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हिमालयी राज्यों के समन्वय व नीति निर्धारण परिषद की पहली बैठक, साझा चुनौतियों पर बनी रणनीति

देहरादून, 24 अप्रैल।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में हिमालयी राज्यों के मध्य आपसी समन्वय को मजबूत करने के उद्देश्य से हिमालयी राज्यों से समन्वय एवं नीति निर्धारण परिषद की प्रथम बैठक आयोजित की गई। बैठक में हिमालयी क्षेत्रों की साझा चुनौतियों के समाधान, समेकित रणनीति तैयार करने तथा क्षेत्रीय विकास को गति देने से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा की गई।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालयी राज्यों की भौगोलिक, पर्यावरणीय और सामाजिक परिस्थितियां लगभग समान हैं। ऐसे में आपसी सहयोग, अनुभवों के आदान-प्रदान और बेहतर कार्यप्रणालियों को अपनाने से प्रभावी नीति निर्माण संभव हो सकेगा। उन्होंने निर्देश दिए कि जिन हिमालयी राज्यों में विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय कार्य हुए हैं, उनका विस्तृत अध्ययन कर उन्हें बेस्ट प्रैक्टिस के रूप में अपनाया जाए।

 

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का मुख्य उद्देश्य इकोनॉमी और इकोलॉजी के बीच संतुलन बनाते हुए लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है। उत्तराखंड प्राकृतिक संपदा और जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है और हिमालय तथा औषधीय पौधों के संरक्षण के क्षेत्र में यहां अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

 

मुख्यमंत्री ने जल संरक्षण को राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल बताते हुए कहा कि जल स्रोतों के पुनर्जीवीकरण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि हिमालय और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले संस्थानों का निरंतर सहयोग लिया जाए। साथ ही हिमालयी राज्यों की समस्याओं के समाधान के लिए विशेषज्ञों के साथ समय-समय पर बैठकें और विचार गोष्ठियां आयोजित की जाएं।

 

बैठक में जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, पर्यटन विकास, जैव विविधता संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा तथा सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि बैठक में प्राप्त सुझावों पर तेजी से अमल किया जाएगा, ताकि हिमालयी क्षेत्रों के समग्र विकास को गति मिल सके।

 

मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि हिमालयी राज्यों की चुनौतियों का प्रभावी समाधान तभी संभव है, जब सभी राज्य एकीकृत रूप से कार्य करें। उन्होंने कहा कि हिमालय का संरक्षण केवल हिमालयी राज्यों के लिए ही नहीं, बल्कि देश की बड़ी आबादी के हित से भी जुड़ा है। इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे संस्थानों का नियमित सहयोग लेना भी आवश्यक होगा।

 

परिषद के सदस्य एवं विधायक किशोर उपाध्याय ने हिमालय और मध्य हिमालय क्षेत्र की अद्यतन वैज्ञानिक और पारिस्थितिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन कराने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने हिमालयी नदियों के जल स्तर और प्रवाह के नियमित आंकलन को भी जरूरी बताया।

 

परिषद के सदस्य एवं पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि हिमालयी राज्यों को संगठित रूप से कार्य करते हुए हिमालय से जुड़ी प्राकृतिक संपदाओं और स्थानीय लोगों की आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

आचार्य डॉ. प्रशांत ने हिमालयी राज्यों के लिए एक ज्वाइंट टास्क फोर्स गठित करने का सुझाव दिया, ताकि साझा समस्याओं के समाधान के लिए बेहतर और समन्वित नीति बनाई जा सके।

 

विशेषज्ञ डॉ. जी.एस. रावत ने प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण को समान रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए इस दिशा में निरंतर प्रयास करने पर जोर दिया। वहीं पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने बुग्यालों (उच्च हिमालयी घासभूमियों) के संरक्षण की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जड़ी-बूटियों के क्षेत्र में राज्य में व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं, जिनका वैज्ञानिक ढंग से विकास किया जाना चाहिए।

इस अवसर पर प्रमुख सचिव डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम, सचिव शैलेश बगौली, यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत सहित अन्य संबंधित अधिकारी भी उपस्थित रहे।

यह बैठक हिमालयी राज्यों के बीच सहयोग को नई दिशा देने तथा साझा चुनौतियों के समाधान के लिए ठोस नीति निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

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