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महिला आरक्षण, परिसीमन और जनगणना

 


जयसिंह रावत
भारतीय लोकतंत्र इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां नीतिगत निर्णयों की दिशा आने वाले दशकों की राजनीति और प्रतिनिधित्व की संरचना तय करेगी। महिलाओं को 33 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण देने का प्रस्ताव एक ऐतिहासिक कदम है, लेकिन जिस तरह इसे परिसीमन और जनगणना से जोड़ा गया है, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह नहीं है कि महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं—यह तो निर्विवाद रूप से आवश्यक है—बल्कि यह है कि क्या इस आरक्षण का आधार और समय-निर्धारण सही है?
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, महिलाओं के लिए आरक्षण को आगामी परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है, जो अगली जनगणना के बाद ही संभव होगी। इसका अर्थ यह हुआ कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक-संवैधानिक सुधार को अनिश्चित समय तक टाल दिया गया है। यह स्थिति अपने आप में विरोधाभासी है। यदि सरकार महिला सशक्तिकरण को लेकर गंभीर है, तो उसे इसे तत्काल लागू करना चाहिए, न कि इसे जनगणना और परिसीमन जैसी जटिल प्रक्रियाओं के हवाले कर देना चाहिए।
परिसीमन अपने आप में एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप से विस्फोटक प्रक्रिया है। इसका सीधा संबंध संसद और विधानसभाओं में सीटों की संख्या और उनके वितरण से है। भारत में आखिरी बार परिसीमन 2002 में हुआ था, और तब से जनसंख्या में भारी बदलाव आ चुका है। 1976 से 2026 तक परिसीमन पर रोक इस उद्देश्य से लगाई गई थी कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे हैं, उन्हें सीटों में नुकसान न उठाना पड़े। लेकिन अब जब यह प्रक्रिया फिर से शुरू होने जा रही है, तो यह आशंका गहराने लगी है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण क्षेत्रीय असंतुलन को और बढ़ा सकता है।
यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि परिसीमन पुराने आंकड़ों, विशेषकर 2011 की जनगणना, पर आधारित होता है, तो यह वर्तमान भारत की वास्तविक तस्वीर पेश नहीं करेगा। पिछले 15 वर्षों में देश में व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए हैं। शहरीकरण की गति तेज हुई है, लाखों लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं, और कई राज्यों की जनसंख्या संरचना में भारी परिवर्तन आया है। ऐसे में 2011 के आंकड़ों पर आधारित प्रतिनिधित्व तय करना न केवल अव्यावहारिक होगा, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा के साथ भी अन्याय होगा।
महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का एक तर्क यह दिया जाता है कि इससे मौजूदा सांसदों की सीटों में सीधा हस्तक्षेप नहीं होगा और राजनीतिक प्रतिरोध कम रहेगा। लेकिन यह तर्क लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय राजनीतिक सुविधा को प्राथमिकता देता है। यदि आरक्षण का उद्देश्य समान भागीदारी सुनिश्चित करना है, तो इसे टालना या शर्तों में बांधना उसकी मूल भावना को कमजोर करता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण पहले से लागू है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल राजनीतिक परिदृश्य को बदला है, बल्कि विकास के एजेंडे को भी अधिक समावेशी बनाया है। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में इस सुधार को टालना समझ से परे है।
परिसीमन को लेकर एक और महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय संतुलन का है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, जबकि उत्तर भारत के कुछ राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अपेक्षाकृत अधिक रही है। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो इससे दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है और उत्तर के राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है। यह स्थिति न केवल राजनीतिक असंतुलन पैदा कर सकती है, बल्कि संघीय ढांचे पर भी असर डाल सकती है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जनगणना जैसी बुनियादी प्रक्रिया ही अनिश्चितता के घेरे में है। 2021 की जनगणना पहले ही टल चुकी है और अब 2027 की बात की जा रही है, जिसमें नई तकनीकों जैसे स्व-गणना और जातिगत आंकड़ों को शामिल करने की योजना है। यह प्रयोग अपने आप में जटिल हैं और इनके सफल क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल हैं। यदि जनगणना ही समय पर और विश्वसनीय ढंग से नहीं हो पाती, तो उसके आधार पर होने वाले परिसीमन और आरक्षण जैसे निर्णय कैसे सटीक होंगे?
इस संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार प्राथमिकताओं को स्पष्ट करे। महिला आरक्षण को तत्काल लागू करना एक स्पष्ट और ठोस संदेश होगा कि सरकार लैंगिक समानता के प्रति प्रतिबद्ध है। इसके लिए परिसीमन का इंतजार करना अनावश्यक है। वर्तमान सीटों के भीतर ही रोटेशन के आधार पर आरक्षण लागू किया जा सकता है, जैसा कि स्थानीय निकायों में किया गया है।
साथ ही, परिसीमन को भी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि ठोस और अद्यतन आंकड़ों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि जनगणना समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरी हो। केवल राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं में बदलाव करना दूरगामी दृष्टि से नुकसानदायक साबित हो सकता है।
अंततः, यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है, बल्कि यह समान और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की व्यवस्था है। यदि प्रतिनिधित्व का आधार ही वास्तविकता से कट जाएगा, तो लोकतंत्र का स्वरूप भी विकृत हो जाएगा। महिलाओं को उनका अधिकार देना जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि यह अधिकार किसी राजनीतिक समीकरण का हिस्सा न बनकर, एक सच्चे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बने।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सुविधा की राजनीति से ऊपर उठकर सिद्धांतों की राजनीति की ओर बढ़ें। महिलाओं का आरक्षण, परिसीमन और जनगणना—ये तीनों मुद्दे आपस में जुड़े जरूर हैं, लेकिन इन्हें एक-दूसरे की शर्त बनाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से जटिल बनाता है। यदि हम एक मजबूत और संतुलित लोकतंत्र चाहते हैं, तो हमें इन फैसलों को दूरदृष्टि, पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ लेना होगा।

(लेख में प्रकट विचार और तर्क लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन की  सहमति जरूरी नहीं  है- एडमिन)

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