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अलकनंदा में प्रवाहित की गईं 7 हजार महाशीर मछलियों की उंगलिकाएं, संरक्षण पर दिया गया जोर

श्रीनगर (गढ़वाल), 13 जून। नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत अलकनंदा नदी की जैव-विविधता को सुदृढ़ बनाने और नदीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के उद्देश्य से शुक्रवार को धारी देवी के निकट अलकनंदा नदी में महाशीर मछली की 7 हजार उंगलिकाओं (फिंगरलिंग्स) का प्रवाहन किया गया।

यह कार्यक्रम केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), बैरकपुर (कोलकाता), गढ़वाल विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग तथा मत्स्य विभाग, टिहरी गढ़वाल के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया गया। इस अवसर पर नदी संरक्षण, जलीय जीवों के संवर्धन तथा जैव-विविधता संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया।

गढ़वाल विश्वविद्यालय की फिश हैचरी के समन्वयक प्रो. दीपक सिंह भंडारी ने बताया कि महाशीर उत्तराखंड की राज्य मछली है और हिमालयी नदियों की पारिस्थितिकी में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक एवं अवैध मत्स्य दोहन, जल प्रदूषण, नदी तंत्र में हस्तक्षेप, वासस्थलों के विनाश तथा बांध निर्माण जैसी गतिविधियों के कारण प्रदेश की नदियों में महाशीर की संख्या लगातार घट रही है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने इसे संकटग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में रखा है।

उन्होंने बताया कि चौरास परिसर स्थित फिश हैचरी का विकास अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से किया गया था। इसी हैचरी तथा टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में विकसित महाशीर प्रजाति की 7 हजार उंगलिकाओं को अलकनंदा नदी में छोड़ा गया। दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत सीआईएफआरआई द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता भी प्रदान की जा रही है।

प्रो. भंडारी ने कहा कि गोल्डन महाशीर (टॉर प्यूटिटोरा) पोषण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मछली है, जो प्रोटीन और ओमेगा फैटी एसिड का समृद्ध स्रोत मानी जाती है। यह एक लोकप्रिय गेम फिश भी है, जो साहसिक मत्स्य पर्यटन को बढ़ावा देने में सहायक है। इसकी आयु 20 से 25 वर्ष तक तथा वजन 40 से 50 किलोग्राम तक पहुंच सकता है, जिससे यह खाद्य सुरक्षा और मत्स्य अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण प्रजाति बन जाती है।

कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र सिंह, डॉ. जितेंद्र सिंह राणा एवं डॉ. रणजीत सिंह ने महाशीर संरक्षण और इसकी पारिस्थितिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर गंगा तथा उसकी सहायक नदियों को स्वच्छ, निर्मल और जैव-विविधता से समृद्ध बनाए रखने का संकल्प भी लिया गया।

कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मंजू प्रकाश गुसाईं, डीएसडब्ल्यू प्रो. ओ.पी. गुसाईं, मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के पुष्कर सिंह नयाल, संजय सिंह तथा शोधार्थी सचिन, राहुल, अजय, आयुष और राकेश सहित अनेक छात्र एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

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