गिरने का रिकॉर्ड बनाने की ओर रुपया

-अरुण श्रीवास्तव देहरादून-
“अक्कड़-बक्कड़ बंबे बो, अस्सी नब्बे पूरे सौ, सौ में लागा धागा, चोर कर निकल के भागा…”। इस लोकगीतों का पुरानी पीढ़ी से बचपन का ‘नाता’ रहा है। हालांकि तब हमारी पीढ़ी को इसका मतलब नहीं पता था और हमारे पहले वाली को भी। बहुतों को तो अब भी नहीं पता। ये अलग बात है कि अब तो गूगल बाबा और एआई भैय्या बता देते हैं वो भी बिना ना-नुकुर किए। जो भी हो आज़ यह पंक्ति बरबस याद आती है। क्योंकि अब रुपया अस्सी-नब्बे होते-होते पूरे सौ की दिशा में जाने को आतुर दिखता लगे। मुझ सहित बहुतेरों की चिंता का कारण यह भी है कि, वे डॉलर की अंडरवियर नहीं पहनते हैं और जब पहनने का निर्णय लिया तो वो ऐसे गायब हो गई जैसे गधे के सिर से सींग।
बहरहाल अब पछताए होत का, जब चिड़िया चुग गई खेत’। वैसे मुझ जैसों बहुतों की मान्यता है कि, जब जागो तभी सवेरा’। अब का बताई सालों साल इस भ्रम में पड़े रहे कि लाख कंपटीशन कर ले डॉलर के ताप से रुपया हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की उम्र को चुनौती दे उससे पार नहीं जा सकता। आखिर अब तक तो कोई गया भी नहीं चाहे नेता हो या अभिनेता। अभिनेता का जिक्र होते ही सदी के महानायक की याद आना स्वाभाविक है। व्यंग्यात्मक लहजे में तो इन दोनों के अलावा परेश रावल, अनुपम खेर, ऋषि कपूर, चेतन भगत और प्रीतीश नंदी ने भी किया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है। अब कोई ट्विटर पर है तो ट्वीट ही करेगा!सब इस नाचीज़ की तरह तो होते नहीं कि पहले वाले मालिक से लेकर मस्क भइया की बादशाहत तक एक अदद ट्वीट तक नहीं किया। अब ये तो नियम-शर्तों में शामिल नहीं कि एंटिना लगा लिया है तो टीवी भी खरीदूं।
हमारे अपने समाज में गिरने को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता चाहे सफलता की सीढ़ी से नीचे गिरना हो या किसी की निगाह से गिरना। अगर खेलों में गिरने की प्रतियोगिता हो या गिरने को खेल में शामिल किया जाए तो शर्तिया कोई देश हमारा मुकाबला नहीं कर सकता, हम मीलों आगे होंगे। जहां ओलंपिक में हम एक “छंटाक” सोना नहीं ला पाते। गिरने की प्रतियोगिता के आयु या वज़न की श्रेणी में गोल्ड मेडल ले आते। चाहे रुपया फेंक कर खेला जाए या लुढ़का कर हमारे मुकाबले में कोई ठहरता ही नहीं। हां तब हमें दूसरे तरह से परिभाषित करना पड़ता। जैसे रुपया लुढ़कता है तो देश की प्रतिष्ठा भी लुढ़कती है। एक बात और तब बेचारी उस फिल्म अभिनेत्री की ‘अंडरवियर’ गिरती नहीं सरकती।
अगर रुपया इसी गति से गिरता रहा तो मौसम अपडेट की तरह समाचार पत्रों में रुपए का अपडेट आने लगता। पाठकों की पहली नजर अपडेट वाले कालम पर पड़ती कि आज रुपया कितना गिरा। जो अखबार न मांगते हों वो पड़ोसी से फोन कर पूछते कि आज रुपया कितना गिरा? होने को तो ये भी हो सकता है कि रुपए के गिरने पर शोध होने लगे, होने भी चाहिए। वैसे भी आजकल देशभक्तों का नहीं राष्ट्रवादियों का बोलबाला है।
“राष्ट्रवाद की ढलान पर लुढ़कता रुपया” शोध का अच्छा टॉपिक हो सकता है और खबरिया चैनलों के डिबेट का विषय “गिरना भी राष्ट्रीय कर्तव्य” हो सकता है। हमें तो लगता है कि रुपया नेहरू जी के समय में गिरता था आजादी के अमृत काल में “गिरने की कला” सीख रहा है। (लेख में प्रकट विचार/तर्क लेखक के निजी हैं)
अरुण श्रीवास्तव देहरादून।
