समान नागरिक संहिता – कैसी सरकार, जो अपने ही लोगों को भड़का रही है ?

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-जयसिंह रावत
हिन्दुओं के लिये 1555 में हिन्दू विवाह अधिनियम और 1956 में उत्तराधिकार, दत्तक तथा भरण पोषण और गार्जियनशिप अधिनियम बन चुके हैं, जिनमें संशोधन की बहुत ही कम गुजाइश है। जबकि मुसलमानों के लिये नागरिक कानून (शरियत) 1937 से और इसाइयों को 1872 से इस देश में चल रहा है। उत्तराखण्ड में हिन्दू आबादी 82 और मस्लिम आबादी 14 प्रतिशत हैख् जबकि इसाई आबादी मात्र 38 हजार के आसपास है। धामी सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञों की समिति प्रदेशवासियों से पूछ रही है कि आपको कैसी समान नागरिक संहिता चाहिये? जाहिर है कि 82 प्रतिशत आबादी, जिसके पास अपने कानून पहले से हैं, वह क्यों चाहेगी कि मुसलमानों, इसाइयों और पारसियों वैयक्तिक मामलों में कोई छूट मिले?जब स्वयं सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को वैयक्तिक कानूनों की जानकारी न हो तो आम नागरिक से ऐसी अपेक्षा करना अपने आप में एक मजाक ही है या फिर इसमें राजनीतिक चाल ही है। इसमें चालाकी ज्यादा नजर आ रही है। चालाकी भी 82 प्रतिशत आबादी के अंदर धार्मिक भावनाएं उकसा कर कुर्सी बचाने और भविष्य के लिये वोट सुरक्षित करने की है। खेद का विषय तो यह है कि समान नागरिक संहिता के लिये जो विशेषज्ञ समिति बनायी गयी है वह धामी सरकार के इशारों पर नाच रही है जबकि उसमें दो लोग न्यायिक पृष्ठभूमि के हैं जिनसे हर नागरिक को न्याय की अपेक्षा रही है।


भीड़ से कानूनी ज्ञान ले रही है विशेषज्ञ समिति

यह कैसी विशेषज्ञ समिति है जो अपनी राय सरकार को देने के बजाय जनता से विशेषज्ञ राय पूछ रही है। यह समिति विशेषज्ञ राय देने के बजाय समान नागरिक संहिता पर जनमत संग्रह करा रही है! जनमत संग्रह के पीछे भी साम्प्रदायिक ‘‘मोटिफ’’ नजर आ रहा है। अगर समिति ने जनता से ही संविधान और विधि शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना था तो यह काम स्वयं राज्य सरकार का विधि विभाग कर सकता था। विशेषज्ञों की समिति कानून बनाने का ज्ञान भीड़ से ले रही है, जबकि कानून की भाषा में भीड़ के व्यवहार को क्या कहा जाता है, यह सर्वविदित है।

सरकार जो अपने लोगों में असन्तोष भड़का रही है

उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता के पीछे साम्प्रदायिक ऐजेण्डे के अलावा कुछ भी नहीं है, क्योंकि प्रदेश की 82 प्रतिशत जनता हिन्दू है जिसके पास अपनी नागरिक संहिता है और वह अपने कानूनों से संन्तुष्ट है। जो सन्तुष्ट नहीं हैं उनकी असन्तुष्टि का कारण दूसरे धर्म के लोगों को उनकी सांस्कृतिक परम्पराओं के अनुसार शादी-ब्याह जैसे कानूनों में मिली छूट है। उत्तराखण्ड में सरकार स्वयं ही सन्तुष्ट लोगों में असन्तोष भर रही है। नजता के दिलों में डाह पैदा कर रही है। लगता है कि उत्तराखण्ड की सरकार डाह की इस चिंगारी को दावानल में बदलना चाहती है। ताकि कुर्सी बची रहे और आगे भी साम्प्रदायिक बहुमत के आधार पर वोट बैंक सुरक्षित रहे। घोटाला प्रदेश बन चुके इस प्रदेश को लोकायुक्त की सख्त जरूरत है, लेकिन 100 दिन के वायदे के बावजूद सरकार ने डर के मारे लोकायुक्त को विधानसभा में छिपा दिया और जिसकी उत्तराखण्ड में जरूरत ही नहीं उस समान नागरिक संहिता का फ्रंट खोल दिया।


कुर्सी के लिये नागरिक संहिता की ढाल

लगता है कि प्रदेश में भर्ती घोटालों के कारण युवाओं में भड़के असंतोष पर साम्प्रदायिकता के अग्निश्मन से पानी फेरने और जनाक्रोश की आड़ में शुरू हुये सत्ता संघर्ष को विफल करने के लिये समान नागरिक संहिता की ढाल उठाई जा रही है। इस ढाल को 2024 के लोकसभा चुनाव के लिये वोटों की चाबी साबित कर अपनी कुर्सी बचाने का उपक्रम भी माना जा रहा है। क्योंकि विधानसभा अध्यक्षों के अलावा राज्य के मंत्रियों के नाम भी भर्ती घोटालों में आ रहे हैं। आंच मुख्यमंत्री कार्यालय तक जा रही है और त्रिवेन्द्र सिंह रावत जैसे दमदार नेता सारा कच्चा चिðा पार्टी अध्यक्ष नड्ढा और प्रधानमंत्री मोदी के आगे खोल चुके हैं। प्रदेश में सत्ताधारी दल के ही कुछ गुट सरकार के नेतृत्व परिवर्तन की मुहिम में जुट गये हैं।

रोड़े ही रोड़े हैं समान नागरिक संहिता के आगे

जहां तक समान नागरिक संहिता का सवाल है तो राज्य में उसे लागू करना उतना आसान नहीं है जितना मुख्यमंत्री निरन्तर दावा कर रहे हैं। पहले से प्रस्तावित संहिता के मार्ग में संविधान के अनुच्छेद 254 का रोड़ा है और अगर किसी तरह उसे पार कर भी दिया तो फिर संविधान का अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक इसके आगे ऐसी दीवार है जिसे पार करना संसद के लिये अगर आसान होता तो सारे भारत में समान आचार संहिता 2014 में मोदी राज आने के बाद कभी भी लागू हो जाती।

संविधान का अनुच्छेद 254 सबसे बड़ा बाधक

संविधान का अनुच्छेद 254 कहता है कि, ’’यदि किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबंध संसद द्वारा बनाई गई विधि के, जिसे अधिनियमित करने के लिए संसद सक्षम है, किसी उपबंध के या समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में विद्यमान विधि के किसी उपबंध के विरुद्ध है तो खंड (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, संसद द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह ऐसे राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की गई हो, या विद्यमान विधि, अभिभावी होगी और उस राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी।’’ इस अनुच्छेद की उपधारा 2 में समवर्ती सूची के विषय में राष्ट्रपति से अनुमति लेने का प्रावधान अवश्य है, मगर उस स्थिति में भी राज्य का कानून केन्द्रीय कानून के असंगत नहीं होना चाहिये।

मोदी सरकार द्वारा गठित विधि आयोग ठुकरा चुका था विचार को

नागरिक संहिताओं में आनन्दा विवाह अधिनियम 1917, मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937, विशेष विवाह अधिनियम 1954, हिन्दू विवाह अधिनियम 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिन्दू अल्पवयस्क तथा अभिभावक अधिनियम (1956) और पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम 1936 आदि हैं। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम जैन और बौद्धों पर भी लागू होता है। ये सारे अधिनियम केन्द्रीय कानून हैं जिन्हें संसद ही बदल या समाप्त कर सकती है। इन सभी कानूनों के होते हुये राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानून शून्य हो जाता है। इसलिये अगर समान नागरिक संहिता लागू करनी ही है तो इसकी शुरुआत संसद द्वारा मौजूदा कानूनों में संशोधन या उन्हें समाप्त करने से हो सकती है। इसका प्रयास मोदी सरकार जस्टिस चौहान की अध्यक्षता वाले 21वें विधि आयोग के माध्यम से कर चुकी है। अगस्त 2018 में, विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा था कि देश में एक समान नागरिक संहिता आज की स्थिति में न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है। इसने यह भी कहा था कि ‘‘धर्म निरपेक्षता बहुलता के विपरीत नहीं हो सकती।’’

उत्तराखण्ड सरकार के लिये अनुच्छदे 25 पार करना असंभव

देखा जाय तो समान नागरिक संहिता के मार्ग में दो मौलिक अधिकारों का टकराव आड़े आता रहा है। इनमें संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि, ‘‘राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के सामान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।’’ इसी मौलिक अधिकार के अधार पर संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि ‘‘ राज्य अपने नागरिकों के लिए भारत के पूरे क्षेत्र में एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) प्रदान करने का प्रयास करेगा।’’ राज्य शब्द की व्याख्या अनुच्छेद 12 में की गयी है जिसका अभिप्राय भारत और राज्य क्षेत्र के शासन से है न कि केवल किसी राज्य सरकार से।

संविधान की भावना कोे संसद भी नहीं बदल सकती

दूसरी तरफ अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि ‘‘सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।’’ वैयक्तिक कानून इस मौलिक अधिकार से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है। अगर सभी धर्मों के लगभग एक दर्जन वैयक्तिक कानूनों को समाप्त कर एक समान कानून बनता है तो मामला सीधे अदालत में जायेगा और केशवानन्द भारती बनाम केरल सरकार मामले में सर्वोंच्च न्यायालय की 13 सदस्यीय संविधान पीठ 1973 में कह चुकी है कि संसद के पास कानून बनाने के व्यापक अधिकार अवश्य हैं मगर असीमित अधिकार नहीं हैं। संविधान पीठ उस समय स्पष्ट कर चुकी थी कि संसद संविधान में अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन अवश्य कर सकती है मगर संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं कर सकती। इसलिये उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता बनाने का प्रयास चाहे किसी भी दिशा से आगे बढ़ मगर मंजिल तक पहुंचता नजर नहीं आता है।

 

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