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निकोटीन की जांच के लिए नई तकनीक की खोज

A tiny fluorescent “turn-on” sensor for rapidly detecting nicotine and its major metabolite, cotinine, in aqueous media and living cells, could enable   early and rapid detection of nicotine exposure and biomarkers levels of cotinine its long-lasting footprint in the body.Smoking and second-hand smoke exposure remain major global health issues. Nicotine is highly addictive and harmful, while cotinine is a stable biomarker present in blood, saliva, and urine. Therefore, developing a selective and biocompatible probe for nicotine/cotinine detection is important for public health screening, monitoring smoking exposure and biological and cellular research related to nicotine metabolism.

by- Jyoti Rawat

धूम्रपान और उससे निकलने वाला धुआं आज दुनिया भर में सेहत के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। सिगरेट या तंबाकू में मौजूद निकोटीन न केवल अत्यधिक नशीला होता है, बल्कि शरीर के भीतर जाकर कई हानिकारक बदलाव भी लाता है। जब निकोटीन शरीर में टूटता है, तो वह ‘कोटिनिन’ नाम का एक उप-उत्पाद बनाता है, जो हमारे रक्त, लार और मूत्र में लंबे समय तक मौजूद रहता है। हाल ही में मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (INST) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आधुनिक सेंसर विकसित किया है जो शरीर में निकोटीन और कोटिनिन की मौजूदगी का बहुत तेजी से और शुरुआती चरणों में ही पता लगा सकता है। यह तकनीक न केवल यह बताती है कि किसी ने हाल ही में धूम्रपान किया है, बल्कि यह शरीर पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझने में भी मदद करती है।

कैसे काम करता है यह नैनोसेंसर

इस नई खोज की सबसे खास बात इसकी बनावट है। वैज्ञानिकों ने लोहे (आयरन) और कार्बनिक अणुओं का उपयोग करके बेहद छोटे, स्पंज जैसी संरचना वाले ‘नैनोस्फीयर’ तैयार किए हैं। इसे तकनीकी भाषा में ‘आयरन मेटल-ऑर्गेनिक फ्रेमवर्क’ कहा जाता है। इन नैनोस्फीयर में बहुत ही सूक्ष्म छेद होते हैं जो निकोटीन जैसे अणुओं को अपने भीतर फंसाने की क्षमता रखते हैं। जब इन नैनोस्फीयर को निकोटीन या कोटिनिन के संपर्क में लाया जाता है, तो एक विशेष रासायनिक प्रक्रिया होती है जिसे ‘होस्ट-गेस्ट इंटरैक्शन’ कहा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान इलेक्ट्रॉन का आदान-प्रदान होता है, जिससे यह सेंसर नीले रंग की चमकदार रोशनी उत्सर्जित करने लगता है। इस चमक के आधार पर वैज्ञानिक यह पहचान लेते हैं कि शरीर की कोशिकाओं या तरल पदार्थों में निकोटीन की मात्रा कितनी है।

पुरानी तकनीकों के मुकाबले सस्ता और सुरक्षित विकल्प

अब तक निकोटीन और कोटिनिन की जांच के लिए जिन मशीनों और विधियों का उपयोग किया जाता था, वे बहुत महंगी और समय लेने वाली थीं। उन पारंपरिक जांचों के लिए बड़े लैब, जटिल रसायनों और विशेष विशेषज्ञों की जरूरत होती थी। इसके विपरीत, वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह नया आयरन-आधारित सेंसर काफी सस्ता है और इसे इस्तेमाल करना भी बहुत सरल है। चूंकि इसमें मुख्य रूप से लोहे का उपयोग किया गया है, इसलिए यह कम विषैला है और मानव शरीर की जीवित कोशिकाओं के लिए सुरक्षित यानी जैव-अनुकूल है। यह सेंसर जलीय माध्यमों में भी प्रभावी ढंग से काम करता है, जो इसे वास्तविक स्वास्थ्य जांच के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनाता है।

भविष्य की राह और स्वास्थ्य लाभ

‘नैनोस्केल’ पत्रिका में प्रकाशित यह शोध सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। इस तकनीक की मदद से भविष्य में ऐसे कम लागत वाले टेस्टिंग किट विकसित किए जा सकते हैं, जिनसे अस्पतालों या क्लीनिकों में तुरंत धूम्रपान के दुष्प्रभावों की जांच हो सकेगी। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए उपयोगी होगा जो खुद धूम्रपान नहीं करते लेकिन दूसरों के धुएं (Passive Smoking) के कारण खतरे में हैं। यह तकनीक न केवल स्वास्थ्य निगरानी को आसान बनाएगी, बल्कि नशामुक्ति केंद्रों और चिकित्सा अनुसंधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, जिससे निकोटीन के चयापचय और शरीर पर इसके हानिकारक प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।

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Publication link: DOI: 10.1039/D5NR00785B

 

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