कौन ठगवा नगरिया लूटल हो राम ! “-एक संस्मरण –

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
“कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।…. “
सन ७१ के सितम्बर महीने में एक दिन कमानी आडिटोरियम, दिल्ली में मैंने पंडित कुमार गंधर्व और उनकी पत्नी विदुषी वसुंधरा कोमकली से इस भजन को सुना था। पंडित कुमार गंधर्व कबीर के बड़े प्रशंसक थे इसलिए उन्ही के लिखे पद अक्सर गाया करते थे । जब यह कार्यक्रम हुआ था तो वह गांधी शांति प्रतिष्ठान के अतिथिगृह दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्ली में टिके हुए थे क्योंकि वह प्रभाष जोशी जी के गहरे मित्र थे और जब कभी उनका दिल्ली आगमन होता था, तो वे वहीँ टिकते थे। उसी दौरान प्रभाष जोशी जी ने मुझसे कहा -*गुना* यार तुम उनका एक इंटरव्यू ले लो -मैंने कहा मुझे शास्त्रीय संगीत की ज्यादा जानकारी नहीं है, मैं उनसे क्या पूछूंगा ? -उन्होंने कहा,- अरे ऐसे ही चले जाओ और जो मर्जी में आये सवाल पूछ लेना, लेकिन उनके जबाब को लिखते जाना,नोट करते जाना । खैर मैं चला गया। वे बड़े आत्मीयता से मिले, सहज और सरल ,बड़े कलाकार होने का कोई घमंड नहीं..,मैने अनाड़ी बच्चे की तरह सीधा सवाल किया -आपका असली नाम क्या है ? उन्होंने कहा मेरा नाम शिवपुत्र सिद्धराम कोमकली है और मैं मैसूर कर्नाटक में पैदा हुआ संगीत की शिक्षा पंडित देवधर जी से प्राप्त की I और मैडम का नाम ? उन्होंने कहा- बसुन्धरा कोमकली । इन्हें बसुन्धरा “ताई* कहिए- लोग इसी नाम से इन्हें पुकारते हैं। …..सवाल बहुत पूछे अंतिम प्रश्न यह किया कि क्या आप फिल्मी संगीत सुनते हैं ? हां सुनता हूं , लता जी का बड़ा योगदान है …… प्रभाष जी ने वह इन्टरव्यू पढ़ा तो खूब हंसे बिना नरह सके फिर उसमें कुछ संशोधन सुझाये अंततः वही इन्टरव्यू सर्वोदय प्रेस सर्विस में प्रसारित कर दिया था …
फिर उसी दौरान दशहरे के दिनों पंडित कुमार गंधर्व जी को तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री, जो बाद में देश के उप प्रधानमंत्री भी बने थे, श्री यशवंतराव चव्हाण जी ने अपने आवास पर शास्त्रीय संगीत की एकल गोष्ठी में गायन के लिए आमंत्रित किया और कहा कि इस कार्यक्रम में सिर्फ उनके मित्र ही होंगे- आप भी अपने किसी मित्र को साथ ला सकते हैं। प्रभाष जोशी जी के सौजन्य से उस दिन मैं और मंगलेश डबराल भी उनके साथ इस कार्यक्रम को सुनने चले गये थे ।..
अन्दर चौव्हाण सहाब के ड्राईंग रुम में नीचे बिछे कालीन पर हम सबसे पीछे बैठ गये। उसी कमरे में कुर्सियों पर विराजमान डा०के०सी० पंत जी और डा०कर्णसिंह जी, दोनों पत्नी सहित विराजमान थे जबकि चव्हाण साहब और महाराष्ट्र के एक अन्य नेता SB चव्हाण, दोनों नीचे कमरे की दीवार से पीठ टिकाये बैठे थे। सामने विशेष आसान पर पंडित कुमार कांधर्व और उनके संगत देनेवाले कलाकार थे ,उस दिन बनारस से सुप्रसिद्ध शस्त्रीय गायक श्रीमती सिद्धेश्वरी देवी जी भी वहां पधारी हुई थी। ..
गायन सुनते समय चव्हाण साहब सबसे ज्यादा मदमस्त दिखे और खूब गर्दन हिला- हिला कर दाद दे रहे थे। उस दिन भजनों के अलावा कुमार जी ने मालवा मध्यप्रदेश का एक लोकगीत भी गाया था –
“दल रे बादल बिन चमक्यो तारे
कि सांझ पड़े पियु लागे प्यारे” मालवा के लोक गीत उन्हें बहुत प्रिय थे क्योंकि वह देवास में रहते थे उस समय।
गायन के बाद थोड़े अंतराल के लिए चाय नाश्ते के लिए सबको आमंत्रित किया गया तो प्रभाष जी के साथ हम उठकर बाहर चले गए ताकि किसी कोने में सिगरेट पी सकें लेकिन हमारे पीछे एक सज्जन भागे आये और कहा आप अंदर चाय लीजिये, आप भी हमारे अतिथि हैं –तो हम चले गए – चाय के बाद हमने एक नजारा यह भी देखा कि सिद्धेश्वरी देवी जी ने पान का एक बीड़ा कुमार गन्धर्व जी के मुँह में डालते हुए उनकी बलैया लेते हुए कहा -आहा बेटा जीते रहब !! कितना सुन्दर गाते हो !!!! …
कैसे सहृदय लोग होते थे उस समय के लोग ।
