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उत्तराखंड:धामी मंत्रिमंडल विस्तार के बहाने ‘मिशन 2027’ की समय पूर्व दस्तक?

जयसिंह रावत

​उत्तराखंड की राजनीति में आज का दिन (20 मार्च) न केवल सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा करने वाला  है, बल्कि यह राज्य के भविष्य की राजनीतिक दिशा भी तय करने वाला साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मंत्रिमंडल विस्तार की प्रबल संभावनाओं ने देहरादून से लेकर दिल्ली तक के सियासी तापमान को बढ़ा दिया है। पिछले काफी समय से खाली पड़े कैबिनेट के पांच पदों को भरने की यह कवायद केवल रिक्तियों की पूर्ति नहीं है, बल्कि यह मुख्यमंत्री धामी को हटाए जाने की अटकलों पर विराम लगने और राज्य में समय से पूर्व विधानसभा चुनावों की आहट भी है।

धामी का ‘रिकॉर्ड’ और नेतृत्व परिवर्तन पर पूर्णविराम

​यदि आज मंत्रिमंडल का विस्तार होता है, तो यह उन तमाम अटकलों पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगा देगा जो समय-समय पर नेतृत्व परिवर्तन (Change of Guard) को लेकर उठती रही हैं। उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में भाजपा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि होगी कि पुष्कर सिंह धामी न केवल अपना 5 साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने वाले पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बनेंगे, बल्कि वे राज्य के इतिहास में अब तक के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले मुख्यमंत्री का गौरव भी हासिल कर लेंगे।

​अब तक नारायण दत्त तिवारी ही एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया था, लेकिन धामी का कार्यकाल उनसे भी लंबा होने जा रहा है। यह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का धामी की कार्यशैली और उनकी छवि पर विश्वास का प्रतीक है। धामी वह भाग्यशाली नेता हैं  जो खटीमा चुनाव हारने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कायम रहे थे।

कैबिनेट विस्तार: क्षेत्रीय और जातीय संतुलन की चुनौती

​कैबिनेट में वर्तमान में 5 पद रिक्त हैं। सूत्रों की मानें तो इस विस्तार में क्षेत्रीय (गढ़वाल बनाम कुमाऊं) और जातीय (ठाकुर बनाम ब्राह्मण) संतुलन को साधने की पूरी कोशिश की जाएगी।

  • कुमाऊं से कुछ नए चेहरों को जगह देकर तराई और पहाड़ के सामंजस्य को पुख्ता किया जा सकता है।
  • गढ़वाल में हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देकर आगामी चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा, लगभग 20 से अधिक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को ‘दायित्व’ (राज्य मंत्री स्तर) देकर पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष को शांत करने की रणनीति भी साफ नजर आ रही है।

समय से पूर्व चुनाव (Early Elections) की सुगबुगाहट

​राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सबसे बड़ी चर्चा यह है कि क्या यह विस्तार ‘प्री-पोल’ (Pre-poll) रणनीति का हिस्सा है? सामान्यतः उत्तराखंड विधानसभा चुनाव फरवरी 2027 में होने चाहिए। लेकिन 2027 के शुरू होते ही हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन होना है।

“कुंभ जैसा विशाल धार्मिक आयोजन और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना शासन-प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है। जनवरी से अप्रैल 2027 तक पूरा सरकारी तंत्र कुंभ की व्यवस्थाओं में व्यस्त रहेगा। ऐसे में चुनाव आचार संहिता का लागू होना विकास कार्यों और कुंभ की तैयारियों में बाधक बन सकता है।”

 

​यही कारण है कि भाजपा आलाकमान इस साल (2026) के अंत तक ही चुनाव कराने पर विचार कर सकता है। समय से पहले चुनाव कराकर भाजपा विपक्ष को संभलने का मौका नहीं देना चाहती और धामी सरकार की ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को कुंभ के उत्साह और नए मंत्रिमंडल के ‘जोश’ से ढकने की तैयारी में है।

​कुंभ और राजनीति का संगम

​हरिद्वार कुंभ 2027 केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था और भाजपा के ‘हिंदुत्व’ कार्ड के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2022 के चुनाव में हरिद्वार की 11 सीटों में से भाजपा केवल 3 पर सिमट गई थी। पार्टी के लिए हरिद्वार एक कमजोर कड़ी रही है। 2027 के कुंभ से पहले ही चुनाव कराकर भाजपा इस धार्मिक आयोजन की ‘सफलता’ का श्रेय पहले ही अपनी झोली में डालना चाहती है। केंद्र सरकार द्वारा कुंभ के लिए जारी ₹500 करोड़ की पहली किश्त और अमित शाह का हालिया हरिद्वार दौरा इसी ‘मिशन 2027’ (जो अब मिशन 2026 हो सकता है) की तैयारी का हिस्सा है।

एक नई राजनीतिक शुरुआत

​अगर आज मंत्रिमंडल विस्तार होता है, तो यह स्पष्ट संदेश होगा कि धामी अब “कार्यवाहक” या “विकल्प” नहीं, बल्कि उत्तराखंड भाजपा के “स्थायी और निर्विवाद” चेहरा बन चुके हैं। समय से पहले चुनाव की संभावना उत्तराखंड के लिए एक नई शुरुआत होगी, जहाँ विकास की गति और राजनीतिक स्थिरता के नाम पर जनता से नया जनादेश मांगा जाएगा।

​पुष्कर सिंह धामी के लिए यह विस्तार उनके राजनीतिक कौशल की अग्निपरीक्षा भी है। क्या वे पुराने दिग्गजों और नए महत्वाकांक्षी विधायकों के बीच संतुलन बना पाएंगे? क्या यह नया मंत्रिमंडल वाकई जनता के बीच जाकर ‘रिपीट’ सरकार का मार्ग प्रशस्त कर पाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले कुछ महीनों में साफ हो जाएंगे, लेकिन फिलहाल देहरादून की फिजाओं में ‘बदलाव’ नहीं, बल्कि ‘विस्तार’ की गूँज है।

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