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भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य से क्यों चूका ?

जयसिंह रावत
भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य से क्यों चूक गया?
भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सपना पिछले कुछ वर्षों से देश की आर्थिक नीति और राजनीतिक विमर्श का प्रमुख विषय रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2018 में यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया था और कहा था कि भारत जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा। लेकिन नवीनतम आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि यह लक्ष्य तय समय-सीमा के भीतर हासिल नहीं हो सका है। सवाल यह है कि आखिर भारत इस लक्ष्य से क्यों चूक गया और अब आगे की राह क्या है?
लक्ष्य और वास्तविकता के बीच बढ़ती दूरी
सितंबर 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा था। बाद में कोविड-19 महामारी और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए इस समय-सीमा को बढ़ाकर वित्त वर्ष 2024-25 तक कर दिया गया।
हालांकि हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 3.6 से 4 ट्रिलियन डॉलर के बीच आंका जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमानों के अनुसार भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है, लेकिन 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिस गति से अर्थव्यवस्था को बढ़ना चाहिए था, वह हासिल नहीं हो सकी।
यदि डॉलर के मूल्यांकन के आधार पर देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी लक्ष्य से लगभग 1 से 1.4 ट्रिलियन डॉलर पीछे है। इसका अर्थ है कि केवल घरेलू विकास दर ही नहीं, बल्कि रुपये और डॉलर के विनिमय मूल्य ने भी इस लक्ष्य को प्रभावित किया है।
केवल विकास दर नहीं, डॉलर का गणित भी जिम्मेदार
कई लोग मानते हैं कि यदि भारत की जीडीपी लगातार 6-8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है तो फिर लक्ष्य क्यों नहीं हासिल हुआ। इसका उत्तर डॉलर आधारित गणना में छिपा है।
5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य अमेरिकी मुद्रा में निर्धारित किया गया था। इसलिए भारत की अर्थव्यवस्था भले ही रुपये में तेजी से बढ़ी हो, लेकिन जब उसे डॉलर में परिवर्तित किया गया तो रुपये की कमजोरी ने कुल मूल्य को कम कर दिया।
वर्ष 2018 में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 68-70 रुपये थी। वर्तमान में यह 85 रुपये प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुकी है। इसका सीधा अर्थ है कि रुपये में हुई आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा डॉलर में बदलते समय कम हो गया।
उदाहरण के लिए यदि किसी अर्थव्यवस्था का आकार रुपये में 10 प्रतिशत बढ़ता है, लेकिन उसी अवधि में रुपया डॉलर के मुकाबले 5 प्रतिशत कमजोर हो जाता है, तो डॉलर में वास्तविक वृद्धि काफी कम दिखाई देती है।
कोविड-19 महामारी: सबसे बड़ा झटका
भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य को सबसे बड़ा नुकसान कोविड-19 महामारी ने पहुंचाया। वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 6.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। लॉकडाउन, उद्योगों का बंद होना, रोजगार संकट और उपभोग में भारी कमी ने विकास की गति को कई वर्षों पीछे धकेल दिया।
महामारी के दौरान लाखों छोटे और मध्यम उद्यम प्रभावित हुए। असंगठित क्षेत्र, जो भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार का महत्वपूर्ण आधार है, उससे उबरने में अभी भी समय लग रहा है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि कोविड महामारी नहीं आती तो भारत 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य के कहीं अधिक करीब पहुंच सकता था।
वैश्विक संकटों का भी पड़ा असर
महामारी के बाद दुनिया ने रूस-यूक्रेन युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला संकट, ऊर्जा कीमतों में उछाल और बढ़ती महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना किया। इन घटनाओं ने वैश्विक व्यापार और निवेश को प्रभावित किया।
भारत को कच्चे तेल के आयात पर भारी खर्च करना पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा हुआ तो आयात बिल बढ़ा, चालू खाते पर दबाव पड़ा और रुपये की विनिमय दर प्रभावित हुई। इसका सीधा असर डॉलर में जीडीपी के आकार पर पड़ा।
निवेश और रोजगार की चुनौतियां
भारत में पिछले वर्षों में बुनियादी ढांचे पर रिकॉर्ड निवेश हुआ है। एक्सप्रेसवे, रेलवे, हवाई अड्डे और डिजिटल अवसंरचना का तेजी से विस्तार हुआ है। इसके बावजूद निजी निवेश और रोजगार सृजन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए केवल सरकारी खर्च पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए निजी क्षेत्र का निवेश, विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार और उच्च गुणवत्ता वाले रोजगारों का सृजन भी आवश्यक है।
भारत की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान लगातार बढ़ा है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया है जिसकी कल्पना ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के दौरान की गई थी।
प्रति व्यक्ति आय की चुनौती
भारत का कुल आर्थिक आकार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में आर्थिक विकास का लाभ समान रूप से वितरित करना एक बड़ी चुनौती है।
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी भी विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। इसलिए केवल जीडीपी के आकार को बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि लोगों की वास्तविक आय और जीवन स्तर में सुधार भी जरूरी है।

क्या अब भी संभव है 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत के लिए 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना असंभव नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अन्य वैश्विक एजेंसियां अनुमान लगा रही हैं कि यदि भारत आने वाले वर्षों में 6.5 से 7 प्रतिशत की औसत विकास दर बनाए रखता है, तो वह अगले कुछ वर्षों में इस लक्ष्य को हासिल कर सकता है।
इसके लिए विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना, निर्यात बढ़ाना, कौशल विकास पर निवेश करना, कृषि उत्पादकता में सुधार लाना और निजी निवेश को प्रोत्साहित करना आवश्यक होगा। साथ ही रुपये की स्थिरता और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
असफलता नहीं बल्कि एक चेतावनी
भारत का 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य फिलहाल समय-सीमा से पीछे जरूर छूट गया है, लेकिन यह असफलता नहीं बल्कि एक चेतावनी है कि केवल बड़े लक्ष्य निर्धारित करना पर्याप्त नहीं होता। उन्हें हासिल करने के लिए निरंतर आर्थिक सुधार, निवेश, रोजगार सृजन और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता भी जरूरी होती है।
सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यदि वर्तमान विकास दर बनी रहती है और आर्थिक सुधारों की गति तेज होती है, तो 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य कुछ वर्षों की देरी से सही, लेकिन हासिल किया जा सकता है। असली चुनौती केवल अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि उस विकास को देश के प्रत्येक नागरिक तक पहुंचाना है।
(लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी है- एडमिन)

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