देश में आत्महत्या के मामलों में दिहाड़ी मजदूर सबसे आगे, एक दशक में सबसे अधिक हिस्सेदारी
नई दिल्ली। देश में आत्महत्या के बढ़ते मामलों को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। वर्ष 2024 में आत्महत्या करने वालों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी दिहाड़ी मजदूरों की रही। एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2024 में देश में हुई कुल आत्महत्याओं में 31 प्रतिशत दिहाड़ी मजदूर थे, जो पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में 52,910 दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। इससे पहले वर्ष 2022 में यह अनुपात 26.4 प्रतिशत दर्ज किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि अस्थिर रोजगार, कम आय, बढ़ती महंगाई, कर्ज और सामाजिक सुरक्षा के अभाव ने इस वर्ग को मानसिक और आर्थिक दबाव में धकेला है।
देश में कुल आत्महत्या के मामलों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2015 में जहां आत्महत्या के कुल मामले लगभग 1.34 लाख थे, वहीं वर्ष 2024 में यह संख्या बढ़कर करीब 1.70 लाख पहुंच गई। यह वृद्धि केवल मानसिक स्वास्थ्य संकट ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक असमानताओं की भी ओर संकेत करती है।
रिपोर्ट बताती है कि “पेशा आधारित आत्महत्या” श्रेणी में दिहाड़ी मजदूर, गृहिणियां और स्वरोजगार से जुड़े लोग सबसे बड़े वर्ग बने हुए हैं। हालांकि पिछले एक दशक में गृहिणियों और स्वरोजगार करने वालों की हिस्सेदारी में कुछ गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में आत्महत्या करने वालों में गृहिणियों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत रही, जबकि स्वरोजगार करने वालों की हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत दर्ज की गई। वेतनभोगी कर्मचारियों की हिस्सेदारी 9.9 प्रतिशत और बेरोजगारों की 8.7 प्रतिशत रही।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि खेती-किसानी से जुड़े लोगों की आत्महत्याओं का अनुपात घटा है। वर्ष 2016 में यह 8.7 प्रतिशत था, जो वर्ष 2024 में घटकर 6.2 प्रतिशत रह गया। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती में आत्महत्या के मामलों में कमी का अर्थ किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई बार कृषि से जुड़े लोग अन्य श्रेणियों में दर्ज हो जाते हैं।
राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु में दिहाड़ी मजदूरों की आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक 10,556 दर्ज की गई। इसके बाद महाराष्ट्र में 6,811, तेलंगाना में 5,745, मध्य प्रदेश में 5,299 और छत्तीसगढ़ में 3,413 मामले सामने आए। केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली में ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक 343 रही।
एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में आत्महत्या करने वाले 62.9 प्रतिशत लोगों की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम थी। इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। आत्महत्या के प्रमुख कारणों में “पारिवारिक समस्याएं” सबसे ऊपर रहीं, जिनकी हिस्सेदारी 35 प्रतिशत रही। इसके बाद “बीमारी” 17.9 प्रतिशत मामलों के साथ दूसरा बड़ा कारण रही।
आत्महत्या के तरीकों में फांसी सबसे अधिक प्रयुक्त तरीका रहा। कुल 62.3 प्रतिशत मामलों में लोगों ने फांसी लगाकर जान दी, जबकि 24.5 प्रतिशत मामलों में जहरीले पदार्थ का सेवन किया गया।
सामाजिक और आर्थिक संकेत
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़े केवल अपराध या मानसिक स्वास्थ्य का मामला नहीं हैं, बल्कि देश की आर्थिक संरचना का आईना भी हैं। दिहाड़ी मजदूरों की आय अस्थिर होती है और अधिकांश श्रमिकों के पास न तो बीमा होता है, न नियमित बचत और न ही सामाजिक सुरक्षा। काम बंद होने, बीमारी या पारिवारिक संकट की स्थिति में वे तेजी से आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।
कोविड महामारी के बाद असंगठित क्षेत्र में रोजगार की अनिश्चितता और बढ़ी है। शहरों में निर्माण कार्य, होटल, परिवहन और छोटे उद्योगों में काम करने वाले लाखों मजदूर लगातार आर्थिक दबाव में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन करने वाले श्रमिकों को भी स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक तनाव, अकेलापन, पारिवारिक विवाद और भविष्य की असुरक्षा मिलकर अवसाद को बढ़ाते हैं। लेकिन देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी सीमित हैं, विशेषकर ग्रामीण और गरीब तबकों तक उनकी पहुंच बहुत कम है।
क्या हो सकते हैं समाधान
विशेषज्ञों के अनुसार आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए रोजगार सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं, मानसिक परामर्श केंद्र और आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवारों के लिए तत्काल सहायता व्यवस्था आवश्यक है।
इसके साथ ही समाज में मानसिक तनाव और अवसाद को लेकर जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत है, ताकि लोग कठिन परिस्थितियों में मदद लेने से हिचकिचाएं नहीं।
