पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन के दौर में नीतियों में बदलाव होना जरूरी, बोले विशेषज्ञ

 

पर्यावरण पत्रकार राजू सजवाण ने कहा, मीडिया की भी भूमिका महत्वपूर्ण है

देहरादून 6 अप्रेल। पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हिमालयी क्षेत्र हो रहे हैं।उत्तराखंड जैसे राज्य में जलवायु परिवर्तन जैसी स्थितियों को मीडिया में जरूरी कवरेज न मिल पाना और सरकारों की तरफ से इसके अनुरूप समय पर यथार्थ व ठोस नीतियां न पाना एक चिंताजनक बात समझी जानी चाहिए .

पर्यावरण पत्रकार और पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ के प्रमुख संवाददाता राजू सजवाण ने यह बाद दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित मासिक कार्यक्रम में ‘खबरपात’ में कही। वार्ता का संचालन करते हुए पत्रकार त्रिलोचन भट्ट ने उनसे कई सवाल भी किये। उपस्थित श्रोताओं की ओर से भी पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सवाल पूछे गये।

अपने प्रजेंटेशन में राजू सजवाण ने कहा कि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। इससे पर्यावरणीय परिस्थितियों पर प्रभाव पड़ रहा है। हिमालयी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। लेकिन इससे निपटने के लिए सरकारों की ओर से अपेक्षित नीतियां बनाने की महति आवश्यकता है.

मीडिया में भी पर्यावरण संबंधी खबरों को उतनी तरजीह नहीं दी जा रही जितनी वाकई जरूरत है। स्थानीय स्तर के जो भी पत्रकार इन घटनाओं की कवरेज / रिपोटिंग करते हैं राज्य और राष्ट्रीय स्तर के मीडिया को भी इन रिपोर्टों को गंभीरता से लिए जाने का प्रयास किया जाना चाहिए। अक्सर स्थिति बढ़ने के बाद ही मेन स्ट्रीम मीडिया इन घटनाओं को रिपोर्ट करता है।

जोशीमठ का उदाहरण देते उन्होंने कहा कि जनवरी में हुई जोशीमठ धंसाव की घटना से करीब 6 महीने पहले कुछ समाचार माध्यमों में जोशीमठ में कुछ जगहों पर दरारें आ़ने की खबरें आई थी, लेकिन अधिकांश ने उन खबरों पर ध्यान नहीं दिया। जब स्थितियां बेहद गंभीर हो गई, तब मीडिया वहां पहुंचा।

उन्होंने कहा कि इस तरह की खबरें व रिपोर्ट अक्सर मीडिया में एक इवेंट की तरह आती है। जबकि मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण रुप से आनी चाहिए , ताकि सरकार को इन घटनाओं से निपटने के लिए ठोस नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने में मदद मिल सकें. उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट पब्लिक डोमेन में भी सहजता से आनी चाहिए । जोशीमठ धंसाव संबंधी रिपोर्ट भी हाईकोर्ट द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद सामने आयी थी।

जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे मामलों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में इस तरह की घटनाओं को लेकर युवा सजग है। वहां के युवा इसके लिए जागरूक होकर कार्य कर रहे हैं लेकिन उत्तराखंड में युवाओं में इस तरह की जागरूकता का अभाव नजर आता है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण कार्य से युवाओं और महिलाओं को जोड़ना समय की एक जरूरत है। कार्यक्रम में पर्यावरणविद् डॉ. रवि चोपड़ा ने हिमालयी पर्यावरण के संभावित खतरों के बारे में विस्तार से अपनी बात रखी।

इस कार्यक्रम में छवि मिश्रा, हिमांशु कुमार, विजय कुमार डोभाल, कमलेश, राजीव अग्रवाल, हरि ओम, विवेक तिवारी, अजय शर्मा, चन्दन सिंह नेगी, के बी नैथानी, इन्द्रेश मैखुरी, योगम्बर सिंह नेगी, कर्नल मदन मोहन कंडवाल, सुंदर सिंह बिष्ट व अरविंद शेखर आदि साहित अन्य लोग मौजूद थे।

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दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून,9410919938

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