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रिश्ते के लिए अमेरिका फड़फड़ा रहा या चीन?

श्रुति व्यास
अमेरिका के मंत्री, कूटनीतिज्ञ एक के बाद एक लाइन लगाकर चीन जा रहे हैं। सबसे पहले विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन गए। उनके पीछे वित्त मंत्री जैनेट येलेन गई। फिर राष्ट्रपति बाईडन के जलवायु मामलों के विशेष दूत जान कैरी भी बीजिंग पहुंचे।
सभी का मकसद रिश्तों में आई खटास को कम करना था। परंतु इन सबसे जितना शोर हुआ उससे कहीं अधिक शोर सौ साल की उम्र के पूर्व विदेश मंत्री हैनरी किसिंजर की चीन यात्रा से है। एक वजह यह है कि चीन में किसिंजर का स्वागत अमेरिकी प्रशासन के आला मंत्रियों से ज्यादा गर्मजोशी से हुआ। बाकियों के स्वागत में गर्मजोशी नाम के लिए भी नहीं थी लेकिन चीन के विदेश मंत्रालय ने न केवल बयान जारी कर दोनों देशों के रिश्तों में हैनरी किसिंजर के योगदान को याद किया बल्कि उनकी जम कर तारीफ भी की। चीन ने कहा ‘‘चीन के प्रति अमरीका की नीति को किसिंजर की कूटनीतिक बुद्धिमत्ता और निक्सन के राजनैतिक साहस की जरूरत है।”

किसिंजर मंगलवार को चीन के विदेश मंत्री ली शांगफू से मिले। यह मुलाकात भी चीन द्वारा किसिंजर को दिए जा रहे सम्मान और महत्व की सूचक थी। पिछले ही महीने चीन ने सिंगापुर में एक फोरम की बैठक के दौरान अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड आस्टिन के ली से मुलाकात के अनुरोध को नामजूंर किया था। चीन का कहना थधा कि अमरीका ने जब ली पर प्रतिबंध लगा रखे हैं तो वे क्यों मिले!

किसिंजर अपनी मर्जी से चीन गए हैं। वे अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं – कम से आधिकारिक तौर पर तो नहीं – और यह भी एक वजह है कि उनका चीन ने शानदार स्वागत किया। अभी यह साफ नहीं है कि वे राष्ट्रपति शी जिंनपिंग से मिलेंगे या नहीं। चीन की सरकारी न्यूज एजेन्सी शिन्हुआ के अनुसार, शी जिनपिंग और किसिंजर की आखिरी मुलाकात बीजिंग में 2019 में हुई थी। उस समय शी ने किसिंजर को शुभकामनाएं देते हुए कहा था कि ‘‘वे आने वाले कई सालों तक स्वस्थ रहें और चीन और अमरीका के रिश्तों को बेहतर बनाने में अपना योगदान देते रहें”।

अमेरिका और चीन इस समय एक-दूसरे को आंखें दिखा रहे हैं। ऐसे समय में किसिंजर की चीन यात्रा के कई निहितार्थ हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से यह एक प्रतीकात्मक पहल है। चीन चाहता है कि अमेरिका उसे अपने बराबर की ताकत के रूप में स्वीकार करे। अमरीका को यह मंजूर नहीं है। किसिंजर और ली की मुलाकात से चीन ने अमेरिका को संदेश भेजा है कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीधा संवाद तब तक नहीं होगा जब तक अमेरिका चीन पर से प्रतिबंध नहीं हटा लेता। अपनी पिछली चीन यात्रा के दौरान ब्लिंकन ने बीजिंग से अनुरोध किया था कि संवाद के चैनल को खोला जाए परंतु चीन ने उस बात को खारिज किया। किसिंजर और ली की मुलाकात के बारे में चीन के रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है-“अमेरिका के कुछ लोगों की इस बात के लिए आलोचना की गई है कि वे चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए आधा रास्ता चलकर आने को तैयार नहीं हैं”।बयान में यह भी कहा गया है कि मित्रवत संवाद के लिए जरूरी वातावरण समाप्त हो गया है।

सवाल है रिश्ते ठिक करने के लिए चीन फडफड़ा रहा है या अमेरिका? ध्यान रहे बीजिंग जाने की शुरूआत ब्लिंकन से हुई थी और उसके लिए चीन की संवाद शुरू करने की पहल थी। तो उसके तमाम पहल अमेरिका की और से है या चीन की तरफ से? सबसे बड़ी बात यूक्रेन मामले में रूस-चीन चीन की साझेदारी की हकीकत में अमेरिका और योरोप कैसे और कितनी पहले कर सकता है? सो संभव है कि दोनों तरफ से रास्ता निकालने की कूटनीति होती हुई हो। अमेरिका अपने मंत्रियों और किसिंजर जैसे गैर-आधिकारिक प्रतिनिधियों को एक के बाद एक चीन भेजकर संदेश दे रहा है कि वह चीन से बातचीत फिर से शुरू करने के लिए इच्छुक है। आखिर किसिंजर सौ साल की उम्र में आधी दुनिया को पार कर चीन गए हैं तो कोई तो बात है!

दोनों पक्षों का मानना है कि आधिकारिक संवाद की बहाली से राह खुलेगी।दरअसल अमेरिका बाईडन के रहते हुए ही चीन के साथ संबंध बेहतर करने के बारे में सोच सकता है। अगर डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति भवन में वापिस पहुंचते हैं तो यह कहना मुश्किल है कि उनकी और उनके प्रशासन की चीन के साथ संबंधों को सामान्य करने में कितनी  इच्छा होगी?  उनकी शायद ही कोई खास दिलचस्पी नहीं होगी।उनके एजेंडे में अमेरिका को ग्रेट बनाना है और उसमें चीन ही टारगेट बनता है।
अमेरिकी संसद की प्रतिनिधी सभा की तत्कालीन स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताईवान यात्रा और उसके बाद अमेरिका के आकाश में तैरते चीनी गुब्बारों ने दोनों देशों के संबंधों में खटास पैदा की थी। वह पिछले एक साल से जस की तस है। अब दोनों देश जलवायु परिवर्तन की भारी समस्या से  एक-दूसरे से बातचीत करने को तैयार हुए है तो यह कुल मिलाकर वैश्विक परिवेश की जरूरत में एक शुभ लक्षण है।

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