए हैं कि वे लगातार आकर्षित करते रहें। अंतहीन वीडियो, खेल और लगातार आने वाली सूचनाएँ लोगों को उनमें व्यस्त बनाए रखती हैं।“
वे बताते हैं कि आज वास्तविक दुनिया की अनेक गतिविधियाँ पहले की तुलना में कम सुलभ हो गई हैं। सुरक्षित खुले मैदानों की संख्या घट रही है, माता-पिता अधिक व्यस्त रहते हैं और मित्रों के साथ समय बिताने के अवसर भी कम हो गए हैं।
उनके अनुसार, वयस्क स्वयं भी वही व्यवहार करते हैं। यदि माता-पिता लगातार मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, तो बच्चों के लिए यह स्वाभाविक व्यवहार बन जाता है।
इसलिए जब कोई बच्चा पूछता है, “मैं इसके बजाय क्या करूँ?”, तो सबसे ईमानदार उत्तर यही होगा—“आओ, हम साथ मिलकर कुछ सार्थक करें।“ बच्चे केवल यह कह देने से स्क्रीन नहीं छोड़ते कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, बल्कि तब छोड़ते हैं जब उन्हें उससे अधिक रोचक और सार्थक विकल्प मिलता है।
इस दृष्टि से मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग केवल बच्चों की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है। इसका समाधान नई पीढ़ी को दोष देने में नहीं, बल्कि अपनी जीवनशैली और सामाजिक वातावरण को बदलने में निहित है।
श्री तुलाराम शर्मा का भी मानना है कि सबसे पहले माता-पिता को स्वयं मोबाइल फोन से दूरी बनानी चाहिए और जहाँ तक संभव हो, अपने बच्चों के साथ अधिक समय बिताना चाहिए।
वास्तव में घर और मोहल्ले के बाहर उपलब्ध भौतिक तथा सामाजिक स्थानों के लगातार सिकुड़ने से आभासी दुनिया के विस्तार को बढ़ावा मिला है। पहले बुज़ुर्ग और बच्चे अपना खाली समय खुले मैदानों में दौड़ने, खेलने, विद्यालय के मैदानों तथा आसपास के खुले स्थानों पर मित्रों से मिलने, बातचीत करने और सामाजिक मेलजोल में बिताते थे। आज की पीढ़ी ने इन गतिविधियों का स्थान ऑनलाइन खेलों, मोबाइल एप्लिकेशन और विभिन्न डिजिटल मंचों के माध्यम से होने वाली बातचीत से भर दिया है।
ऑनलाइन शिक्षा, विपणन, खरीदारी, व्यापार, मनोरंजन और डिजिटल सामाजिक संपर्क का तेजी से बढ़ता दायरा यह संकेत देता है कि भविष्य में सामुदायिक जीवन और प्रत्यक्ष सामाजिक संबंध इतिहास की बात बन सकते हैं।
मल्टीमीडिया और दूरसंचार तकनीक के विकास के कारण आज बुज़ुर्ग भी मोबाइल फोन और इंटरनेट के उपयोग के आदी होते जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का बढ़ता प्रभाव हमारे भौतिक और सामाजिक संसार को और अधिक सीमित कर सकता है।
क्या भविष्य की ये तकनीकें हमारी सोचने-समझने की क्षमता को भी प्रभावित करेंगी? क्या इनके कारण परिवार, रिश्तेदारी और सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन आएगा? क्या हम आने वाले सामाजिक बदलावों के प्रति सचमुच चिंतित हैं, या फिर हम केवल “फ्यूचर शॉक“ (भविष्य के तीव्र परिवर्तनों से उत्पन्न मानसिक असहजता) से भयभीत हैं?
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लेखक समाजशास्त्री हैं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं तथा उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।
