होली के उल्लास में संयम की मर्यादा भी जरूरी
Holi, traditionally a celebration of renewal, harmony, and cultural refinement, is increasingly overshadowed by recklessness and commercialization. Drawing on data from the National Crime Records Bureau and traffic authorities, the article highlights a surge in road accidents, drunk driving, and public disorder during the festival, often resulting in tragedy, particularly among youth. It also examines the shift from natural, Ayurvedic colors to toxic chemical dyes causing health and environmental hazards. The erosion of musical traditions and social decorum further reflects a decline in collective sensitivity. The article of veteran journalist and an author of several research books calls for restoring Holi’s essence through restraint, consent, ecological responsibility, and cultural dignity.

–जयसिंह रावत–
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह पर्व है जब समाज आपसी कटुताओं को भुलाकर नए सिरे से संबंधों को रंगता है। किंतु बीते कुछ वर्षों के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर भी सामने रखते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की विभिन्न रिपोर्टों और राज्यों के यातायात पुलिस आंकड़ों से संकेत मिलता है कि होली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान सड़क दुर्घटनाओं और झगड़ा-फसाद की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होती है। कई स्थानों पर सामान्य दिनों की तुलना में दुर्घटनाओं में लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि नशे की हालत में वाहन चलाने के हजारों चालान केवल एक दिन में काटे जाते हैं। अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटरों में घायलों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, जिनमें बड़ी संख्या युवा वर्ग की होती है।यह स्थिति सोचने को विवश करती है कि कहीं रंगों का यह पर्व अनजाने में हुड़दंग और असंयम का मंच तो नहीं बनता जा रहा। आवश्यकता इस बात की है कि हम होली के उल्लास को संयम और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ें, ताकि उत्सव की खुशी किसी परिवार के लिए त्रासदी का कारण न बने।
जब उत्सव बन जाता है जोखिम
होली का आनंद जब संयम से कटकर उन्माद में बदलता है, तो उसकी सबसे भयावह तस्वीर सड़कों पर दिखाई देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो तथा राज्यों के यातायात पुलिस आंकड़ों से संकेत मिलता है कि बड़े त्योहारों के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होती है, और होली उनमें प्रमुख है। कई स्थानों पर सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत तक अधिक दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं। महानगरों में ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ के हजारों चालान इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि उत्सव के नाम पर नशा एक सामाजिक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। ट्रॉमा सेंटरों में होली के दिन घायलों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की होती है। रंगों का यह दिन कई परिवारों के लिए शोक का कारण बन जाता है।
प्राकृतिक रंगों से रासायनिक संकट तक
होली का एक वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक आधार भी रहा है। शीत ऋतु से ग्रीष्म की ओर संक्रमण के इस समय में टेसू के फूलों का अर्क, हल्दी, चंदन और अन्य प्राकृतिक तत्वों का उपयोग त्वचा और स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी माना जाता था। होलिका दहन को भी वातावरण की शुद्धि से जोड़ा गया। आज स्थिति उलट है। औद्योगिक रसायनों, पेंट और कृत्रिम रंगों के उपयोग से आंखों के संक्रमण, कॉर्निया क्षति और त्वचा रोगों के मामलों में 25 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि देखी जाती है। चिकित्सकों के अनुसार इन रंगों में सीसा, क्रोमियम और अन्य हानिकारक तत्व पाए जाते हैं, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।
सांस्कृतिक मर्यादा का क्षरण
कभी होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि संगीत, काव्य और सामाजिक संवाद की सजीव परंपरा थी। कुमाऊँ की बैठकी होली में शास्त्रीय रागों की गंभीरता और भक्ति का भाव एक साथ प्रवाहित होता था। दरबारी, काफी, जंगला और जैजैवंती जैसे रागों में गाए जाने वाले पद केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक साधना का हिस्सा होते थे। गढ़वाल में सामूहिक फाग गायन गांवों को एक सूत्र में बांधता था। चौपालों में बैठकर लोग शब्दों और स्वरों के माध्यम से मन के द्वेष को धोते थे। रंग लगाने से पहले संवाद होता था, सम्मान होता था और सहमति का मौन संस्कार भी होता था।आज परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। लोकधुनों और शास्त्रीय रागों की जगह ऊँचे ध्वनि-विस्तारक यंत्रों पर बजते कर्णकटु और कई बार अश्लील गीतों ने ले ली है। सामूहिक गायन की परंपरा सिमट रही है और उसकी जगह भीड़ का शोर बढ़ रहा है। उत्सव की आड़ में सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार, छेड़छाड़ और जबरन रंग लगाने की घटनाएँ हर वर्ष सामने आती हैं। राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोगों तक ऐसी शिकायतें पहुंचती हैं, जो इस पर्व की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। ‘बुरा न मानो होली है’ जैसे वाक्य, जो कभी अपनत्व और सहजता का संकेत थे, अब कई बार मर्यादा के उल्लंघन का हथियार बन जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत आचरण का दोष नहीं, बल्कि सामूहिक संवेदनशीलता के क्षरण का संकेत है। होली का मूल भाव दूसरों की सीमाओं का सम्मान करते हुए आनंद बांटना था, न कि किसी की असहमति को अनदेखा करना। जब उत्सव में सहमति और शालीनता का स्थान कम होता है, तब वह सामाजिक समरसता के बजाय असुरक्षा का कारण बन जाता है।
बाजार, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी
होली अब एक बड़े बाजार का रूप ले चुकी है। रंगों, पिचकारियों, डीजे आयोजनों और थीम पार्टियों पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। विज्ञापन और उपभोक्तावाद ने इसे एक व्यावसायिक उत्सव में बदल दिया है। इसके साथ ही प्लास्टिक कचरे, रासायनिक अपशिष्ट और जल की बर्बादी की समस्या भी बढ़ती है। सस्ते और चमकीले दिखने वाले कृत्रिम रंग अक्सर नालों और नदियों में बहकर जलस्रोतों को प्रदूषित करते हैं, जिससे जलीय जीवन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जल संकट झेल रहे क्षेत्रों में अत्यधिक जल प्रयोग एक नई चिंता को जन्म देता है। पर्यावरणविदों का मत है कि यदि प्राकृतिक रंगों, सामूहिक सादगी और सीमित जल उपयोग की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाए, तो यह पर्व वास्तव में पर्यावरण-सम्मत और सामाजिक रूप से जिम्मेदार बन सकता है।
लौटें मूल भावना की ओर
त्योहार समाज का दर्पण होते हैं। यदि उनमें असंवेदनशीलता और उग्रता बढ़ रही है, तो यह सामूहिक चेतना के क्षरण का संकेत है। होली चेतना के विस्तार का पर्व है, चेतना के लोप का नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर नई पीढ़ी को संयमित और सम्मानजनक उत्सव की शिक्षा दें।आइए, इस बार संकल्प लें कि होली का रंग ऐसा हो जो दिलों को जोड़े, रिश्तों को प्रगाढ़ करे और किसी भी घर में मातम का कारण न बने। पलाश की सुगंध, फाग की मधुरता और आपसी सम्मान ही इस पर्व की सच्ची पहचान हैं। जब संध्या ढले और हर चेहरे पर संतोष की मुस्कान हो, तभी समझिए कि हमने होली सच में मनाई है।
