चिकित्सा जगत में ऐतिहासिक मील का पत्थर ; अब थम जाएगी नसों को सुखाने वाली बीमारी एएलएस
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एमीयोट्रोपिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी के विरुद्ध चिकित्सा विज्ञान ने एक ऐसी सफलता प्राप्त की है, जिसे दुनिया भर के वैज्ञानिक एक ‘ऐतिहासिक मील का पत्थर’ मान रहे हैं। हाल ही में आए शोध और नैदानिक परीक्षणों के परिणाम बताते हैं कि अब इस जानलेवा बीमारी को न केवल धीमा करना, बल्कि कुछ मामलों में सुधार लाना भी संभव हो सकता है। विशेष रूप से ‘टोफरसेन’ (Tofersen) नामक दवा ने इस क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है।
क्या है एएलएस और यह क्यों है खतरनाक? एएलएस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की वे नसें (मोटर न्यूरॉन्स) मरने लगती हैं जो मांसपेशियों को नियंत्रित करती हैं। जब ये नसें काम करना बंद कर देती हैं, तो मस्तिष्क का शरीर की मांसपेशियों से संपर्क टूट जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति धीरे-धीरे चलने, बोलने, हाथ हिलाने और अंततः सांस लेने की क्षमता खो देता है। ज्यादातर मामलों में इसका कारण अज्ञात होता है, लेकिन कुछ रोगियों में यह ‘SOD1’ नामक जीन में खराबी के कारण होता है।
टोफरसेन: एक क्रांतिकारी ‘जीन-साइलेंसिंग’ तकनीक अब तक एएलएस का उपचार केवल लक्षणों को कम करने तक सीमित था, लेकिन टोफरसेन ने इस पूरी सोच को बदल दिया है। यह दवा सीधे उस दोषपूर्ण जीन के संदेश को रोक देती है जो शरीर में जहरीले प्रोटीन का निर्माण करता है। जब यह जहरीला प्रोटीन बनना कम हो जाता है, तो नसों को होने वाला नुकसान भी रुक जाता है। इसे विज्ञान की भाषा में ‘एंटीसेंस ऑलिगोन्यूक्लियोटाइड’ थेरेपी कहा जाता है।
शोध के उत्साहजनक परिणाम हालिया आंकड़ों के अनुसार, इस दवा के प्रयोग से कुछ चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं:
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शारीरिक सुधार: परीक्षण में शामिल लगभग 25% मरीजों की स्थिति न केवल स्थिर हुई, बल्कि उनके चलने-फिरने और हाथों की पकड़ में सुधार भी देखा गया।
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जीवनकाल में वृद्धि: आक्रामक एएलएस से पीड़ित मरीज, जिनका जीवनकाल अक्सर दो साल ही होता था, अब पांच साल से अधिक समय तक सक्रिय जीवन जी रहे हैं।
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नसों के नुकसान में कमी: रक्त परीक्षणों में पाया गया कि यह दवा नसों के टूटने की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से कम कर रही है।
भविष्य की नई राह यद्यपि वर्तमान में यह दवा एक विशेष आनुवंशिक वर्ग (SOD1) के लिए है, लेकिन इसकी सफलता ने अन्य प्रकार के एएलएस और यहां तक कि अल्जाइमर व पार्किंसंस जैसी बीमारियों के लिए भी नए रास्ते खोल दिए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘जीन-साइलेंसिंग’ का यह मॉडल आने वाले समय में न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के उपचार की दिशा बदल देगा।
यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि सटीक तकनीक और निरंतर शोध से सबसे कठिन चुनौतियों पर भी विजय पाई जा सकती है। अब आवश्यकता इस बात की है कि यह तकनीक किफायती बने ताकि आम जनता तक इसका लाभ पहुँच सके।
