अब बेकार जाती गर्मी से बन सकेगी बिजली, भारतीय वैज्ञानिकों की नई खोज

In crystalline materials, heat is conventionally understood to be transported by particle-like phonons, with phonon mean free path (MFP) typically much larger than the interatomic distance. In contrast, strong disorder and anharmonicity (phenomenon in which atomic vibrations become asymmetric and deviate significantly from normal parabolic behaviour, disrupting propagation of heat) in glasses reduce the MFP to nearly the interatomic length scale, suppressing conventional phonon propagation.
एक खास क्रिस्टल में गर्मी के बहने का मिला अनोखा तरीका, कारखानों से डेटा सेंटर तक बदल सकती है ऊर्जा बचत की तस्वीर
BY- JYOTI RAWAT
किसी कारखाने की चिमनी, बिजलीघर, कार के इंजन या बड़े डेटा सेंटर से निकलती गर्मी को हम आमतौर पर बेकार समझते हैं। लेकिन कल्पना कीजिए कि इसी गर्मी के एक हिस्से को पकड़कर सीधे बिजली में बदला जा सके। दुनिया लंबे समय से इस दिशा में काम कर रही है और अब भारतीय वैज्ञानिकों की एक खोज ने इस संभावना को और मजबूत किया है।
वैज्ञानिकों ने एक विशेष क्रिस्टलीय पदार्थ में गर्मी के चलने का ऐसा असामान्य तरीका खोजा है, जो भविष्य में अपशिष्ट ऊष्मा यानी बेकार जा रही गर्मी से बिजली बनाने वाली तकनीक को अधिक कारगर बनाने में मदद कर सकता है।
यह पदार्थ थैलियम कॉपर सेलेनाइड है, जिसका रासायनिक सूत्र TlCu5Se3 है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके भीतर गर्मी सामान्य ठोस पदार्थों की तरह केवल कणों के रूप में नहीं चलती, बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा तरंगों जैसे व्यवहार के माध्यम से आगे बढ़ता है। यही असामान्य गुण इसे ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बनाता है।
आखिर गर्मी से बिजली कैसे बनेगी?
हमारे आसपास इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अंततः गर्मी बनकर वातावरण में चला जाता है। बिजलीघर हों, इस्पात और सीमेंट कारखाने हों या वाहन—मशीनें काम करते समय बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा करती हैं। कंप्यूटर सर्वर और डेटा सेंटर भी लगातार गर्मी पैदा करते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए अलग से ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।
यदि ऐसी बेकार गर्मी के कुछ हिस्से को बिजली में बदला जा सके तो एक ही ऊर्जा का अधिक उपयोग संभव होगा। इसके लिए वैज्ञानिक ‘थर्मोइलेक्ट्रिक’ पदार्थों पर काम करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो ऐसे पदार्थ अपने दोनों सिरों के बीच तापमान का अंतर होने पर बिजली पैदा कर सकते हैं।
लेकिन समस्या यह है कि एक अच्छा थर्मोइलेक्ट्रिक पदार्थ ऐसा होना चाहिए जो बिजली को अच्छी तरह आगे बढ़ाए, पर गर्मी को आसानी से आर-पार न जाने दे। यही संतुलन हासिल करना कठिन रहा है।
नए अध्ययन में सामने आया TlCu5Se3 इसी कारण वैज्ञानिकों के लिए दिलचस्प है।
क्रिस्टल के भीतर गर्मी ने बदला अपना ‘रास्ता’
आमतौर पर किसी क्रिस्टलीय ठोस में गर्मी परमाणुओं के कंपन के जरिए आगे बढ़ती है। वैज्ञानिक इन कंपन से जुड़ी ऊर्जा को ‘फोनॉन’ कहते हैं। इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है जैसे एक कतार में खड़े लोग एक-दूसरे को धक्का देते हुए गति आगे पहुंचा रहे हों।
लेकिन इस नए पदार्थ में कहानी कुछ अलग है।
इसकी आंतरिक संरचना इतनी जटिल है कि कॉपर के परमाणु स्वतंत्र रूप से लंबी दूरी तक नहीं घूम पाते। उनकी गति सीमित क्षेत्र में रहती है। इसी वजह से क्रिस्टल के भीतर असामान्य कंपन पैदा होते हैं और गर्मी के सामान्य प्रवाह में बाधा आती है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसी स्थिति में गर्मी केवल पारंपरिक कण-जैसे फोनॉन के जरिए नहीं चलती, बल्कि अलग-अलग कंपन अवस्थाओं के बीच तरंग-जैसी संबद्धता के माध्यम से भी आगे बढ़ती है।
यही गुण पदार्थ की तापीय चालकता को बेहद कम कर देता है

कम गर्मी गुजरना क्यों है फायदेमंद?
पहली नजर में यह उलटा लग सकता है। यदि हमें बेकार गर्मी का उपयोग करना है तो फिर गर्मी का प्रवाह रोकना क्यों जरूरी है?
असल में थर्मोइलेक्ट्रिक उपकरण को बिजली पैदा करने के लिए अपने गर्म और ठंडे हिस्सों के बीच तापमान का अंतर बनाए रखना पड़ता है। यदि पदार्थ गर्मी को बहुत तेजी से दूसरी तरफ पहुंचा देगा तो दोनों हिस्सों का तापमान जल्दी बराबर हो जाएगा और बिजली पैदा करने की क्षमता घट जाएगी।
इसलिए ऐसा पदार्थ, जो विद्युत प्रवाह के लिए अनुकूल हो लेकिन गर्मी को तेजी से गुजरने न दे, थर्मोइलेक्ट्रिक तकनीक के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने कैसे खोजा यह रहस्य?
यह अध्ययन बेंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के वैज्ञानिकों और सहयोगी शोधकर्ताओं ने किया है। शोध का नेतृत्व नई रसायन इकाई के प्रोफेसर कनिष्क बिस्वास, शोधार्थी सायंतोनी चौधरी और डॉ. अनिमेष भुई ने किया।
शोधकर्ताओं ने पदार्थ के संरचनात्मक और थर्मोइलेक्ट्रिक गुणों की प्रयोगशाला में जांच करने के साथ उन्नत सैद्धांतिक गणनाओं का सहारा लिया। परमाणुओं की गतिविधियों को समझने के लिए कंप्यूटर आधारित मॉलिक्यूलर डायनामिक्स सिमुलेशन भी किए गए।
अध्ययन में जेएनसीएएसआर की थ्योरीटिकल साइंसेज यूनिट के प्रोफेसर उमेश वी. वाघमारे और डॉ. प्रसाद वी. मटुकुमिल्ली ने भी सहयोग किया।
शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘साइंस एडवांसेज’ में प्रकाशित हुआ है।
इसकी बनावट में छिपा है असली रहस्य
TlCu5Se3 की सबसे दिलचस्प विशेषता इसकी क्रिस्टलीय बनावट है। इसकी त्रि-आयामी संरचना जटिल गांठ जैसी है और इसमें खुले चैनल मौजूद हैं। इसी संरचना के कारण कॉपर परमाणुओं की गति सीमित रहती है।
यानी परमाणु पूरी तरह स्थिर भी नहीं हैं और किसी तरल पदार्थ की तरह स्वतंत्र रूप से घूम भी नहीं सकते। उनकी यही सीमित हलचल क्रिस्टल के भीतर ऐसे कंपन पैदा करती है जो गर्मी के सामान्य प्रवाह को बाधित करते हैं।
इस असामान्य ऊष्मा व्यवहार और अनुकूल इलेक्ट्रॉनिक गुणों के मेल से इस पदार्थ ने 1.7 का थर्मोइलेक्ट्रिक ‘फिगर ऑफ मेरिट’ यानी ZT हासिल किया। यह किसी पदार्थ की थर्मोइलेक्ट्रिक क्षमता मापने का महत्वपूर्ण पैमाना है और इस श्रेणी के पदार्थों में इसे उल्लेखनीय प्रदर्शन माना गया है।
कारखानों से लेकर डेटा सेंटर तक संभावना
इस खोज का महत्व प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। भविष्य में इसके सिद्धांतों के आधार पर बेहतर थर्मोइलेक्ट्रिक पदार्थ विकसित हुए तो उनका उपयोग उन क्षेत्रों में हो सकता है जहां बड़ी मात्रा में गर्मी बेकार चली जाती है।
बिजलीघरों, सीमेंट और इस्पात संयंत्रों में मशीनों और औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली गर्मी का कुछ हिस्सा दोबारा बिजली में बदला जा सकता है। वाहनों में इंजन और निकास प्रणाली से निकलने वाली गर्मी भी ऊर्जा का स्रोत बन सकती है।
डेटा सेंटरों में हजारों सर्वर लगातार गर्मी पैदा करते हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों और दूसरे उपकरणों की बैटरियों में भी तापमान नियंत्रित रखना बड़ी चुनौती है। इसलिए बेहतर ताप प्रबंधन और अपशिष्ट गर्मी के उपयोग की तकनीक आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होगी।
अभी घरों में बिजली बनाने वाली मशीन नहीं
हालांकि इस खोज को तत्काल ऐसी तकनीक समझना गलत होगा जिससे कल से कारखानों की सारी बेकार गर्मी बिजली में बदलने लगेगी। यह मूलभूत वैज्ञानिक खोज है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसे तंत्र की पहचान की है जो भविष्य में अधिक प्रभावी थर्मोइलेक्ट्रिक पदार्थों के डिजाइन का रास्ता दिखा सकता है।
व्यावहारिक इस्तेमाल तक पहुंचने के लिए पदार्थ की लागत, टिकाऊपन, बड़े पैमाने पर उत्पादन और वास्तविक औद्योगिक परिस्थितियों में उसके प्रदर्शन जैसी कई चुनौतियों पर अभी काम करना होगा।
फिर भी इस खोज की अहमियत बड़ी है। ऊर्जा की बढ़ती मांग के दौर में चुनौती केवल अधिक बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि पहले से इस्तेमाल हो रही ऊर्जा की बर्बादी कम करना भी है। यदि मशीनों, वाहनों और उद्योगों से वातावरण में चली जाने वाली गर्मी का कुछ हिस्सा भी दोबारा उपयोगी बिजली में बदला जा सके तो ऊर्जा दक्षता की तस्वीर बदल सकती है।
भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज इसी संभावना की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है—जहां आज जिसे हम केवल ‘बेकार गर्मी’ कहते हैं, वही कल बिजली का एक नया स्रोत बन सकती है।
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प्रकाशन लिंक: DOI:10.1126/sciadv.aeh9096
