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एक आँख वाला पूर्वज: क्या ‘साइक्लोप्स’ से हुई है हमारी आँखों की उत्पत्ति?

चार्ल्स डार्विन भी रीढ़ की हड्डी वाले जीव की आंख के विकास से हैरान थे। नई रिसर्च से पता चलता है कि इसका संबंध एक साइक्लोपियन इनवर्टिब्रेट से है जिसके सिर के ऊपर एक ही आंख होती है।

 

लेखक: कार्ल ज़िमर 

(अनुवाद: साभार न्यूयॉर्क टाइम्स)

आप किसी भी कशेरुकी (रीढ़ की हड्डी वाले जीव) को देखें, तो आपको दो आँखें अपनी ओर देखती मिलेंगी। चाहे आसमान में उड़ता बाज हो या समुद्र की गहराई में तैरती हैमरहेड शार्क, सबकी दो आँखें होती हैं।

वैज्ञानिक लंबे समय से इस पहेली में उलझे रहे हैं कि कशेरुकियों की आँखों का विकास कैसे हुआ। हाल के दो शोध एक अजीबोगरीब शुरुआत की ओर इशारा करते हैं: वैज्ञानिकों का प्रस्ताव है कि 56 करोड़ साल पहले हमारे अकशेरुकी पूर्वज ‘साइक्लोप्स’ (एक आँख वाले जीव) थे, जिनके सिर के ठीक ऊपर एक अकेली आँख होती थी, जो बाद में दो हिस्सों में बँट गई।

डार्विन की वह ‘कंपकंपी’

चार्ल्स डार्विन जब विकासवाद का सिद्धांत विकसित कर रहे थे, तब वे कशेरुकी आँख की जटिलता को देखकर अक्सर परेशान हो जाते थे। 1860 में उन्होंने अपने मित्र और अमेरिकी वनस्पति शास्त्री आसा ग्रे को लिखा था, “आँख आज भी मुझे ‘ठंडी कंपकंपी’ (Cold shudder) देती है।” उन्हें समझ नहीं आता था कि कैसे विकास ने लेंस और रेटिना जैसे कई हिस्सों को मिलाकर पीढ़ियों के सूक्ष्म बदलावों से इतनी सटीक आँख बना दी।

हालाँकि, अकशेरुकियों में मौजूद सरल आँखों की विविधता ने उन्हें ढांढस बंधाया। कुछ जीव केवल प्रकाश पहचानने वाले ‘पिगमेंट’ के ढेरों से काम चलाते थे, तो कुछ के पास बिना लेंस वाले सरल कप जैसी आँखें थीं। डार्विन ने लिखा था कि जब वे इन क्रमिक बदलावों के बारे में सोचते हैं, तो उनका तर्क उन्हें उस डर पर विजय पाने को कहता है।

फिर भी, विकासवाद के विरोधियों ने संदेह जताना जारी रखा। 1990 के दशक में भी कुछ लोगों का दावा था कि एक आँख विकसित होने में अरबों साल लगेंगे—जो पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व से कहीं अधिक समय है।

सिर्फ कुछ लाख साल का सफर

स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी के न्यूरोबायोलॉजिस्ट डैन-ई. निल्सन इन दावों से इतने तंग आ गए कि उन्होंने गणना करने का फैसला किया। 1994 में उन्होंने और उनकी सहयोगी सुज़ैन पेल्गर ने निष्कर्ष निकाला कि एक छवि बनाने वाली आँख मात्र कुछ लाख वर्षों में विकसित हो सकती है। निल्सन कहते हैं, “यह सटीक तो नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है कि आँखों के विकास के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध था।”

उस समय वैज्ञानिकों के पास आणविक (molecular) डेटा कम था, लेकिन तीन दशक बाद स्थिति बदल गई है। निल्सन और अन्य विशेषज्ञों ने मिलकर अब कशेरुकी आँखों के विकास की एक विस्तृत परिकल्पना तैयार की है, जिसे हाल ही में पत्रिका ‘करंट बायोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है।

रेत में दबे पूर्वज से लेकर तैरती मछली तक

यह कहानी 56 करोड़ साल पहले शुरू होती है, जब हमारे पूर्वज समुद्र तल में दबे रहते थे और भोजन के लिए अपना सिर बाहर निकालते थे। निल्सन का प्रस्ताव है कि इन जीवों के सिर के ऊपर प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाओं का एक पैच (धब्बा) था। यह ‘एकल आँख’ दिन-रात के चक्र को ट्रैक करती थी और उन्हें अपनी स्थिति का आभास कराती थी।

जैसे-जैसे उनके वंशज तैरने लगे, उन्हें अपने वातावरण के बारे में अधिक जानकारी की आवश्यकता हुई। उनकी वह एकल आँख और जटिल हो गई। उसके दोनों ओर कप के आकार के गड्ढे विकसित हुए, जो प्रकाश की दिशा बताने में सक्षम थे। यही हमारे आज के ‘रेटिना’ के पूर्वज थे।

लाखों वर्षों के बाद, ये जीव छोटी मछलियों में बदल गए जिनके पास दिमाग और शिकार करने के लिए मुँह था। निल्सन का तर्क है कि यह बदलाव आँखों के स्थान परिवर्तन के बिना संभव नहीं था। आँखों का सिर के दोनों ओर जाना बेहतर दृष्टि और बाधाओं से बचने के लिए आवश्यक था।

तीसरी आँख का अवशेष: पीनियल ग्रंथि

हैरानी की बात यह है कि जब नई आँखें बगल में आ गईं, तब भी जीवों ने अपने सिर के ऊपर वाली प्राचीन आँख को पूरी तरह नहीं खोया। आधुनिक मछलियों में आज भी सिर के ऊपर प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाओं का एक पैच होता है, जिसे ‘पीनियल ग्रंथि’ (Pineal Gland) कहा जाता है।

इंसानों जैसे स्तनधारियों में, यह ग्रंथि मस्तिष्क की अंधेरी गहराइयों में धंस गई है और अब सीधे प्रकाश का पता नहीं लगा सकती। इसके बजाय, हमारी आँखों से प्रकाश के संकेत यहाँ पहुँचते हैं, जिससे यह ग्रंथि दिन के समय के अनुसार हार्मोन छोड़ती है। यह हमारी ‘मूल आँख’ की आखिरी निशानी है।

चार आँखों वाला रहस्य

चीन और इंग्लैंड में मिले 51.8 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों ने इस कहानी में एक नया मोड़ ला दिया है। कुछ शुरुआती कशेरुकियों में सिर के किनारों पर दो आँखों के अलावा, ऊपर की तरफ भी दो और आँखें (लेंस और रेटिना युक्त) देखी गई हैं।

ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के पैलियोन्टोलॉजिस्ट जैकब विन्थर का मानना है कि चूंकि ये जीव खाद्य श्रृंखला में सबसे नीचे थे, इसलिए चार आँखों ने उन्हें शिकारियों से बचने के लिए व्यापक दृष्टि प्रदान की होगी। बाद में, जब वे खुद शिकारी बन गए, तो अतिरिक्त आँखों की ज़रूरत खत्म हो गई।

निल्सन कहते हैं कि वे 60 करोड़ साल पीछे जाकर उन जीवों को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। तब तक, विज्ञान की ये कड़ियाँ हमें हमारे विकास के अद्भुत सफर की याद दिलाती रहेंगी।

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